Congress on Ram Mandir: कभी राम मंदिर का मुद्दा उठानेवाली कांग्रेस मंदिर उद्घाटन से दूर क्यों?
बात 1948 की है, जब स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार कांग्रेस के एक प्रत्याशी ने राम मंदिर को राजनीतिक मुद्दा बनाकर चुनावी वैतरणी पार की थी। दरअसल, 1948 में यूनाइटेड प्रोविंस (आज का उत्तर प्रदेश) की 13 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने थे। इन 13 सीटों में एक सीट फैजाबाद थी।
समाजवादी नेता आचार्य नरेंद्र देव के सामने कांग्रेस के प्रत्याशी बाबा राघवदास कमजोर पड़ रहे थे तो उन्होंने घोषणा की कि वे चुनाव जीतने के बाद रामजन्मभूमि को विरोधियों से मुक्त कराएंगे। चुनाव प्रचार के दौरान बाबा राघवदास फैजाबाद की जनता को यह समझाने का प्रयास करते रहे कि कांग्रेस ही रामजन्मभूमि का मसला सुलझा सकती है।

फैजाबाद की जनता ने कांग्रेस प्रत्याशी बाबा राघवदास को जिता दिया और रामजन्मभूमि का मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया। बाबा राघवदास ने अपने चुनावी वादे के अनुसार अयोध्या के साधु-संतों के साथ बैठकें भी की किंतु दिसंबर, 1949 में बाबरी ढाँचे के भीतर भगवान राम की मूर्ति प्रकट हुई जिसके बाद पूरा राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया।
जवाहरलाल नेहरू ने जहां इस घटना पर गहरा दुःख व्यक्त किया वहीं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदू महासभा ने यह घोषणा कर दी कि प्रभु श्रीराम ने स्वयं प्रकट होकर यह संदेश दिया कि यह स्थान उनकी जन्मभूमि है। इसके बाद से ही रामजन्मभूमि का मुद्दा कांग्रेस बनाम हिंदूवादी संगठन हो गया। हालांकि कांग्रेस के पास राजीव गांधी के प्रधानमंत्री रहते सुनहरा अवसर था कि वह बहुसंख्यक जनआस्था के इस मुद्दे को सुलझाकर नेहरू की गलती सुधार सकती थी किंतु 1980 के दशक के शाहबानो मामले में मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों को झेल रहे राजीव गांधी ने 1986 में जज केएम पांडेय के आदेश से गर्भगृह के खोले गए ताले को अपनी सरकार की उपलब्धि बताया तो बात और बिगड़ गई।
राजीव गांधी पर रामजन्मभूमि को मुक्त करवाने का जबरदस्त दबाव पड़ने लगा और वे इस दिशा में कुछ कर पाते उससे पहले ही 1991 में आतंकी हमले में उनकी मृत्यु हो गई। इसके पश्चात पीवी नरसिंह राव ने देश की राजनीति में उठ रही हिंदुत्व की लहर को पहचान कर अयोध्या मामले का हल निकालने का प्रयास किया किंतु अयोध्या की आंधी ने हिंदूवादी राजनीति की जिस नींव को पुख्ता कर दिया था, उसे हिलाने का दम कांग्रेसी प्रधानमंत्री में नहीं था, जिसके बाद कांग्रेस के लिए रामजन्मभूमि का मुद्दा मुस्लिम वोट बैंक को एकजुट करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए बच गया और पार्टी का चेहरा हिंदू-विरोधी बन गया।
एक समय कांग्रेस में भी धर्मनिष्ठ नेताओं का बोलबाला था और वे हिंदू हितों की बात को पुरजोर तरीके से उठाते थे किंतु सोनिया गांधी के हाथों में कांग्रेस की लगाम आते ही हिंदूवादी हित गौण हो गए और मुस्लिम तुष्टिकरण बढ़ता गया। अहमद पटेल, अंबिका सोनी, पी चिदंबरम जैसे नेताओं ने कांग्रेस नेतृत्व को हिंदुओं से दूर कर दिया। दो दशक के सोनिया काल में कांग्रेस दिग्भ्रमिता की स्थिति में रही। यहां तक कि राहुल गांधी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहते भी कांग्रेस हिंदू-मुस्लिम के भ्रमजाल में फंसी रही। कांग्रेस की गिरती साख और सिमटता जनादेश भी इसकी पुष्टि करता है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते हिंदुओं ने पार्टी से दूरी बना ली है।
आज यह स्थिति है कि कांग्रेस राज्य इकाइयों में जितने सदस्य बनाती है, उतनी विधानसभा की सीटें तक नहीं जीत पाती। 2017 में गुजरात में हो रहे विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी मंदिरों की परिक्रमा कर रहे थे क्योंकि उन्हें भाजपा के हिंदुत्व के मुकाबले कांग्रेस को स्थापित करना था किंतु वे संभवतः भूल गए थे कि यदि जनता को भाजपा और कांग्रेस के हिंदुत्व में से किसी एक को चुनना हो तो वह भाजपा को ही चुनेगी। कभी स्वयं को जनेऊधारी दत्तात्रेय गोत्र का ब्राह्मण बताने वाले राहुल गांधी पर हिंदुओं ने विश्वास नहीं किया और मुस्लिम भी उनसे दूरी बनाने लगे। यही हाल कांग्रेस की राज्य इकाइयों के नेताओं का भी रहा।
ऐसे में अयोध्या न जाने का निर्णय भी कहीं न कहीं कांग्रेस नेताओं का चुनावी हिंदू-अहिंदू बनने का अवसर ढूंढना है ताकि मुस्लिम उनसे दूर न हों और भाजपा पर राम मंदिर के राजनीतिकरण का आरोप मढ़कर वह उदार हिंदुओं के वर्ग को अपने पाले में ला सके। हालांकि इस बार कांग्रेस नेतृत्व ने चूक कर दी है क्योंकि भावनाएं हमेशा राजनीति पर भारी पड़ी हैं और बहुसंख्यक भावनाएं राम मंदिर के पक्ष में हैं जो कहीं न कहीं भाजपा को कांग्रेस के ऊपर 'पॉलिटिकल बेनीफिट' दे रही हैं।
पहले से ही राम मंदिर की उपेक्षा का दंश झेल रही देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी के समक्ष इस निर्णय से आपसी टूट का खतरा तो बढ़ा ही है, बहुसंख्यक हिंदू समाज के समक्ष भी अच्छा संकेत नहीं गया है। कांग्रेस नेतृत्व का अयोध्या न जाने का निर्णय स्वयं कांग्रेसियों के ही गले नहीं उतर रहा है। सबसे अधिक विरोध के स्वर हिंदुत्व की प्रयोगशाला गुजरात से उठ रहे हैं।
कांग्रेस नेता प्रमोद कृष्णम ने भी इसे पार्टी का आत्मघाती निर्णय बताया है। भाजपा की कमंडल की जिस राजनीति की काट कांग्रेस मंडल में ढूंढ रही थी, उसी मंडल के हाथों में कमंडल देकर नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस को राजनीतिक रूप से पंगु कर दिया है। जाति की जो राजनीति अब तक कांग्रेस को संजीवनी देती थी वह हिंदू के रूप में भाजपा को मजबूत कर चुकी है।
अयोध्या जाकर कांग्रेस नेतृत्व उदारवादी हिंदुओं के बीच नरेंद्र मोदी की राजनीति की काट बन सकता था किंतु न जाने का निर्णय करके उसने 2024 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर हिंदुओं के एक बड़े वोट बैंक से स्वयं को दूर कर लिया है। राम मंदिर के सहारे हिंदुत्व की फसल को वोटों के रूप में काटने का भाजपा का दांव अब सटीक लगा है। फिर अयोध्या तो अभी झांकी है। 14 फरवरी को जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुस्लिम बहुल आबू धाबी में विश्व के सबसे बड़े हिंदू मंदिर का उद्घाटन करेंगे तो वैश्विक हिंदू समाज के सबसे बड़े नेता के रूप में प्रतिष्ठित हो जाएंगे।
यह भी संभव है कि उदारवादी मुस्लिम भी उन्हें वैश्विक नेता के रूप में मान्यता दे दें। तब कांग्रेस के समक्ष मुस्लिम वोटों के छिटकने का खतरा भी होगा। कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि वर्तमान में अयोध्या का राम मंदिर भाजपा के लिए राजनीतिक मुद्दा है और आधे-अधूरे मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम से वह दूरी बना रही है तो उसका यह तथ्य भी गले नहीं उतर रहा। आधे-अधूरे मंदिर पर बहस की जा सकती है किंतु राम मंदिर पर राजनीति और उससे लाभ लेने का सर्वप्रथम कार्य तो स्वयं कांग्रेस ने किया था। अब यदि वही कार्य भाजपा कर रही है तो इसमें कांग्रेस को आपत्ति क्यों है?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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