Bihar Bridge Collapse: बिहार में उद्घाटन से पहले ही पुल क्यों गिर जाते हैं?
बिहार में ही ऐसा क्यों होता है कि अक्सर पुल बनने से पहले ही गिर जाते हैं? क्या बड़ी निर्माण परियोजनाओं में भ्रष्टाचार के बावजूद उसकी गुणवत्ता को बरकरार रखने की जो लक्ष्मण रेखा होती है, उसका उल्लंघन कर दिया जाता है?
Bihar Bridge Collapse: 1710 करोड़ रुपए के बजट से बन रहा बिहार का अगवानी-सुल्तानगंज गंगा महासेतु अपने आप, खड़े-खड़े पल भर में नदी में समा गया। पुल लगभग 80 प्रतिशत पूरा हो चुका था और कुछ महीने बाद ही इसका उद्घाटन होने वाला था। जिस तरह यह पुल गिरा उस तरह तो रेत की भी कोई दीवार कभी नहीं गिरी होगी।
निर्माणाधीन पुल के गिरने से बिहार की सरकारी मशीनरी, उपयोग में लाई जा रही तकनीकी और सामग्री तथा निगरानी तंत्र सवालों के घेरे में है। लोग पूछ रहे हैं कि जनता के अरबों रुपए की इस बर्बादी के लिए जिम्मेदार कौन है? इसका उत्तर देने में बिहार सरकार की कोई दिलचस्पी नहीं दिख रही। हां, जांच के आदेश दे दिए गए है, निर्माता कंपनी को कारण बताओ नोटिस भी दे दिया गया है और सप्ताह भर में ही हमेशा की तरह मामले को ठंढे बस्ते में जाने लायक बनाया जा चुका है। 4 जून को यह घटना हुई और 12 जून तक निर्माता कंपनी का कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण तक सामने नहीं आया है।

बहरहाल, मामला सनसनीखेज है, लोगों के संज्ञान में है तो राजनीतिक बयानबाजी में कोई कमी नहीं है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच शाब्दिक युद्ध जमकर चल रहा है। भाजपा ने इस मामले की जांच सीबाआई से कराने की मांग की है। वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी ने प्रेस कान्फ्रेंस कर कहा कि, 'जब बालासोर रेल दुर्घटना की जांच सीबीआई से करायी जा सकती है, तो बिहार में निर्माणाधीन महासेतु के बार-बार ढहने की जांच भी तकनीकी कमेटी के साथ-साथ सीबीआई से भी होनी चाहिए।'
विधानसभा में विपक्ष के नेता विजय सिन्हा ने कहा, 'इस पुल के घटिया निर्माण की बात बार-बार सदन में उठाई गई। सरकार ने कहा था जांच होगी। बड़े अधिकारी कमीशन लेकर सरकार तक पहुंचाते हैं। नीतीश कुमार में हिम्मत नहीं कि न्यायिक जांच कराए क्योंकि इसमें जो लिप्त हैं वे सरकार में हैं।' विपक्ष के जवाब में सत्ताधारी पक्ष की ओर से राजद नेता और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भाजपा पर ही आरोप मढ़ दिया। उन्होंने कहा, 'सीबीआई वाले इंजीनीयर तो हैं नहीं कि इसकी जांच करेंगे।' वहीं तेजस्वी के बड़़े भाई और मंत्री तेज प्रताप यादव तो यहां तक कह गये कि, 'हम पुल बना रहे हैं और भाजपा गिरा रही है।'
हर बार की तरह मामला दो-चार दिनों के आरोप-प्रत्यारोप के बाद ठंडा हो गया है। लेकिन कई गंभीर सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब सरकार को ढूंढना ही चाहिए। पहला सवाल यह है कि बिहार में उद्घाटन से पहले ही बार-बार पुल क्यों गिर जाते हैं। गौरतलब है कि पिछले कोई एक-डेढ़ साल में ही राज्य में चार बड़े पुल या बड़ी संरचनाएं निर्माण के दौरान या उद्घाटन से ठीक पहले ध्वस्त हुए हैं। दिसंबर, 2022 में बेगुसराय में बूढ़ी गंडक पर निर्माणाधीन पुल ध्वस्त हो गया था। पिछले साल ही नवंबर में नालंदा जिले में एक बड़ा पुल निर्माण के दौरान धाराशायी हो गया जिसमें एक मजदूर की मौत भी हो गई थी। किशनगंज और सहरसा में भी कुछ समय पहले बड़ी लागत से बन रहा पुल और फ्लाईओवर गिर गया था।
लेकिन कभी भी न तो इसका कारण सार्वजनिक हुआ न ही निर्माता कंपनी पर कोई ठोस कार्रवाई हुई। अगवानी-सुल्तानगंज महासेतु तो 14 महीने के अंदर ही दो बार क्षतिग्रस्त हो चुका है। 30 अप्रैल 2022 को पुल के पिलर नंबर 4, 5 और 6 का हिस्सा गिरा गया था। इसके बाद इसकी जांच की जिम्मेदारी आईआईटी रूड़की की एक विशेषज्ञ टीम को दी गई थी। लेकिन जांच रिपोर्ट का इंतजार किए बिना अनवरत काम चलता रहा। जबकि अनाधिकारिक रूप से यह बात स्पष्ट हो चुकी थी कि पुल के डिजाइन में दोष है।
गौरतलब है कि जो कंस्ट्रक्शन कंपनी इस पुल का निर्माण कर रही है, बिहार में उसका रिकॉर्ड खराब रहा है। कम से कम चार मौकों पर इस कंपनी द्वारा कार्य में लापरवाही बरते जाने का मामला सामने आ चुका है। तीन वर्ष पूर्व पटना में लोहिया पथ चक्र के निर्माण के दौरान एक बड़ा स्लैब गिर गया जिसकी चपेट में आकर तीन बच्चों की मौत हो गई थी। लेकिन इसे लेकर क्या कार्रवाई हुई, यह सवाल अनुत्तरित है। इसके अलावा कंपनी द्वारा कोसी महासेतु के निर्माण के दौरान भी पुल का एक हिस्सा नदी में बह गया था। इसके बावजूद कंपनी को राज्य में कई सारी बड़ी निर्माण परियोजना का ठेका मिला हुआ है। आखिर क्यों? इसी प्रश्न के अंदर सारा जवाब छिपा हुआ है।
इसको समझने के लिए बिहार में बड़े बजट की परियोजना का पूरा गणित समझना होगा। दरअसल, बिहार सरकार ने हाल के एक दशक में सर्वाधिक प्रशंसा निर्माण परियोजना के क्षेत्र में हासिल की है। राज्य में बड़ी संख्या में सड़क, पुल, विद्यालय भवन समेत सरकारी भवनों का निर्माण कार्य हुआ है और हो रहा है। तमाम राजनीतिक जोड़तोड़ और प्रशासनिक अनिश्चितता के बावजूद निर्माण परियोजनाएं अनवरत गति से चलती रहती हैं। सरकार की अन्य विकास परियोजनाएं भले ही बाधित हो जाए या शुरू भी न हो, लेकिन सामान्यतया निर्माण परियोजनाएं बाधित नहीं होती। बाधा आने पर इसे प्राथमिकता के साथ दूर किया जाता है।
निर्माण परियोजना की मंजूरी से लेकर टेंडर और बजट आवंटन में एक स्फूर्ति बिहार में हर स्तर पर दिखाई देती है। क्यों? समझना आसान है, लेकिन साबित करना कठिन है। कुछ साल पहले इस पंक्ति के लेखक को बिहार और झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव वीएस दुबे ने कहा था- 'निर्माण परियोजना ही एकमात्र ऐसी सरकारी परियोजना होती है, जिसमें हर किसी को खुश करने का अवसर रहता है। जनता के लिए यह उपयोगी होती है और सीधे सबको नजर आती है। इसका बजट सामान्यतया काफी बड़ा रहता है, जिसमें नीचे से ऊपर तक हर किसी को खुश करने की गुंजाइश रहती है।'
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बिहार में सरकारी परियोजना और भ्रष्टाचार के आपसी संबंध की बात अब किसी से छिपी नहीं है। लेकिन पुल, बड़े सार्वजनिक भवन जैसी परियोजना को लेकर एक अघोषित परिपाटी रही है। चूंकि ऐसी संरचना उच्च जोखिम वाली होती हैं, इसलिए आमतौर पर इसका बजट बढ़ाकर बनाया जाता है ताकि भ्रष्टाचार का प्रभाव निर्माण की गुणवत्ता पर न पड़े। इस अलिखित परंपरा का वर्षों से ईमानदारीपूर्वक पालन भी किया जाता रहा है। लेकिन बिहार में जिस तरह बड़े-बड़े पूल गिर रहे हैं, उससे तो यही लगता है कि यह लक्ष्मण रेखा भी तोड़ी जा चुकी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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