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World Heritage Day: अतीत को वर्तमान से जोड़ने वाली धरोहरों की उपेक्षा क्यों?

भारत के गौरवशाली अतीत के मौन, किंतु मुखर कथावाचक के रूप में प्राचीन धरोहरें सामाजिक, सांस्कृतिक प्रेरणा की जीवंत स्रोत हैं लेकिन दुर्भाग्य से ये हमारी उपेक्षा का शिकार हो रही हैं।

World Heritage Day 2023 neglect the heritage which connects the past with the present

World Heritage Day: मुख्य रूप से तीन प्रकार की धरोहरें होती हैं- सांस्कृतिक, प्राकृतिक एवं अमूर्त्त। सांस्कृतिक धरोहरों में भौतिक या कलाकृतियों जैसी मूर्त्त सांस्कृतिक धरोहर शामिल हैं। ये आम तौर पर चल और अचल धरोहर के दो समूहों में विभाजित होती हैं। जहाँ अचल धरोहर में इमारतें, ऐतिहासिक स्थान और स्मारक आदि सम्मिलित होते हैं, वहीं चल धरोहर में ग्रंथ, दस्तावेज, चल कलाकृतियाँ, संगीत और ऐसी अन्य वस्तुएँ शामिल होती हैं, जिन्हें भविष्य के लिये संरक्षण योग्य माना जाता है।

प्राकृतिक धरोहरों में वनस्पतियों एवं जीवों सहित ग्रामीण इलाके और प्राकृतिक पर्यावरण आदि शामिल होते हैं। इसमें ऐसे प्राकृतिक भूदृश्य भी शामिल किए जा सकते हैं, जो महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक विशेषताओं को समेटे हों। अमूर्त्त धरोहरों में सामाजिक मूल्य एवं परंपराएं, रीति-रिवाज एवं प्रथाएं, सौंदर्यात्मक एवं आध्यात्मिक आस्थाएं, कलात्मक अभिव्यक्ति, भाषा और मानव गतिविधि के अन्य पहलू शामिल हैं।

स्वाभाविक रूप से, भौतिक वस्तुओं की तुलना में अमूर्त्त सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करना अधिक कठिन है। निःसंदेह ये सभी धरोहरें हमें अपनी जड़ों एवं गौरवशाली पंरपराओं से जोड़ती हैं। इन्हें देखकर हम तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक, एवं आर्थिक स्थितियों एवं व्यवस्थाओं का सहज एवं यथार्थ अनुमान ही नहीं लगा सकते, अपितु इन अवशेषों को देखकर हम सभ्यता के ज्ञात एवं उपलब्ध इतिहास के भी पार झांक सकते हैं।

यही कारण है कि हर सजग एवं प्रबुद्ध समाज अपनी ऐतिहासिक धरोहरों की विशेष देखभाल एवं सहेज-संभाल करता है। परंतु दुर्भाग्य से ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्त्व की इन धरोहरों के संरक्षण में बरती गई घनघोर लापरवाही एवं सतत उपेक्षा का गंभीर एवं चिंतनीय मामला संज्ञान में आया है। निःसंदेह ऐसी उपेक्षा एवं लापरवाही के लिए व्यवस्था एवं सरकारें अधिक उत्तरदायी होती हैं, पर अपनी इन ऐतिहासिक-सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति देश के शिक्षित एवं नागरिक-समाज की उदासीनता भी मन को कहीं गहरे में कचोटती है। इन्हें कथित विकास या अवैध अतिक्रमण आदि की भेंट न चढ़ने देने में नागरिक-समाज प्रहरी की भूमिका निभा सकता है।

उल्लेखनीय है कि इस समय देश भर में ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्त्व के 3693 स्मारक हैं, जिन्हें केंद्र सरकार संरक्षित करती है। इनमें से 50 स्मारक अप्राप्य (लापता) हैं। बीते वर्ष, 8 दिसंबर को केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय द्वारा गठित संयुक्त संसदीय स्थाई समिति की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया, ''...यह गंभीर चिंता का विषय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (संस्कृति मंत्रालय) के संरक्षण में राष्ट्रीय महत्त्व के कई स्मारक तेजी से गायब हो गए हैं। ये स्मारक शहरीकरण, जलाशयों और बांधों के पानी में जलमग्न होने के कारण खो गए हैं। वहीं, कुछ स्मारकों का स्थान नहीं मिलने और घने जंगलों में उन्हें खोज न पाने की वजह से भी वो गायब हो गए हैं।''

इन लापता स्मारकों में 11 उत्तर प्रदेश के हैं। वहीं, दिल्ली और हरियाणा के दो-दो स्मारक लापता होने वाले स्मारकों में शामिल हैं। इनके अलावा इस सूची में असम, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड के स्मारकों के भी नाम शामिल हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अनुसार, इन स्मारकों में से 14 तेजी से शहरीकरण के कारण खो गए हैं। वहीं, 12 जलाशयों या बांधों की वजह से पानी में डूब गए और बाकी 24 की जगह को खोज पाना असंभव बताया गया है, क्योंकि ये अनट्रेसेबल हैं। अनुमान है कि या तो इनका अस्तित्व ही नहीं रहा या अतिक्रमण आदि के कारण इन्हें पहचान पाना संभव नहीं।

इसी रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1930, 1940 और 1950 के दशक में बड़ी संख्या में संरक्षित स्मारकों की पहचान की गई थी, परंतु स्वतंत्रता के बाद उन्हें संरक्षित करने के स्थान पर नए स्मारकों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया गया। इस रिपोर्ट में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं संस्कृति मंत्रालय की विभिन्न संस्थाओं में खाली पड़े पदों की ओर भी संकेत किया गया है और उस पर गंभीर आपत्ति प्रकट की गई है। समिति की रिपोर्ट में बताया गया है कि एएसआई के आर्कियोलॉजी काडर में 420 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 166 पद खाली हैं। संरक्षण काडर में कुल स्वीकृत पद 918 हैं जिनमें से 452 पद खाली हैं।

बजट की कमी के कारण इस समय 3693 संरक्षित स्थलों में से केवल 248 स्थलों पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। इन 248 स्थलों पर 2578 सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। सभी संरक्षित स्थलों की सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें निश्चित ही इससे कहीं अधिक कर्मियों की आवश्यकता पड़ेगी और उपलब्ध कर्मियों एवं संसाधनों का कुशल व संतुलित प्रबंधन भी करना होगा।

उल्लेखनीय है कि 2013 में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने भी अपनी तरह के पहले भौतिक सत्यापन अभ्यास के पश्चात 92 स्मारकों को "लापता" घोषित किया था। कैग की रिपोर्ट में तब यह भी रेखांकित किया गया था कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के पास संरक्षित स्मारकों एवं कलाकृतियों का कोई राज्यवार लिखित ब्यौरा (डाटाबेस) नहीं है। स्मारकों के ग़ायब होने का मामला 2017 में लोकसभा में भी उठा था। तत्कालीन केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा ने तब ऐतिहासिक एवं संरक्षित स्मारकों की विलुप्ति एवं अतिक्रमण के प्रश्न पर उत्तर देते हुए कहा था कि ''अरुणाचल प्रदेश में कॉपर टैंपल, असम के तिनसुकिया में शेरशाह की बंदूकें, दिल्ली में बाराखंभा और पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में बमनपुकुर किले के खंडहर गायब हो चुके हैं और उनका पता नहीं लगाया जा सकता। जिन स्मारकों का पता नहीं लगा है, उन्हें खोजने के लिए पुराने रिकॉर्ड्स का सत्यापन, रेवेन्यू मैप, प्रकाशित रिपोर्ट, भौतिक निरीक्षण और टीमों की तैनाती की गयी है।''

सुखद है कि कैग द्वारा लापता घोषित 92 स्मारकों में से 42 को पुनः ढूंढ लिया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने पिछले 8 सालों में 8,478 गांवों का सर्वेक्षण किया है। इन गांवों में 2,914 पुरातात्त्विक अवशेष पाए गए हैं, जिन्हें सहेजने का काम चल रहा है। आजादी के बाद से अब तक 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्थित केंद्र संरक्षित स्मारकों व स्थलों से 210 चोरी की घटनाएं हुई हैं, जिनमें 486 वस्तुएं अपने स्थान से गायब मिलीं, उनमें से 91 वस्तुएं बरामद कर ली गयी हैं और अन्य की बरामदगी के प्रयास चल रहे हैं। संस्कृति मंत्रालय एवं एएसआई को यह याद रखना होगा कि ये धरोहरें देश की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान व गौरव की जीवंत प्रतीक हैं।

ये अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाली कड़ी हैं। ये वर्तमान द्वारा भविष्य को सौंपी जाने वाली अमूल्य थाती हैं। इनका क्षरण देश की सभ्यता और संस्कृति का क्षरण है। स्वाधीनता के अमृत महोत्सव में लालकिले के प्राचीर से पांच प्रण की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री ने विरासत पर गर्व करने की बढ़-चढ़कर बातें की थीं, परंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्हें संरक्षित करने की दिशा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं संस्कृति मंत्रालय की ओर से कोई ठोस पहल एवं गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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