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Modi Agenda: यूरोपीय देशों में ईसाई सेक्युलरिज्म है, तो भारत में हिन्दू सेक्युलरिज्म से आपत्ति क्यों?

सेक्युलररिज्म के नाम पर धर्म विरोध की राजनीति करने वाले सभी राजनीतिक दलों को समझ नहीं आ रहा कि मोदी के हिन्दू राष्ट्र के दांव का मुकाबला कैसे किया जाए।

why objection to Hindu secularism in India when Christian secularism in European countries

Modi Agenda: सवा दो साल की बहुत छोटी अवधि में इतनी विशाल इमारत का खड़ा होना निर्माण कला में भारतीय कुशलता का प्रमाण है। जबकि संसद भवन परिसर के भीतर ही खड़ी लाईब्रेरी की इमारत बनाने में दस साल से ज्यादा वक्त लग गया था| नई इमारत के भीतर की सुविधाओं और निर्माण की कितनी भी तारीफ़ कर लें, जो बाहरी भव्य रूप ब्रिटिश काल में बनी 144 खंभों वाली गोलाकार संसद का है, उसका मुकाबला नई इमारत नहीं कर सकती| अंग्रेजों ने इस गोलाकार इमारत का डिजाईन कोई ब्रिटेन से आयात नहीं किया था, बल्कि मुरैना के पास बने एक बहुत ही प्राचीन मन्दिर के डिजाईन से लिया था| वह मन्दिर आज भी मौजूद है और उसे मितावली-पडावली के चौसठ योगिनी मन्दिर के नाम से जाना जाता है|

why objection to Hindu secularism in India when Christian secularism in European countries

नए संसद भवन के साथ ही भारतीय राजनीति भी नया मोड़ ले रही है| हालांकि नए संसद भवन में भारतीय संस्कृति की वे झलकियां शायद नहीं हैं, जो पुराने संसद भवन के कोरिडोर में मौजूद हैं| अगर रामायण और महाभारत की वे तस्वीरें नए संसद भवन के कोरिडोर में भी स्थापित हो जाएं तो सोने पर सुहागा होगा|

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नए संसद भवन से उस सांकृतिक राष्ट्रवाद की नींव रख दी है, जिसे 30 साल पहले लालकृष्ण आडवानी ने भारतीय जनमानस में बिठाना शुरू किया था| सत्ता हस्तांतरण के हिन्दू प्रतीक चिन्ह सेंगोल की संसद भवन में स्थापना सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की शुरुआत है| यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि हनुमान की गदा की तरह बने इस सेंगोल पर भगवान शिव की सवारी नन्दी के साथ मां लक्ष्मी, सूर्य देवता और कमल भी विराजमान हैं|

सेंगोल की स्थापना से जवाहर लाल नेहरू का सेक्युलरिज्म खतरे में पड़ गया है, क्योंकि संसद भवन के भीतर मूर्ती स्थापना हो गई है| जवाहर लाल नेहरू ने सेंगोल को इसीलिए संसद भवन में स्थापित नहीं किया था, क्योंकि इस पर भगवान शिव की सवारी नन्दी की मूर्ती और मां लक्ष्मी की मूर्ति बनी है| जबकि लार्ड माउंटबेटन ने खुद सेंगोल को अपने हाथों में लिया था, इसके बाद तमिल ब्राह्मणों ने प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार सेंगोल को गंगा जल से पवित्र करके जवाहर लाल नेहरू को सौंपा था|

अब जब नरेंद्र मोदी ने सेंगोल को संसद भवन में स्थापित करने का फैसला किया तो कांग्रेस ने सत्ता हस्तांतरण के समय जवाहर लाल नेहरू को सेंगोल सौंपने की बात को कपोल कल्पित कहानी बता कर खारिज करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है| देश के सौ करोड़ हिन्दू भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उदय होने की इस घटना से प्रफ्फुलित हैं, तब जवाहर लाल के सेक्युलरिज्म पर माफी मांगने की बजाए कांग्रेस ने मुस्लिम वोट बैंक के चक्कर में फिर वही गलती कर दी है|

सत्ता हस्तांतरण से पहले लार्ड माउंटबेटन ने जवाहर लाल नेहरू से पूछा था कि आप के यहां सत्ता हस्तांतरण किस तरह होता है| नेहरू नाम के ही पंडित थे, भारतीय संस्कृति और परंपराओं के बारे में उन्हें कुछ पता ही नहीं था| उन्होंने चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी से पूछा, तो राजाजी ने उन्हें बताया कि राजदंड या सेंगोल भारतीय सांस्कृतिक सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक है| तब तमिलनाडु से विशेष सेंगोल बनवाकर मंगवाया गया था|

सत्ता हस्तांतरण का वह प्रतीक चिन्ह राजदंड तमिल ब्राह्मणों की उपस्थिति में जवाहर लाल नेहरू को सौंपा गया था| जवाहर लाल नेहरू ने उसे सम्मानपूर्वक ले तो लिया, लेकिन यूरोपीय विचारधारा से प्रभावित नेहरू ने अपनी सेक्युलर छवि बनाने के चक्कर में सेंगोल को संसद में स्थापित नहीं किया| अलबत्ता इलाहाबाद के आनन्द भवन के अपने व्यक्तिगत संग्रहालय में यह लिख कर रखवा दिया कि यह नेहरू को गिफ्ट में मिली वाकिंग स्टिक है|

यह सारी कहानी अब लोगों के सामने आ चुकी है, जिसे कांग्रेस ने 75 साल से देश से छिपाए रखा था। इस पूरी कहानी को कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने कपोल कल्पित कह कर हिन्दुओं के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है| अमेरिका से प्रकाशित टाईम मैगजीन में सेंगोल सौंपे जाने की पूरी घटना का जिक्र 25 अगस्त 1947 के अंक में प्रकाशित है, चेन्नई से प्रकाशित हिन्दू अखबार में इस घटना के बारे में 11 अगस्त को ही विस्तृत रिपोर्ट छप गई थी|

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    कांग्रेस और अन्य नेहरूवादी सेक्युलर पार्टियों के लिए सेंगोल की संसद में स्थापना को पचाना आसान काम नहीं है, लेकिन एक बार सेंगोल की स्थापना हो गई है, तो हिन्दू जनमानस को नजरअंदाज करके इसे हटाना आसान नहीं होगा, जैसे कांग्रेस कर्नाटक में हिजाब पर लगा बैन हटा सकती है, धर्मांतरण पर लगी रोक हटा सकती है या गौहत्या पर लगा प्रतिबन्ध हटा सकती है|

    पिछले दिनों जब अरशद मदनी ने कहा कि कांग्रेस कर्नाटक में बजरंग दल पर पाबंदी लगा कर 70 साल पुरानी गलती सुधारेगी, तो केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि 70 साल पहले अगर कांग्रेस गलती न करती, और सारे मुसलमानों को पाकिस्तान भेज दिया होता, तो आज भारत में न कोई जाकिर मियां होता, न असदुद्दीन होता और न ही मदनी पैदा होता| एक केन्द्रीय मंत्री का यह बयान साफ़ संकेत है कि मोदी सरकार कांग्रेस की 1947 की गलतियों को सुधार कर देश को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित सर्वधर्म समभाव वाला राष्ट्र बनाने के लिए आगे बढ़ रही है|

    सत्ता हस्तांतरण के भारतीय सांस्कृतिक प्रतीक चिन्ह सेंगोल को नए संसद भवन में स्थापित करके नरेंद्र मोदी ने उस गलती को सुधारने का काम किया है, जो धर्म विहीन सेक्युलरिज्म के नाम पर नेहरू ने की थी| मोदी के इस अभूतपूर्व कदम को हिंदू धर्म विरोधी सेक्युलरिज्म पर आश्रित विपक्ष पर सांस्कृतिक और राजनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक कहना गलत नहीं होगा| मोदी ने 2019 का लोकसभा चुनाव पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक करके जीता था, तो इस बार विपक्ष की सेक्युलर राजनीति पर सर्जिकल स्ट्राईक शुरू हो गई है|

    मोदी उसी तरह भारत को सेक्युलर हिन्दू राष्ट्र बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, जैसे ब्रिटेन या बाकी यूरोपियन देश क्रिश्चियन सेक्युलर डेमोक्रेटिक देश हैं| सेक्युलरिज्म के नाम पर धर्म विरोध की राजनीति करने वाले सभी राजनीतिक दलों को समझ नहीं आ रहा कि मोदी के हिन्दू राष्ट्र के दांव का मुकाबला कैसे किया जाए| वे सिर्फ संविधान की दुहाई दे रहे हैं, जो भारत के सौ करोड़ हिन्दू जनमानस के गले नहीं उतरती|

    भारत का 60-70 प्रतिशत हिन्दू तो यह मानने लगा है कि उसकी सभी समस्याओं का कारण नेहरू का हिन्दू विरोधी सेक्युलरिज्म ही है| 2014 में शानदार जीत के बाद नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने पहले भाषण में कहा था कि 1200 साल की ग़ुलामी भरी मानसिकता हमें परेशान कर रही है| उनका यह बयान कांग्रेस और बाकी सेक्युलर दलों की धारणा के एकदम उलट है, जो मुगल शासन को गुलामी का कालखंड ही नहीं मानते|

    मोदी राज में हिन्दुओं ने पांच सौ साल से चल रही रामजन्मभूमि की लड़ाई ही नहीं जीती, काशी विश्वनाथ कोरिडोर का निर्माण हिन्दुओं की दूसरी बड़ी जीत है| 286 साल बाद काशी विश्वनाथ मन्दिर का वह पुराना भव्य रूप उभर कर सामने आया| पिछले साल मोदी ने उज्जैन के महाकाल मन्दिर के कोरिडोर का उद्घाटन किया है| कृष्णजन्मभूमि और ज्ञानवापी मंडप को मुक्त करवाने के मुकद्दमें नए सिरे से चल रहे हैं, जिन पर नरसिंह राव की कांग्रेस सरकार ने क़ानून बनाकर रोक लगा दी थी| अब नरेंद्र मोदी अपने अजमेर दौरे में पुष्कर कोरिडोर की घोषणा करने की तैयारी कर रहे हैं|

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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