Women Voters: राजनीतिक दलों की नजर में बढ़ता महिला वोटरों का महत्व

Women Voters: मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव की अधिकृत घोषणा अभी होना शेष है किन्तु भारतीय जनता पार्टी से लेकर कांग्रेस तक ने आधी आबादी को अपने पक्ष में करने हेतु घोषणाओं के पिटारे खोल दिए हैं। और घोषनाएं भी क्यों न हों? आखिरकार मध्य प्रदेश में 48.20 प्रतिशत वोटर महिला हैं और यही आधी आबादी अब सत्ता बनाने बिगाड़ने के खेल की वजीर बन गई हैं। एक ओर जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान महिलाओं के लिए 'लाड़ली बहना योजना' लेकर मैदान में हैं वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सत्ता में आने के बाद 'नारी सम्मान योजना' लागू करने का वादा किया है।

वर्तमान में प्रदेश की महिलाओं को लाड़ली बहना योजना के अंतर्गत 1,000 रुपए दिए जा रहे हैं जिसे 10 अक्तूबर, 2023 से प्रतिमाह पहले 1,250 रुपए और बाद में 1,600 रुपए करने की घोषणा की गई है। अंततः प्रत्येक पात्र महिला को 3,000 रुपए प्रतिमाह दिये जाने का प्रस्ताव है।

Women Voters: Importance of women voters increasing in the eyes of political parties

सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2023-24 में प्रदेश की भाजपा सरकार ने महिलाओं के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के मद के लिए कुल 1 लाख 2 हजार 976 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है जिसके अंतर्गत लाड़ली बहना योजना के लिए 5,000 करोड़ रुपए, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए 660 करोड़ रुपए, लाड़ली लक्ष्मी योजना के लिए 929 करोड़ रुपए, कन्या विवाह एवं निकाह योजना के लिए 80 करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। इसके अलावा शिवराज सरकार ने महिलाओं को सावन में 450 रुपए में गैस सिलेंडर देने का वादा भी किया गया है जिसके अंतर्गत सरकार गैस एजेंसियों से जानकारी लेकर महिलाओं के खाते में 600 रुपए ट्रांसफर करेगी।

वहीं कांग्रेस के 11 वचन वाले चुनावी घोषणा पत्र को देखें तो उसमें भी आधी आबादी को खासा महत्त्व दिया गया है। 27 अगस्त, 2023 को पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सरकार बनने पर महिलाओं को 1,500 रुपए प्रतिमाह, 500 रुपए में गैस सिलेंडर, मुफ्त स्कूली शिक्षा जैसे वादे किए हैं। राजनीतिक शक्ति के तीसरे केंद्र के रूप में स्वयं को स्थापित करने में जुटी आम आदमी पार्टी भी महिलाओं को लुभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही। प्रदेश में पार्टी की एकमेव महापौर भी महिला हैं अतः उनका चेहरा आगे कर महिलाओं को जोड़ने की कवायद जारी है।

इन सबके अलावा पुलिस और दूसरी भर्तियों में महिलाओं का आरक्षण 30 प्रतिशत से बढ़ाकर 35 प्रतिशत करना, शिक्षकों के पदों पर महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण, बहनों की स्कूल फीस माफ, पात्र महिलाओं को आजीविका मिशन के माध्यम से लोन जैसे वादों ने राजनीति में बढ़ती महिला वोट की ताकत का एहसास करवा दिया है।

दरअसल, बीते दशकों से महिलाओं के वोटों ने कई सरकारों को बनाया-बिगाड़ा है। राजनीतिक गुणा-भाग में अपना आर्थिक व घरेलू हित ढूंढती महिलाओं में अब जागृति आई है और कौनसा राजनीतिक दल उन्हें लाभ देने के साथ ही उनकी किचन का आर्थिक भार कम कर रहा है, उन्हें बखूबी समझ में आ रहा है। वे मतदान के दिन घर की देहरी लांघ कर अपनी हितैषी सरकार चुन रही हैं।

मध्य प्रदेश की ही बात करें तो चुनाव आयोग के अनुसार, प्रदेश में 5.39 करोड़ मतदाता हैं जिनमें से 2.60 करोड़ यानी 48 प्रतिशत से अधिक महिला मतदाता हैं। पिछले पांच वर्ष में प्रदेश में 35 लाख से अधिक मतदाता बढ़े हैं जिनमें 19 लाख महिला मतदाता हैं। वहीं प्रदेश के 40 जिले तो ऐसे हैं जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक है।

चुनाव आयोग के अनुसार, 2013 के विधानसभा चुनाव में 70 प्रतिशत महिला मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था जबकि 2018 में यह आंकड़ा बढ़कर 74 प्रतिशत हो गया है जिससे स्पष्ट है कि महिलाएं इस बार भी बढ़-चढ़कर मतदान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेंगी। इन सबसे इतना तो तय है कि राजनीतिक दल भले ही महिलाओं को टिकट देने के मामले में कंजूसी बरतें, 33 प्रतिशत आरक्षण पर कन्नी काटें लेकिन वोटों के लिए उनकी अनदेखी तो नहीं कर सकते।

हाल ही में, रक्षाबंधन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घरेलू गैस सिलेंडर पर 200 रुपए की छूट महिलाओं को सीधे तौर पर प्रभावित करने का उपक्रम है। कुछ ऐसा ही वादा विपक्षी दलों का गठबंधन भी कर रहा है। राजस्थान में तो गहलोत सरकार ने 500 रुपए में सिलेंडर देना भी शुरू कर दिया है गोयाकि महिला मतदाताओं को लुभाने के लिए सभी दलों के बीच एक होड़ लगी है।

नवंबर, 2021 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त सुशील चंद्रा ने कहा था कि भारतीय लोकतंत्र ने पहले लोकसभा चुनावों के बाद से एक उल्लेखनीय दूरी तय की है और आज सात दशक और 17 आम चुनावों के बाद, मताधिकार का प्रयोग करने में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक हो गई है। उन्होंने यह भी इंगित किया कि भारत में 1971 के चुनावों के बाद से महिला मतदाताओं में 235.72 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि देखी गई है। उनके अनुसार, 2019 के आम चुनाव में अलग महिला बूथ स्थापित किए गए और 27,527 ऐसे बूथ महिलाओं के लिए आरक्षित किए गए, जहां मात्र महिलाओं ने मतदान किया।

महिलाओं के बढ़ते मत प्रतिशत के बाद एक प्रश्न भी उठता है कि क्या महिलाओं की राजनीतिक चेतना वास्तव में बढ़ी है? क्या राजनीति ने उन्हें उचित हिस्सेदारी दे दी है? इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बिहेवियरल सोशल एंड मूवमेंट साइंस में छपे एक अध्ययन के अनुसार, यद्यपि महिला मतदाताओं की संख्या बढ़ रही है किन्तु महिला उम्मीदवारों की संख्या अभी भी निराशाजनक ही है। राजनीतिक दल भी महिलाओं को बराबरी का मौका देने का दिखावा करते हैं जबकि उन्हें मत मिलने के अनुपात में उन्हें राजनीतिक रूप से अवसर भी देना चाहिए।

बढ़ती राजनीतिक समझ और पंचायत चुनाव में प्राप्त आरक्षण ने महिलाओं को राजनीतिक रूप से अधिक मुखर कर दिया है जिसके चलते सभी राजनीतिक दल उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हैं। इसके लिए राजनीतिक दलों द्वारा चलायी जा रही योजनाओं का लाभ महिलाओं के जरिए पूरे परिवार को मिल रहा है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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