आरक्षण खत्म होगा या दायरा बढ़ेगा?
Muslim Reservation: विपक्ष का हर नेता चुनाव प्रचार में यही एक विषय जोरदार ढंग से उठा रहा है कि नरेंद्र मोदी तीसरी बार 400 सीटों के साथ प्रधानमंत्री बन गए, तो यह आख़िरी चुनाव होगा, मोदी आरक्षण खत्म कर देंगे और सेक्यूलर संविधान को बदल देंगे।
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी और भाजपा के नेता विपक्ष और खासकर कांग्रेस पर आरोप लगा रहे हैं कि वह हिन्दू ओबीसी का कोटा छीन कर मुसलमानों को आरक्षण देना चाहती है और ऐसा करके संविधान के सेक्यूलर करेक्टर को खत्म कर रही है। दोनों सेक्यूलरिज्म बचाने की दुहाई दे रहे हैं। जबकि कर्नाटक में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस सरकार ने सभी मुस्लिम जातियों को ओबीसी में शामिल कर लिया है, जिसका भाजपा विरोध कर रही है।

वैसे जब गैर कांग्रेस वीपी सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू की थीं, तो उसमें मुसलमानों की उन ओबीसी जातियों को जोड़ लिया गया था, जो हिन्दुओं में भी होती हैं। उस वक्त किसी ने इस पर एतराज नहीं किया, हालांकि जब डाक्टर आम्बेडकर देश के विधि मंत्री थे, तब एक संवैधानिक आदेश जारी करके धर्म परिवर्तन कर के मुस्लिम या ईसाई बने दलितों को आरक्षण से वंचित कर दिया गया था। मुस्लिम ओबीसी भी धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम बने हैं।
1950 में जब आरक्षण का लाभ सिर्फ हिन्दुओं को देने का फैसला हुआ था, तब जो आदेश जारी किया गया था उसमें कहा गया था कि जो भी हिंदू धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म का पालन करता है वह अनुसूचित जाति में नहीं माना जाएगा। जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में ही केबिनेट से पारित करवा कर खुद डाक्टर आम्बेडकर ने राष्ट्रपति से यह संवैधानिक आदेश जारी करवाया था, जिसे अनुच्छेद में पैरा तीन के तौर पर जोड़ा गया था।

क्योंकि आरक्षण हिन्दू समाज की उन जातियों के लिए दिया गया है, जिन्हें स्वर्ण हिन्दुओं ने सदियों तक दबा कर रखा था, जिस कारण वे विकास की दौड़ में पिछड़ गए इसलिए धर्म परिवर्तन करने वालों को आरक्षण से वंचित कर दिया गया।
1956 और 1990 में दलित मूल की सिख और बौद्ध जातियों को भी सूची में शामिल किया गया, इसका मूल कारण यही था कि सिख और बौद्ध हिन्दुओं के ही उप-धर्म माने जाते हैं। धर्मांतरण करके मुस्लिम और ईसाई बनने वाले दलित पिछले तीन दशक से आरक्षण का लाभ हासिल करने की मांग कर रहे हैं, उन्होंने सुप्रीमकोर्ट में कई याचिकाएं भी दाखिल की। लेकिन हिन्दू दलितों के विरोध के चलते कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार और मनमोहन सिंह सरकार भी मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण नहीं दे सकीं।
इसका तार्किक कारण यह भी है कि जब दलितों के साथ तथाकथित भेदभाव के कारण ही उन्होंने धर्मांतरण किया है, तो वे आरक्षण के अधिकार से खुद ही वंचित हो जाते हैं। ईसाई व मुस्लिम धर्म दावा करते हैं कि उनमें जातिवाद के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता। लेकिन धर्मांतरण करवाने वाले ईसाई और मुस्लिम भी उन्हें आरक्षण का लाभ दिलाने के लिए लॉबिंग करते रहते हैं।
दूसरी तरह जब ओबीसी को आरक्षण लागू किया गया, तो संविधान के अनुच्छेद 16 (1) का इस्तेमाल करते हुए मुसलमानों की भी 36 जातियां जोड़ ली गईं। संविधान के इस अनुच्छेद में यह व्यवस्था है कि अगर सरकार को लगता है कि कोई वर्ग पिछड़ा है, तो वह उसे आरक्षण का लाभ दे सकती हैं। केंद्र सरकार की ओबीसी लिस्ट में मुसलमानों की 36 जातियों को शामिल किया गया था, लेकिन जिन परिवारों की आय सालाना आठ लाख रूपए से ज्यादा है, उन्हें क्रीमी लेयर माना जाता है और उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलता।
मनमोहन सरकार के समय सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया कि मुस्लिम समाज हिन्दुओं की ओबीसी जातियों से ज्यादा पिछड़ा है। 2009 में मनमोहन सरकार ने रंगनाथ कमेटी बनाई, जिसने अल्पसंख्यकों को 15 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की, जिसमें से दस फीसदी सिर्फ मुसलमानों को होना चाहिए। सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र कमेटी की रिपोर्ट मनमोहन सरकार के दौरान ही आई थीं, लेकिन कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने का साहस नहीं किया। कांग्रेस का एक वर्ग भी मुस्लिम आरक्षण का इस आधार पर विरोध करता रहा है कि जब धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा हो गया था, तो मुसलमानों को भारत में आरक्षण क्यों दिया जाना चाहिए।
नेहरू के समय यह विरोध बहुत तीव्र था, इसलिए 1950 में संवैधानिक आदेश जारी करके मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण से वंचित किया गया था। जवाहर लाल नेहरू की पहल पर ही मुस्लिमों को आरक्षण से बाहर रखने का फैसला हुआ था। आम्बेडकर भी मुसलमानों को किसी तरह का आरक्षण दिए जाने के खिलाफ थे। जबकि अब कांग्रेस चाहती है कि सभी मुसलमानों को ओबीसी में शामिल कर लिया जाए, कर्नाटक में जहां उसकी सरकार है, उसने कर भी दिया है। पिछले दिनों लालू यादव ने सभी मुसलमानों को आरक्षण की वकालत की, तो भाजपा ने धार्मिक आधार पर आरक्षण का जम कर विरोध किया।
इस समय दो विचारधाराओं की लड़ाई चल रही है। एक विचारधारा है, जो अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के आरक्षण का दायरा बढाकर उसमें मुस्लिमों और ईसाईयों को शामिल करना चाहती है। दूसरी विचारधारा है, जो जवाहर लाल नेहरू, डाकटर आम्बेडकर और अन्य सभी संविधान निर्माताओं की भावनाओं के अनुरूप आरक्षण को हिन्दू दलितों, हिन्दू आदिवासियों और हिन्दू ओबीसी तक सीमित रखना चाहती है।
विचित्र स्थिति यह है कि जिस विचारधारा ने मुस्लिमों और ईसाईयों को आरक्षण से वंचित किया था, वह विचारधारा अब उन्हें आरक्षण देना चाहती है, क्योंकि उस विचारधारा को हिन्दुओं ने वोट देना बंद कर दिया है, और उन्हें मुसलमानों का वोट चाहिए। इसलिए वे हिन्दू एससी, एसटी ओबीसी के आरक्षण का लाभ मुसलमानों को भी देना चाहती है।
जबकि दूसरी विचारधारा है, जो हिन्दुओं के आरक्षण को बचाने की वकालत कर रही है, वह एससी एसटी ओबीसी को कह रही है कि कांग्रेस सत्ता में आ गई तो उनके आरक्षण का कोटा मुसलमानों को दे देगी। जबकि मुसलमानों को आरक्षण की वकालत करने वाली विचारधारा एससी एसटी और ओबीसी को डरा रही है कि अगर मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन गए तो वह आरक्षण को खत्म ही कर देंगे।
अब मोदी और अमित शाह का सारा जोर इसी सफाई देने में लग रहा है कि ना वे संविधान खत्म करेंगे, न आरक्षण खत्म करेंगे। बल्कि एससी, एसटी, ओबीसी वोट बैंक को बचाने के लिए अमित शाह ने रायबरेली में अपने भाषण में यहाँ तक गारंटी दे दी कि जब तक संसद में भाजपा का एक भी सांसद होगा, तब तक आरक्षण को खत्म या कम नहीं होने दिया जाएगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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