Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

लव जिहाद की शिकार लड़कियों से गलती कहाँ हो रही है?

झारखंड की अंकिता का मामला इन दिनों चर्चा में है। हर व्यक्ति के मन में कई प्रश्न खड़े हो रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों लड़कियों और वह भी नाबालिग लड़कियों पर ऐसे हमले हो रहे हैं? अंकिता वाले मामले में हालांकि दो तीन तस्वीरें इस दावे के साथ सामने आईं कि हत्यारोपी शाहरुख़ से उसकी दोस्ती थी, परन्तु अभी पुलिस इन तस्वीरों की जाँच कर रही है और उन्हें फॉरवर्ड करने वालों को हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही है।

why innocent girls get trapped in Love Jihad

अंकिता ने मरते मरते जो बयान दिया था, वह हर किसी को झकझोरने वाला है, तो वहीं दिल्ली में उस लड़की, जिसे अरमान ने गोली मार दी, के पिता ने बताया कि मुस्लिम लड़का उनकी लड़की से हिन्दू नाम से सोशल मीडिया पर मिला था। मगर उस लड़की को जैसे ही पता चला कि वह मुस्लिम है, तो उसने बात करनी बंद कर दी, जिसके परिणामस्वरुप उसे गोली मार दी गयी।

यह भी मामला बहुत हैरान करने वाला इसलिए है क्योंकि बच्ची अभी मात्र कक्षा 11 में पढ़ रही है, और मीडिया के अनुसार अरमान दो साल पहले लड़की के साथ सोशल मीडिया से सम्पर्क में आया था। अर्थात जब वह 14 वर्ष की लड़की थी, तब ही अरमान ने दोस्ती के नाम पर फंसा लिया था।

यह चौदह वर्ष पर दोस्ती वाला मामला ही परेशान करता है क्योंकि चौदह साल की उम्र तो ऐसी बातों के लिए परिपक्व नहीं है। बच्ची अभी बच्ची ही होती है, उसमें न ही अक्ल होती है और न ही उसे दुनियादारी का पता होता है, फिर ऐसा क्या होता है कि उसके लिए बॉयफ्रेंड का होना अनिवार्यता हो जाती है, जिसका यह कट्टरपंथी अपराधी फायदा उठाते हैं और अपना एजेंडा चलाते हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है? इसके पीछे क्या कारण है कि अपने कथित प्यार के लिए लड़कियां अपने माता-पिता को ही शत्रु मानने लगती हैं?

पाठ्यपुस्तकों की भूमिका
यद्यपि यह सुनने में कुछ अजीब लग सकता है, परन्तु प्रश्न कई बार ऐसा उठता है कि क्या हमारी लड़कियों को पाठ्यपुस्तकों में कुछ ऐसा पढ़ाया जा रहा है, जिससे उनके मन और मस्तिष्क में अपने ही परिवार और समाज के खिलाफ विद्रोह की भावना बलवती हो रही है? क्या जानबूझकर उनके दिल में एक समुदाय विशेष के प्रति लगाव उत्पन्न किया जा रहा है?

हालांकि यह अजीब है, परन्तु एनसीईआरटी की कक्षा 6 से लेकर 12 तक की पुस्तकों की विषय वस्तु को देखा जाए तो यह अजीब नहीं लगता है। इन पाठ्यपुस्तकों को वर्ष 2006-07 में मनमोहन सरकार ने आते ही लागू करवा दिया था। इन पाठ्यपुस्तकों को लिखने में कई ऐसे लोग शामिल थे जिनका आधिकारिक स्टैंड कहीं न कहीं भारत विरोधी एवं हिन्दू विरोधी है। वह एक ख़ास विचारधारा का पालन करने वाले हैं।

पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से कक्षा 6 से ही बच्चों के मन में यह भावना डाली जाने लगती है कि अब तक औरतों को बहुत दबाकर रखा गया था। प्राचीन काल में लड़कियों को पढने का अधिकार नहीं था, उन्हें प्रताड़ित किया जाता था आदि आदि! जैसे संस्कृत में कक्षा 7 में पंडिता रमाबाई पर अध्याय है और उसमें है कि कैसे पंडिता रमाबाई को संस्कृत नहीं पढने दिया जाता था, कैसे हिन्दू समाज ने उन्हें प्रताड़ना दी थी, और कैसे वह ईसाई धर्म की ओर आकर्षित हुई थीं। जब लड़किया अबोध उम्र में ऐसी बातें पढती हैं तो कहीं न कहीं लड़कियों के मन में यह बात बैठती जाती है कि जो हिन्दू धर्म है, उसमें लड़कियों को आदर नहीं मिलता है, क्योंकि उसमें लड़कियों को पढने की आजादी नहीं थी।

मगर जब पंडिता रमाबाई विषय में यह कहा गया कि पढ़ना मना था, उसी समय डॉ आनंदी बाई जोशी भी थीं, जो डॉक्टर बनने के लिए अमेरिका गयी थीं। हालांकि समाज की कठिनाई उनके सामने भी आईं थीं, फिर भी उन्होंने अपने धर्म की आलोचना के स्थान पर अपनी पढ़ाई एवं डिग्री को महत्व दिया। लेकिन ऐसे उदाहरणों को पुस्तकों में स्थान नहीं दिया गया है, जो लड़कियों को भारतीयता से जोड़े रह सके।

ऐसे ही कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में विविधता के नाम पर यही लिखा गया है कि एक वर्ग विशेष है जो बहुत गरीब है, वह दंगों का शिकार होता है। इतना ही नहीं स्कूल की बच्चियों को, जिन्हें राजनीति का क ख ग भी नहीं आता, उन्हें कम्युनिस्ट संगठन इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) की लिखी "क्रांतिकारी" और "विद्रोही" कविता पढ़ाई जाती है।

अधिकाँश हिन्दू लडकियाँ विचलन का शिकार इसलिए भी हो रही हैं क्योंकि सामाजिक परिवेश छिन्न भिन्न हो जाने के कारण उनके पास मात्र स्कूल या कोचिंग ट्यूशन के ही दोस्त होते हैं। बड़ी होती हिन्दू समाज की लड़कियां अपने समाज के प्रति एक अजीब हीनभावना के साथ आगे बढ़ती हैं। शहरों में उनका कोई सामाजिक एवं धार्मिक सर्कल नहीं होता है, तो वह संवाद के लिए मात्र अपने स्कूल या फिर अब सोशल मीडिया तक सीमित रहती हैं।

ऐसे में उनमें एक बेमतलब के विद्रोह की भावना भर जाती है कि बस जैसे भी हो, अपने इस परिवार और समाज से दूर जाना है, क्योंकि यह परिवार और समाज लड़कियों के लिए दमनकारी है। उस दूर जाने के बाद क्या होगा, उन्हें यह नहीं पता! मगर जाना है।

लड़कियों को पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से ऐसा साहित्य परोसा जाता है कि उनके दिल में अपने ही रीतिरिवाजों और सामाजिक व्यवस्था के प्रति विद्रोह से भर जाता है। जैसे कक्षा दस में पढ़ाई जाने वाली एक कविता देखिए जो कन्यादान पर लिखी गयी है।

कितना प्रामाणिक था, उसका दुख
लड़की को दान में देते वक्त
जैसे वही उसकी अंतिम पूंजी हो
मां ने कहा, पानी में झांककर
अपने चेहरे पर मत रीना
आग रोटियां सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री जीवन के
मां ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी दिखाई मत देना

जो लड़की अबोध अवस्था में अपनी पाठ्यपुस्तकों में यह सब पढेगी वह कन्यादान, विवाह आदि से विद्रोह नहीं करेगी तो क्या करेगी? उसके दिल में स्त्री विमर्श के नाम पर यह भर दिया गया है कि कन्यादान शोषण है! उसके लिए दान की पूरी अवधारणा ही बदल कर रख दी गयी है और वह सीधे सीधे अपने परिवार से लड़ जाती है और कहती है कि कन्यादान क्यों?

फ़िल्में और रियल्टी शो

एक ओर लड़की यह सब अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ रही होती है कि विवाह, कन्यादान आदि बेकार हैं, समाज औरतों पर अत्याचार करता है आदि आदि, तो वहीं उसकी इन आहत कल्पनाओं पर रुई का फाहा लगाने के लिए फ़िल्में हैं। फिल्मों में स्कूल और कॉलेज में प्यार को इतना रोमांटिसाइज़ किया गया है कि लड़कियों को लगता है कि उनके इस विद्रोह का हल एक ही है, और वह है बॉयफ्रेंड!

शहरी खोखले जीवन में जहाँ माँ और बाप के पास समय नहीं है, संयुक्त परिवार टूट गए हैं, तो ऐसे में इन फिल्मों से लड़कियों की रूमानियत को आराम मिलता है। जिनमें घर से भागकर प्यार करने को ही एकमात्र हल बताया जाता है। मैंने प्यार किया, कयामत से कयामत तक, डर, अंजाम, दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे से लेकर आज तक धड्क, केदारनाथ, अतरंगी रे जैसी न जाने कितनी फिल्मे हैं जो ऐसे समाज विरोधी विचारों को शरण प्रदान करती हैं। लड़कियों को लगता है कि कहीं न कहीं प्यार ही वह इकलौता रास्ता है जो उन्हें आराम दे सकता है, जो उनके विद्रोह को पूरा कर सकता है।

रियल्टी शोज़ भी इसी विद्रोह को पनाह देने का एक माध्यम है, परन्तु जिन लड़कों को यह लड़कियां अपना मित्र व प्रेमी समझकर आती हैं, वह इनके लिए हत्यारे, बलात्कारी और शोषक साबित होते हैं। जब तक समाज को यह पता चल पाता है, तब तक देर हो चुकी होती है और लड़कियां या तो बहुत दूर जा चुकी होती हैं या फिर लोक लाज के भय से आत्महत्या तक कर लेती हैं। या फिर उसी रैकेट का शिकार हो जाती हैं, जो उनका धर्म बदलकर बुर्के में कैद कर लेता है।

ऐसे बेमतलब के विद्रोह की सच्चाई बताने के लिए लड़कियों को भारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री के महत्व से परिचित करवाना होगा जो उनकी शक्ति है। जो उनकी आत्मा में अनंत काल से बसा हुआ है और जो उनके इस विद्रोह को सकारात्मक मोड़ देगा। शहरी मध्यवर्ग जिसके पास अपने बच्चों और बच्चियों के लिए समय नहीं है, उसे समय निकालना ही होगा, क्योंकि यदि वह अपनी बच्चियों के लिए समय नहीं निकालेगा तो वैश्विक समानता के बहाने बाजारवाद, उपभोक्तावाद और उपभोगवाद का एजेंडा ढोते ढोते उनका समय किसी और का समय बन जाएगा।

यह भी पढ़ेंः निकिता से लेकर अंकिता तक लव जिहाद का एक जैसा पैटर्न क्यों?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+