Manipur Violence: मेइति समुदाय को जनजाति दर्जा देने पर मणिपुर में हिंसा क्यों?
मेइति समाज के युवा मणिपुर में हुई हिंसा के तीसरे दिन 05 मई को दिल्ली के जंतर मंतर पर इकट्ठा हुए। वहां उस समय मीडिया की भारी मौजूदगी थी, लेकिन मेइति लोगों की पीड़ा बताने में किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।

Manipur Violence: इसे हमारी अज्ञानता कहें या अनजानापन कि पूर्वोत्तर के लोगों से हम जुड़ नहीं पाते। न उनकी पीड़ा में, न उनकी खुशी में। ऐसा ही कुछ इस समय मेइति समाज के लोगों के साथ भी हो रहा है। जब उसी समाज के नौजवान दिल्ली के जंतर मंतर पर अपना दर्द बताने आये तो हमने उनकी ओर देखा तक नहीं।
मणिपुर हिंसा की शुरूआत तीन मार्च को हुई, जब चुराचांदपुर जिले के तोरबंग इलाके में 'ऑल ट्राइबल स्टूडेंट यूनियन मणिपुर' (एटीएसयूएम) के नगा और कुकी छात्रों द्वारा 'शांतिपूर्ण विरोध यात्रा' निकाली गई। मणिपुर के रहने वाले विष्णु बताते हैं कि उसके पास ऐसे कई वीडियो हैं, जिसमें कथित शांतिपूर्ण प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों ने हाथों में हथियार ले रखे हैं। नगा और कुकी लोगों के पास म्यांमार के रास्ते से हथियार आते हैं। विष्णु का दावा है कि उनके पास जिस तरह के आधुनिक हथियार हैं, उस तरह के हथियार मणिपुर की पुलिस के पास भी नहीं है।
मेइति का स्वागत क्यों नहीं?
जब एक समाज के लोग दूसरे समाज में शामिल होते हैं तो भारत के अंदर उनके स्वागत की परंपरा है। हमने देखा है कि किस तरह कन्वर्जन कराने वाला समूह जब एक परिवार को कन्वर्जन के लिए तैयार कर लेता है तो उनके स्वागत में कितने बड़े-बड़े आयोजन करता है। जबकि मणिपुर में लाखों की संख्या में मेइति समाज के लोग जब उच्च न्यायालय के आदेश से कुकी और नगा समाज की तरह जनजातीय समाज का हिस्सा होने वाले हैं तो उनका स्वागत नहीं हो रहा। इससे मणिपुर के अंदर जनजातीय समाज की संख्या बढ़ेगी और इससे उनकी ताकत और मजबूत होगी। फिर सवाल है कि कुकी और नगा उनके जनजातीय समाज में आने का स्वागत क्यों नहीं कर रहे? आइए इस प्रश्न को सुलझाते हैं।
विरोध मेइति के जनजाति होने का
मणिपुर में 16 जिले हैं। यह राज्य इंफाल घाटी और पहाड़ी जिलों में बंटा हुआ है। मणिपुर के पहाड़ी जिलों में नगा और कुकी जनजातियों का वर्चस्व है। इंफाल क्षेत्र में मेइति बहुमत में हैं। नगा और कुकी धर्मान्तरित ईसाई हैं।
देश के कई हिस्सों में जनजाति समाज के लोगों ने धर्मान्तरित समुदायों को आरक्षण का लाभ देने का विरोध किया है। इसी साल 10 फरवरी को समाज के लोगों ने भोपाल में जनजाति गर्जना डिलिस्टींग रैली का आयोजन किया था। जिसमें मांग की गई कि सरकार देश भर में जनजाति समाज का सर्वेक्षण करके उन लोगों को आरक्षण से बाहर करें, जिन्होंने जनजाति समाज को छोड़कर दूसरा धर्म अपना लिया है।
मणिपुर हिंसा का पीड़ित जो मेइति समुदाय है उसकी मणिपुर में पचास फीसदी से अधिक आबादी है। वहीं कुकी जातीय समूह में कई अन्य जनजातियां भी शामिल हैं। ये लोग मुख्य रूप से पहाड़ी क्षेत्र में रहते हैं। राज्य की आबादी में इनका योगदान 30 फीसदी हैं। मणिपुर की कुल आबादी लगभग 28 लाख है। एक तरफ नगा और कुकी समाज को लगता है कि जनजातीय क्षेत्रों में डिलिस्टींग की जो मांग उठ रही है, वह आज नहीं तो कल उनके क्षेत्र में भी उठेगी।
दूसरी तरफ मणिपुर उच्च न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह 10 साल पुरानी सिफारिश को लागू करे, जिसमें गैर-जनजाति मेइति समुदाय को जनजाति समुदाय में शामिल करने की बात कही गई थी। मतलब मेइति मणिपुर के अंदर जनजाति समाज में शामिल होंगे, वहीं धर्मान्तरित कुकी और नगा समाज के जनजाति स्टेटस पर सवाल उठ सकते हैं। इसलिए वे मणिपुर में मेइति समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का विरोध कर रहे हैं। तीन मई को उच्च न्यायालय के आदेश के बाद इंफाल घाटी में स्थित मेइति और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कुकी समुदाय के बीच हिंसा भड़क उठी।
मेइति मणिपुर में प्रमुख जातीय समूह है और कुकी सबसे बड़ी जनजातियों में से एक है। एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि पचास फीसदी से अधिक आबादी होने के बावजूद मेइति मणिपुर के सिर्फ 10 फीसदी भूभाग पर हैं। शेष 90 फीसदी जमीन पर कुकी और नगा जनजातियों का अधिकार है।
बचाव के काम में मुस्तैद सेना के जवान
मणिपुर में इन सवालों पर भड़की हिंसा में मेइति समाज की भारी क्षति हुई है लेकिन इस हिंसा में कुकी भी प्रभावित हुए हैं। खबर आ रही है कि इंफाल में कुकी बहुल लांगोल क्षेत्र के 500 से अधिक कुकी समुदाय के लोग अपना घर छोड़कर जा चुके हैं और उन्हें लम्फेलपत में सीआरपीएफ के कैम्प में रखा गया है। इंफाल घाटी में कुछ पूजा स्थलों को भी आग के हवाले किया गया है। सुरक्षाबलों द्वारा हिंसा प्रभावित क्षेत्रों से निकालकर सुरक्षित जगहों पर पहुंचाए जाने वालों का सरकारी आंकड़ा 13,000 से अधिक लोगों का है।
सेना हिंसा प्रभावित क्षेत्रों से लगातार लोगों को बाहर निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा रही है। सिर्फ चुराचांदपुर से 5,000 लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया है। 2,000 लोगों को इंफाल घाटी से निकाला गया है। मेइति बहुल इंफाल पश्चिम, काक्चिंग, थौबल, जिरिबाम और विष्णुपुर जिलों तथा आदिवासी बहुल चुराचांदपुर, कांगपोकपी और तेंगनौपाल जिलों में कर्फ्यू है।
मणिपुर पुलिस की वर्दी पहन कर आए हमलावर
मणिपुर में सबसे अधिक हिंसाग्रस्त जिला चुरचांदपुर रहा। चुरचांदपुर में 05 मई को सीआरपीएफ के एक कोबरा कमांडो की हत्या हिंसक प्रदर्शन में कर दी गई। उसके बाद सीआरपीएफ हरकत में आई। मणिपुर के अंदर सीआरपीएफ के जितने भी जवान छुट्टी पर गए थे। सबको सूचना की गई कि उन्हें जरा सा भी खतरे का अंदेशा होता है तो वे बेस कैम्प से संपर्क करें। उन्हें फौरन सुरक्षा मुहैया कराई जाएगी। जिस जवान की हत्या हुई है, उनका नाम कॉन्सटेबल चोनखोलन हाओकिप बताया जाता है। मीडिया में आई खबरों के अनुसार हत्यारों ने पुलिस की वर्दी पहनी हुई थी और उन्होंने सीआरपीएफ जवान के गांव में घुस कर उनकी हत्या की। मणिपुर में तीन दिनों तक चली हिंसा में 18-20 लोगों की मृत्यु की सूचना है। इस हिंसा में 100 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
एक्शन में केन्द्र
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 04 मई को मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह से बात की। उसके बाद मणिपुर हिंसा को नियंत्रित करने को लेकर केन्द्र सक्रिय हो गया। स्थिति को देखते हुए 'रैपिड एक्शन फोर्स' की कई टीम मौके पर भेजी गई। वहीं, शांति और सार्वजनिक व्यवस्था को बरकरार रखने के लिए मणिपुर में पांच दिनों के लिए इंटरनेट सेवाओं को निलंबित कर दिया गया। सुरक्षा बलों द्वारा त्वरित कार्रवाई के चलते हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों से सभी समुदाय के लोगों को सुरक्षित निकाला गया। सेना की तैनाती के बाद चुराचांदपुर, केपीआई, मोरेह और काकिंग में स्थिति अब नियंत्रण में है और 04 मई की रात से किसी बड़ी घटना की सूचना नहीं है।
मणिपुर में हिंसा से निपटने के लिए सेना की 100 टुकड़ियों को तैनात किया गया है। सेना ने 05 मई को कई जिलों में फ्लैग मार्च किया। केन्द्र की पूरे मामले पर सक्रियता का परिणाम था कि 05 मई की शाम तक स्थिति पर पूरी तरह नियंत्रण पा लिया गया लेकिन आशंका जताई जा रही है कि यह हिंसा फिर कभी भी भड़क सकती है, इसलिए सावधानी रखने की आवश्यकता है।
Recommended Video

लेकिन हमारे लिए सवाल मणिपुर के शासन प्रशासन का नहीं बल्कि सवाल मणिपुर के उन मैतेयी लोगों का है जो अपनी बात बताने जंतर मंतर पर आते तो हैं लेकिन हम उनकी बात को सुनते तक नहीं हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications