Madhya Pradesh CM: कौन बनेगा मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री?
बीते दो दशक में यह पहला अवसर है जब मध्य प्रदेश की साढ़े सात करोड़ जनता अपने मुख्यमंत्री को देखना चाहती है, किंतु भाजपा नेतृत्व पिछले 6 दिनों से "चेहरे" की खोज में ही लगा हुआ है।
केंद्रीय नेतृत्व ने मुख्यमंत्री चयन की रायशुमारी हेतु तीन पर्यवेक्षकों की नियुक्ति तो कर दी किंतु विधायक दल की बैठक संभवतः सोमवार को होने के चलते मुख्यमंत्री कौन का प्रश्न अब प्रदेशवासियों सहित राजनेताओं को बेचैन करने लगा है। हालांकि पर्यवेक्षक मात्र विधायकों से राय-शुमारी ही करेंगे क्योंकि मुख्यमंत्री पद का अंतिम निर्णय भाजपा का संसदीय बोर्ड करेगा अर्थात अभी प्रदेश में मुखिया का इंतजार थोड़ा लंबा हो सकता है।

इससे पहले 2003 में 04 दिसंबर को चुनाव परिणाम आया और 07 दिसंबर को विधायक दल की बैठक हुई जिसमें उमा भारती का नाम तय हुआ और उन्होंने 08 दिसंबर को शपथ ली। 2008 में इस पूरी प्रक्रिया में मात्र 2 दिन का समय लगा। 2013 में भी थोड़ा विलंब हुआ किंतु 5 दिनों के भीतर सभी संगठनात्मक एवं संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन कर लिया गया।
2020 में कमलनाथ सरकार के गिरने के तीसरे दिन मुख्यमंत्री पद की शपथ पूर्ण हो गई किंतु इस बार परिदृश्य जटिल है। वैसे भी मध्य प्रदेश में भाजपा संगठन इतना मजबूत है और जीते हुए पार्टी के वरिष्ठ नेता इतने अनुभवी हैं कि उनमें से किसी एक को चुनना वास्तव में कठिन काम है। जातीय गणित, क्षेत्रवार समीकरण, चेहरे की स्वीकार्यता, निजी छवि, कार्यकर्ताओं से सामंजस्य जैसे कई फ़ैक्टर्स मुख्यमंत्री चयन में देखे जा रहे हैं। 2024 के आम चुनाव को भी ध्यान में रखा गया है।
शिवराज-प्रह्लाद-कैलाश का दावा मजबूत
हालांकि प्रदेश के मुखिया की दौड़ में स्वाभाविक रूप से शिवराज सिंह चौहान ही आगे चल रहे हैं। 18 वर्षों से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह जनता में बेहद लोकप्रिय हैं। उनकी कई योजनाओं ने राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति पाई है। उनके समर्थक विधायकों की संख्या भी अधिक है। संघ परिवार से नजदीकी भी शिवराज छुपाते नहीं हैं। वे देश के संभवतः इकलौते मुख्यमंत्री हैं जो गाजे-बाजे के साथ संघ कार्यालयों में जाते हैं और उनकी टीम इसे प्रचारित भी करती है जबकि अमूमन अन्य भाजपायी मुख्यमंत्री पदासीन होते ही ऐसा करने से बचने लगते हैं।
इस बार के चुनाव प्रचार और परिणाम के बाद शिवराज सिंह के व्यक्तित्व के कई रंग देखने को मिले हैं। "लड़ूँ या जाऊँ" के भावनात्मक संवाद के बाद "मामा का रिश्ता किसी भी पद से बड़ा होता है" तक की उनकी यात्रा ने केंद्रीय नेतृत्व को भी पशोपेश में डाल दिया है। उनकी प्रदेश-व्यापी लोकप्रियता को नजरअंदाज करना सरल नहीं होगा। ओबीसी वर्ग से आने के चलते भी वे वर्तमान राजनीति की आवश्यकता हैं। शिवराज सिंह राजनीति के ऐसे चतुर-सुजान हैं जिन्होंने बिना विधायकों की बाड़ाबंदी के अपनी चाल से नेतृत्व को अपने पक्ष में ढाला है।
हालांकि यह भी सत्य है कि अब शिवराज सिंह कद और अनुभव में इतने वरिष्ठ हो चुके हैं कि उनकी आवश्यकता केंद्र में महसूस की जाने लगी है। फिर जब तक शिवराज सिंह प्रदेश में हैं, नया युवा नेतृत्व उभर नहीं सकता जो भाजपा की आगामी 20 वर्षों की नीति के विपरीत है। अतः केंद्रीय नेतृत्व यदि शिवराज सिंह को केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी देना चाहता है तो उन्हें प्रदेश की राजनीति का मोह त्यागना पड़ेगा। शिवराज सिंह के खिलाफ सबसे बड़ी शिकायत नौकरशाही का बेलगाम घोड़े की तरह दौड़ना रहा है जिसके चलते सरकार और संगठन की छवि पर आघात हुआ है।
शिवराज सिंह ओबीसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और यदि उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है तो इसी वर्ग के प्रह्लाद सिंह पटेल (लोधी) का दावा मजबूत नजर आता है। प्रह्लाद सिंह की संसदीय राजनीति की शुरुआत जब हुई थी तब वर्तमान भाजपा नेतृत्व के कई बड़े चेहरे राजनीति में सक्रिय भी नहीं थे। हर बार अलग संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़कर जीतना और उसे भाजपा का गढ़ बना देना, प्रह्लाद सिंह की विशेषता है। प्रह्लाद सिंह न केवल महाकोशल बल्कि बुंदेलखंड में भी पार्टी को मजबूती देते हैं। हालांकि राज्य की राजनीति में प्रह्लाद सिंह का कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इनके मुख्यमंत्री बनने से उमा भारती को भी शांत किया जा सकता है जो गाहे-बगाहे संगठन को आँख दिखाती रहती हैं।
उपरोक्त में से दोनों नेता नहीं तो भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का नाम भी प्रमुखता से लिया जा रहा है। गृहमंत्री अमित शाह से नजदीकी, हरियाणा-उत्तराखंड में प्रभारी के रूप में सरकार बनवाना, पश्चिम बंगाल में भाजपा को 77 सीटों तक पहुंचाना, मालवा-निमाड़ की 50 से अधिक सीटों पर सीधी पकड़ और इंदौर जिले को कांग्रेस मुक्त करने जैसे बड़े काम इनकी प्रोफाइल को मजबूत कर रहे हैं। विजयवर्गीय का व्यक्तित्व नौकरशाही पर हावी होकर उससे जनहितैषी काम करवाने का रहा है।
महापौर और मंत्री रहते हुए उनके सर्वाधिक टकराव बिगड़ैल नौकरशाहों से हुए किंतु वे डटे रहे और अंततः कई ऐसे कार्य हुए जिनकी कल्पना नहीं की गई थी। प्रशासनिक तंत्र से जल्द काम करवाने की कला विजयवर्गीय के इतर किसी नेता के पास नहीं है। उन्होंने कई विधानसभाओं को "भाजपा की अयोध्या" में बदल दिया है जहां दशकों से कांग्रेस खाली "हाथ" है। वे एकमात्र नेता हैं जिन्हें सत्ता-संगठन दोनों में कार्य करने का लंबा अनुभव है। यदि ओबीसी या पिछड़ा मुख्यमंत्री के बदले गुड गवर्नेंस ही मुख्यमंत्री चयन का पैमाना हुआ और राजस्थान में पिछड़ा तथा छत्तीसगढ़ में वनवासी मुख्यमंत्री बना तो मध्य प्रदेश के लिए कैलाश विजयवर्गीय केंद्रीय नेतृत्व की पहली पसंद होंगे। वे मालवा-निमाड़ से प्रदेश के चौथे गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में बने हुए हैं।
तोमर-सिंधिया दौड़ में पिछड़े
मुख्यमंत्री पद के लिए ग्वालियर-चंबल संभाग से नरेंद्र सिंह तोमर और ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम भी चला था किंतु अब ऐसा लगता है कि दोनों वरिष्ठ नेताओं का नाम दावेदारी में पीछे हुआ है। सिंधिया के 13 समर्थकों में से 7 चुनाव हार चुके हैं और जो बचे हैं, सिंधिया का जोर उनमें से दो-तीन को बड़े मंत्रालय दिलाने पर होगा। वहीं नरेंद्र सिंह तोमर के प्रदेश अध्यक्ष रहते भाजपा ने प्रदेश में 2 बार जीत दर्ज की और उनके पास मुख्यमंत्री बनने का अवसर पूर्व में भी आया था किंतु अपनी अनिच्छा से वे प्रदेश की राजनीति में अधिक नहीं रुके।
इस बार भी उनका दावा वरिष्ठता को देखते हुए मजबूत था किंतु चुनाव प्रचार के दौरान बड़े बेटे देवेंद्र तोमर के दो वायरल वीडियो ने अब तक बेदाग रहे नरेंद्र सिंह की साख पर दाग लगा दिया है। फिर सिंधिया अथवा तोमर में से किसी एक को मुख्यमंत्री बनाकर भाजपा नेतृत्व जातियों और वर्ग-संघर्ष में विभाजित ग्वालियर-चंबल संभाग में भाजपा का पतन नहीं देखना चाहेगा क्योंकि इससे आंतरिक गुटबाजी के साथ ही वर्गों में भी संघर्ष शुरू होगा। वैसे भी सिंधिया ने मुख्यमंत्री पद की दौड़ से इतर अपने मंत्रालय के क्रिया-कलापों को प्रारंभ कर दिया है।
भार्गव-सुमेर सिंह या कोई नया नाम भी चौंका सकता है
सागर-बीना लोकसभा सीट की रहली विधानसभा से लगातार 9वीं बार विधायक बने गोपाल भार्गव को जब दिल्ली दरबार में बुलाया गया तो उनका नाम भी संभावित मुख्यमंत्री की सूची में दर्ज हो गया। ब्राह्मण राजनीति के कद्दावर नेता गोपाल भार्गव का प्रभाव बुंदेलखंड संभाग में है और तमाम भितरघातों के बाद भी वे मैदान में मजबूती से डटे हुए हैं। भाजपा के ही एक अन्य क्षेत्रीय नेता से उनके संबंधों की गूंज कई बार प्रदेश में सुनाई दी है। कयासों से इतर उन्हें विधानसभा अध्यक्ष का पद भार सौंपा जा सकता है।
वहीं राज्यसभा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी भी अब मुख्यमंत्री की दौड़ में आ गए हैं। संघ समर्थित सुमेर सिंह को जब राज्यसभा भेजा गया तो प्रदेश की जनता ने बतौर राजनेता, उनका नाम पहली बार सुना था। तभी गूगल पर उनके बारे में सर्च किया गया। गुटबाजी से दूर सुमेर सिंह वनवासी वर्ग में खासे लोकप्रिय हैं और वनवासी कल्याण आश्रम के माध्यम से उन्होंने समाज के लिए कई कल्याणकारी काम किए हैं। अविवादित और नए चेहरे के तौर पर उनका नाम लिया तो जा रहा है किंतु उन्हें "पैराशूट नेता" मानने वालों की भी कमी नहीं है। कभी चुनाव न लड़ने वाले सुमेर सिंह की प्रशासनिक क्षमताओं पर भी प्रदेश भाजपा के नेता एकमत नहीं हैं। हालांकि 29 प्रतिशत वनवासी वर्ग को साधने के लिए उनकी किस्मत उन्हें प्रदेश का मुखिया भी बना सकती है।
इनके अलावा प्रदेश अध्यक्ष और खजुराहो सांसद वीडी शर्मा, टीकमगढ़ सांसद वीरेंद्र खटीक, राज्यसभा सांसद कविता पाटीदार, महिला कोटे से सीधी विधायक रीति पाठक के नाम भी भोपाल-दिल्ली एक किए हुए हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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