OBC Reservation: ओबीसी को आरक्षण देने में परेशानी क्यों?
राजनीतिक दलों और नेताओं ने अपनी सारी विफलताओं और अकर्मण्यताओं को छिपाने के लिए आरक्षण को अब एक ऐसा हथियार बना लिया है, जिसका प्रयोग वहां भी किया जाने लगा है, जहां वास्तव में इसकी कोई ज़रूरत है ही नहीं। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करना एक ऐसा ही कदम है।
बल्कि यूं कहें कि एक ऐसा असंवैधानिक कदम है, जिसे लगभग सभी राजनीतिक दलों ने एकमत से संविधानसम्मत होने का जामा पहनाकर देश के संविधान का हिस्सा बना दिया है। महिलाओं को समान अवसर मुहैया कराने के नाम पर यह हमारे लोकतंत्र में लिंगभेद का सीधा-सीधा उदाहरण है, जिसके तहत एक तिहाई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर पुरुषों को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा।

देश के तमाम राजनीतिक दलों ने एक साथ मिलकर यह असंवैधानिक कदम इस तथ्य के बावजूद उठाया कि महिलाओं को पुरुषों के समान अवसर मुहैया कराने के लिए उन्हें आरक्षण देने की नहीं, बल्कि चुनाव में टिकट देने की ज़रूरत थी। आज यदि लोकसभा में लगभग 15 प्रतिशत सांसद ही महिलाएं हैं, तो इसका एकमात्र कारण यह है कि प्रमुख राजनीतिक दलों ने लगभग इतने ही प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिये। यदि वे उन्हें 33 प्रतिशत या 50 प्रतिशत टिकट देते, तो आज बिना किसी आरक्षण के ही 33 प्रतिशत या 50 प्रतिशत सांसद महिलाएं होतीं।
मतलब साफ है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करना महज एक राजनीतिक शिगूफा है, जिसे देश के कुछ राजनीतिक दलों ने महिलाओं के सशक्तिकरण की मंशा से नहीं, बल्कि अपने-अपने चुनावी लाभ के मकसद से पिछले 27 वर्षों से उछाल रखा था। लेकिन ऊपर से एकमत दिखाई देने वाले सत्ता पक्ष और विपक्ष ने एक बार फिर से इसमें अपना-अपना फच्चर फंसा दिया है। सत्ता पक्ष ने जहां जनगणना और परिसीमन के बाद महिलाओं को आरक्षण देने की बात कही है, वहीं विपक्षी दलों ने कहा है कि जातीय जनगणना कराइए और महिला आरक्षण में ओबीसी महिलाओं का कोटा भी निर्धारित करके इसे तुरंत लागू कीजिए।
मतलब सत्ता पक्ष ने यदि सोचा होगा कि महिला आरक्षण की आड़ में आधी आबादी के वोट सफाचट कर जाएंगे, तो विपक्ष ने भी उस आधी आबादी के वोट में ओबीसी के नाम पर सेंधमारी करने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया है। सत्ता पक्ष में भी उमा भारती और अनुप्रिया पटेल जैसी नेत्रियां हैं, जो महिला आरक्षण में ओबीसी कोटे की खुलकर वकालत कर रही हैं।
लेकिन इस पूरे विवाद के केवल राजनीतिक ही नहीं, कुछ व्यावहारिक पहलू भी हैं। जैसे, यदि आरक्षण-व्यवस्था की तमाम खामियों को एक तरफ रखते हुए इसे ही समाज से हर तरह की गैर-बराबरी और भेदभाव दूर करने का असली समाधान मान लिया जाए, तो फिर ओबीसी कोटे की मांग में क्या गलत है? गैर-बराबरी और भेदभाव तो उनके साथ भी हो रहा है! और यदि नहीं हो रहा है तो संविधान ने उन्हें भी शिक्षा और नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण क्यों दिया हुआ है? तो फिर टुकड़ों में न्याय का क्या मतलब है? न्याय हो तो सबके साथ हो, एक साथ हो और एक समान सिद्धांत पर आधारित हो।
इसलिए पहली बात तो यह है कि जब एससी-एसटी को आबादी के हिसाब से आरक्षण मिला हुआ है, तो यदि ओबीसी भी अपनी आबादी का सही-सही पता लगाने के लिए जातीय जनगणना की मांग करते हैं, तो इसमें अनुचित क्या है? गुड़ खाएंगे और गुलगुले से परहेज करेंगे तो कैसे चलेगा? जाति के आधार पर आरक्षण देंगे, संरक्षण भी देंगे, लेकिन जातीय जनगणना नहीं कराएंगे, तो इसका क्या मतलब है? इसलिए भले ही कुछ राजनीतिक दल आज ओबीसी राजनीति के चक्कर में जातीय जनगणना की मांग कर रहे हैं, लेकिन यह मांग न तो गलत है, न ही कोई दल इससे असहमत प्रतीत होता है, क्योंकि बिहार में हमने देखा कि नीतीश कुमार की सरकार ने जब जातीय जनगणना का प्रस्ताव रखा, तो भारतीय जनता पार्टी भी उसके समर्थन में थी।
दूसरी बात यह भी है कि अनुसूचित जातियों और जनजातियों को न केवल सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 22.5 प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है, बल्कि संसद और विधानसभाओं में भी लगभग इसी अनुपात में आरक्षण मिला हुआ है। इसके उलट, ओबीसी को शिक्षा और नौकरी में तो आरक्षण है, लेकिन संसद और विधानसभाओं में क्यों नहीं है? इसलिए न्याय का तकाजा तो यह है कि जब तक जातीय जनगणना नहीं होती और ओबीसी के लिए आरक्षण में कोई दूसरा हिस्सा निर्धारित नहीं होता, तब तक ओबीसी के लिए भी संसद और विधानसभाओं में 27 प्रतिशत सीटें रिज़र्व कर देनी चाहिए। और फिर जैसे एससी-एसटी कोटे की सीटों में से उनकी महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें मिलेंगी, वैसे ही ओबीसी कोटे की सीटों में से उनकी महिलाओं को भी 33 प्रतिशत सीटें दे दी जाएं।
लेकिन आरक्षण वाला न्याय यहीं पूरा नहीं होगा। जब आप एससी-एसटी के बाद ओबीसी को भी संसद और विधानसभाओं में आरक्षण दे देंगे, तो फिर आपको ईडब्ल्यूएस को भी यह आरक्षण देना चाहिए, क्योंकि संविधान ने उन्हें भी कमज़ोर मानकर शिक्षा और नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण दे दिया है। इसलिए 10 प्रतिशत आरक्षण उन्हें भी संसद और विधानसभाओं में चाहिए होगा। फिर उस 10 प्रतिशत में बेशक 33 प्रतिशत सीटें उनकी महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी जाएं।
इन उपायों के जरिए, जब संसद और विधानसभाओं में लगभग 60 प्रतिशत सीटें विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षित हो जाएंगी और बची हुई 40 प्रतिशत सीटों में भी 33 प्रतिशत सीटें बचे हुए वर्गों की महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी, तो संसद और विधानसभाओं की कुल 73 प्रतिशत सीटों पर आरक्षण हो जाएगा।
फिर चूंकि देश में चुनावी लोकतंत्र है, तो असदुद्दीन ओवैसी जैसों की आवाज़ें भी आज नहीं तो कल, असर तो ज़रूर दिखाएंगी। कोई न कोई पार्टी ज़रूर आएगी, जो मुसलमानों के आरक्षण के दावे को भी स्वीकार कर ही लेगी, क्योंकि एक तो उनकी भी अच्छी-खासी आबादी है और दूसरे वे लोग भी कम पिछड़े थोड़े ही हैं! और उनकी महिलाएं तो इतनी पिछड़ी हैं कि मौजूदा सरकार ने ही उन्हें तीन तलाक से मुक्ति दिलाने के लिए कानून बनाया है! इसलिए आज नहीं तो कल उन्हें भी आगे लाना होगा और आबादी के हिसाब से अवसरों की समानता देनी होगी।
इसलिए असली न्याय तो तब पूरा होगा, जब एक-एक जाति, एक-एक संप्रदाय की जनगणना पूरी करवाने के बाद देश के हर क्षेत्र की 100 प्रतिशत सीटें उन सबकी आबादी के हिसाब से आरक्षित कर दी जाएं। 100 प्रतिशत आरक्षण के बाद, जब अलग-अलग वर्गों में से सैंकड़ों अलग-अलग जातियां निकलकर बोलेंगी कि हमारे साथ न्याय नहीं हो रहा, अमुक कोटे में हमारा भी इतना प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए, उस वक्त की समस्या को उस वक्त की सरकार पर छोड़ दिया जाना चाहिए, क्योंकि सारी समस्याएं यदि हमारी ही पीढ़ी सुलझा देगी, तो अगली पीढ़ी क्या करेगी? भारत माता की जय! वन्दे मातरम्। जय हिन्द।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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