Katchatheevu: कच्चाथिवू क्या सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह जाएगा?
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस आरोप को पूरी तरह नकार दिया है कि इंदिरा गांधी ने भारत और श्रीलंका के मध्य स्थित कच्चाथिवू द्वीप 1974 में श्रीलंका को गिफ्ट कर दिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरठ में चुनाव प्रचार की शुरुआत करते हुए इस मुद्दे को उठाया था, उसके बाद वह हर चुनावी रैली में इस मुद्दे को उठा रहे हैं।
विदेश मंत्री जयशंकर ने भी भाजपा के मंच से प्रेस कांफ्रेंस करके प्रधानमंत्री मोदी के आरोप की पुष्टि की है। कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेता मनीष तिवारी से प्रेस कांफ्रेंस करवा कर दो मकसद साधे हैं। एक तो उन अटकलों पर रोक लगा दी है कि वह भाजपा ज्वाईन करके आनंदपुर साहिब के बजाए चंडीगढ़ से चुनाव लड़ना चाहते हैं, दूसरे उन्होंने मोदी के आरोप का किसी भी अन्य कांग्रेस नेता के मुकाबले बेहतर ढंग से खंडन किया।

उन्होंने कहा कि जिस प्रधानमंत्री ने दक्षिण एशिया का नक्शा बदल कर बांग्लादेश नाम का अलग राष्ट्र बना दिया, क्या वह भारत की जमीन का एक भी ईंच किसी अन्य देश को दे सकती थी। अलबत्ता उन्होंने मोदी सरकार के समय चीन की तरफ से भारत के भूभाग पर कब्जा करने और बांग्लादेश को जमीन के आदान प्रदान में दस गुना जमीन बांग्लादेश को देने जैसे कुछ टेढ़े सवाल भी उठाए।
आरोप और खंडन के बीच कच्चाथिवू का इतिहास कुछ और कहता है। रामेश्वरम शिलालेख के अनुसार 1187 से 1196 तक श्रीलंका के राजा निस्संका मल्ला थे, उन्होंने श्रीलंका अधिकार क्षेत्र वाले टापूओं का भ्रमण किया था। श्रीलंका के इर्दगिर्द कच्चाथिवू जैसे कुल 11 टापू हैं, इनमें कच्चाथिवू भारत की तरफ आखिर में है।

एतिहासिक तथ्य यह है कि मध्यकाल तक कच्चाथिवू श्रीलंका के अधीन ही था। लेकिन सत्रहवीं सदी में भारत के मदुरै जिले की रामनाथपुरम सब डिविजन की राजशाही के अधीन हो गया था। 1870 में रामनाथपुरम के राजा (जमीन) ने डच कंपनी को कच्चाथिवू टापू पांच साल की लीज पर दिया था, जिसे 1890 तक बढाया जाता रहा।
ब्रिटिश राज के समय कच्चाथिवू मद्रास प्रेसीडेंसी के अंतर्गत था। 1920 में जब ब्रिटिश नौसेना ने इस निर्जन टापू का प्रेक्टिस के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया, तब टापू पर नियन्त्रण का विवाद शुरू हुआ। भारत की ब्रिटिश सरकार का मत था कि क्योंकि इस टापू पर रामनाथपुरम के राजा का अधिकार था इसलिए इस पर भारत की ब्रिटिश सरकार का अधिकार है।
एक समृद्ध भारतीय ईसाई मछुआरे श्रीनिवास पडईयाछी ने बीसवीं सदी की शुरुआत में ही कच्चाथिवू द्वीप में एक चर्च बनवा दिया था। लेकिन श्रीलंका ने कहा कि कच्चाथिवू पर बना सेंट एंटनी चर्च श्रीलंका की राजधानी जाफना के चर्च के अंतर्गत आता है, इसलिए कच्चाथिवू पर उसका अधिकार है। 1921 में भारत की ब्रिटिश सरकार और श्रीलंका सरकार ने एक समझौते में कच्चाथिवू को श्रीलंका का हिस्सा मान लिया। गलती वहीं से शुरू हुई।
आज़ादी के बाद तमिलनाडु में कच्चाथिवू की मल्कियत पर सवाल उठाया गया, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उस मांग को नजरअंदाज कर दिया। जबकि भारतीय मछुआरों के लिए यह टापू बहुत ही महत्वपूर्ण था। रामेश्वरम के मछुआरे वहां तक मछलियाँ पकड़ने जाते थे, और मछलियाँ पकड़ने के जाल सुखाने के लिए इस टापू का इस्तेमाल करते थे। लेकिन कच्चाथिवू पर मल्कियत का दावा दोनों तरफ से होता रहा।
1974 में इंदिरा गांधी ने तमिलनाडु की तरफ से कड़े विरोध के बीच समुद्री सीमांकन के द्विपक्षीय समझौते में कच्चाथिवू पर श्रीलंका का अधिकार स्वीकार कर लिया। यह समझौता रामसेतु और पाक स्ट्रेट के मध्य की समुद्री सीमा का सीमांकन करने के लिए हुआ था।
इसमें यह भी सहमति थी कि दोनों देशों के ईसाई अपने त्योहारों के मौके पर बिना पासपोर्ट और वीजा वहां जा सकेंगे। श्रीलंका और रामेश्वरम के ईसाई ईस्टर आदि त्योहारों के मौके पर वहां जाते हैं। 1974 के समझौते में यह भी था कि कच्चाथिवू के इर्दगिर्द दोनों देशों के मछुआरे मछलियाँ पकड़ने जा सकेंगे और अपना जाल सुखाने के लिए टापू का इस्तेमाल कर सकते हैं।
1976 में भारत और श्रीलंका में बंगाल की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी की समुद्री सीमा के सीमांकन का एक और समझौता हुआ। इस नए समझौते के मुताबिक़ दोनों देशों के मछुआरे एक दूसरे के क्षेत्र में मछलियाँ पकड़ने नहीं जाएंगे। इसके बाद समुद्री सीमा के सीमांकन का श्रीलंका, भारत और मालदीव में त्रिपक्षीय समझौता भी हुआ था।
1976 का समझौता भारतीय मछुआरों के हितों के खिलाफ था, जिसे श्रीलंका की नौसेना ने श्रीलंका के आंतरिक विद्रोह के समय कच्चाथिवू पर भी लागू कर दिया। भारत की संसद में इन समझौतों को रखा जरूर गया था, लेकिन संसद से इन समझौतों की पुष्टि नहीं करवाई गई थी। उस समय के विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह ने जब संसद में समझौते की जानकारी दी थी, तो द्रमुक सांसद इरा सेंझियन और फारवर्ड ब्लाक के सांसद मुकैया थेवर ने समझौते को असंवैधानिक करार देते हुए समझौते का विरोध किया था।
संसद से समझौते की पुष्टि नहीं करवाई गई थी इसलिए कच्चाथिवू की मल्कियत श्रीलंका के हवाले किए जाने की वैधता को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी गई थी। तमिलनाडु के सीमान्त रामेश्वरम के मछुआरों के लिए यह टापू बहुत ही महत्वपूर्ण है। उस क्षेत्र में जाते ही श्रीलंका की नौसेना भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार कर लेती है, इसलिए टापू को दुबारा हासिल करने के लिए तमिलनाडु में कई बार आन्दोलन हो चुके हैं।
लोकसभा और विधानसभा के हर चुनाव में कच्चाथिवू मुद्दा बनता रहा है। जयललिता ने 2011 के विधानसभा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाकर करुणानिधि सरकार को हरा दिया था। मुख्यमंत्री बनते ही जयललिता ने 1974 और 1976 के समझौतों को असंवैधानिक ठहराते हुए उन्हें रद्द करवाने के लिए सुप्रीमकोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की थी। सुप्रीमकोर्ट ने बेरुबारी केस में फैसला दिया हुआ था कि किसी भी देश के साथ हुए समझौते की संविधान संशोधन के अंतर्गत संसद से पुष्टि करवाई जानी चाहिए।
अगस्त 2013 में मनमोहन सिंह सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में एक हल्फिया बयान दिया जिसमें सरकार की तरफ से कहा गया था कि कच्चाथिवू ब्रिटिश भारत और श्रीलंका में विवादास्पद था क्योंकि समुद्री सीमाओं का सीमांकन नहीं हुआ था। मनमोहन सरकार ने हल्फिया बयान में यह भी कहा कि भारत का कोई क्षेत्र किसी को नहीं दिया गया है। क्योंकि दोनों देशों की समुद्री सीमाओं का सीमांकन नहीं हुआ था इसलिए क्षेत्र विवादास्पद था। कोई क्षेत्र हस्तांतरित नहीं किया गया है, इसलिए संविधान संशोधन की जरूरत नहीं है।
मौजूदा मुख्यमंत्री स्टालिन के पिता और द्रमुक के प्रमुख करुणानिधी ने केंद्र की मनमोहन सरकार के इस हल्फिया बयान की कड़े शब्दों में निंदा की थी। उन्होंने कहा था कि सब रजिस्ट्रार के दफ्तर में मौजूद दस्तावेज इस बात की पुष्टि करते हैं कि आज़ादी के समय कच्चाथिवू द्वीप भारत का हिस्सा था।
करुणानिधी ने अटल बिहारी वाजपेयी के एक बयान का हवाला दिया था, जिसमें वाजपेयी ने कथित तौर पर कहा था कि सोहार्दपूर्ण संबंधों के लिए भारत ने श्रीलंका के साथ गोपनीय समझौता किया था। तमिलनाडु में तो हर चुनाव में यह मुद्दा बनता रहा है, लेकिन यह पहला मौक़ा है जब किसी राष्ट्रीय दल ने कच्चाथिवू को चुनावी मुद्दा बनाकर पिछली केंद्र सरकारों को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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