यूपी में अकेला क्या कर पायेगा 'हाथी' ?
Bahujan Samaj Party: जब बसपा प्रमुख मायावती ने ऐलान किया था कि उनकी पार्टी बसपा अकेले ही चुनावी मैदान में उतरेगी तो बहुत से लोगों ने उन पर आरोप लगाया था कि ऐसा वो बीजेपी की मदद करने के लिए कह रही हैं। लेकिन जिस प्रकार से बसपा ने टिकटों का बंटवारा किया है, उससे यूपी की सीधी लड़ाई त्रिकोणीय संघर्ष बनती हुई दिख रही है।
मायावती द्वारा यूपी में टिकटों के बंटवारे पर नजर डालें तो इतना साफ दिखता है कि बसपा की कोशिश वोट काटने के बजाय अपनी जीत का प्रयास करना है। इसलिए टिकट बंटवारे में जाति धर्म की कोई बाध्यता नहीं रखी गयी है। लेकिन टिकट इस तरह से दिया गया है कि पार्टी के सिंबल पर उतरनेवाला उम्मीदवार दमदारी से लड़ सके।

इसके लिए बसपा ने सपा/कांग्रेस और भाजपा के टिकट बंटवारे का इंतजार किया। पार्टी ने अपने सियासी पांसे को चुनावी चौसर पर उसी तरह चला है ताकि वह यूपी में लड़ती हुई दिखे। यूपी के जो राजनीतिक हालात हैं उसमें कांग्रेस के बाद बसपा ही वो पार्टी है जिसके सामने जीत हार से अधिक महत्वपूर्ण है कि वो मैदान में बनी रहे। इस बार बसपा ऐसा करने में कामयाब होती दिख रही है।
बसपा का अपना एक निश्चित वोटबैंक है। यूपी की जाटव जाति पूरी तरह से बसपा के समर्पित वोटर हैं जो लगभग 12 प्रतिशत के आसपास हैं। हालांकि पश्चिमी यूपी में चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी बन जाने के बाद उसके इस वोटबैंक में भी सेंध लगी है। नगीना से खुद चंद्रशेखर मैदान में हैं और सपा भाजपा को 'कड़ी टक्कर' दे रहे हैं। पश्चिमी यूपी में जाटव जाति के वोटर बसपा से दूर होकर चंद्रशेखर के पाले में न चले जाएं इसलिए बसपा के उत्तराधिकारी आकाश आनंद खुद नगीना की देख रेख कर रहे हैं।
चंद्रशेखर लुटियन जोन में घूमनेवाले लिबरल्स के प्रिय पात्र हैं इसलिए उनकी मौजूदगी को मीडिया का एक वर्ग बहुत बढ़ा चढ़ाकर बताता है। फिर चंद्रशेखर और उनके समर्थक सवर्णों से सीधी लड़ाई की बात करते हैं, इसलिए इस जाति के युवाओं को आकर्षित करते हैं। चंद्रशेखर की बनाई भीम आर्मी का प्रभाव आज पूरे प्रदेश में दिखता है। अंबेडकर जयंती का मौका हो या फिर दूसरी जातियों से झगड़ा झंझट, इस जाति के युवा चंद्रशेखर की भीम आर्मी के बैनर तले ही गोलबंद होते हैं।
लेकिन इस गोलबंदी का मतलब यह नहीं है इनकी जाति का वोट चंद्रशेखर के पाले में चला जाएगा। इस जाति के लोगों का हाथी से गहरा लगाव है और मतदान केन्द्र पर उसी के सामनेवाला बटन दबता है। प्रदेश में यही बसपा की सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी है जो कांशीराम और मायावती ने तीस सालों में अर्जित की है। फिर चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी अभी राज्यव्यापी नहीं है। इसलिए उसका अगर कुछ प्रभाव है भी तो एक सीमित क्षेत्र में ही है।
ऐसे में बसपा ने इस बार जहां अपने वोटबैंक को तो बचाकर ही रखा है वहीं उसने दूसरी जातियों और मुसलमानों को भी साधने का प्रयास किया है। मसलन, मेरठ की सीट पर जहां भाजपा ने अग्रवाल समाज से आनेवाले अरुण गोविल को टिकट दिया तो बसपा ने त्यागी उम्मीदवार पर दांव लगाकर यहां से देवव्रत त्यागी को टिकट दे दिया। इस सीट पर त्यागी मतदाताओं का ठीक ठाक प्रभाव है और अगर बसपा का त्यागी कार्ड चल गया तो भाजपा उम्मीदवार को जीत के लिए संघर्ष जरूर करना पड़ेगा।
इसी तरह जौनपुर से बसपा ने श्रीकला सिंह को टिकट दे दिया है जो कि इस क्षेत्र में माफिया नेता कहे जानेवाले धनंजय सिंह की पत्नी हैं। धनंजय सिंह न केवल जौनपुर क्षेत्र में अच्छा खासा राजनीतिक प्रभाव रखते हैं बल्कि वो यहां से चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुके थे। ऐन मौके पर एक पुराने केस में उनको सजा हो गयी और वो जेल में हैं। ऐसे में बसपा ने धनंजय सिंह की पत्नी को टिकट देकर इस सीट पर अपनी दावेदारी मजबूत कर दी है। पिछली बार भी यह सीट बसपा ने ही जीती थी।
कभी पैसा देकर टिकट बंटवारे के लिए बदनाम रही बसपा ने इस बार टिकट बंटवारे में बहुत सावधानी बरती है। एक ओर जहां मुस्लिम दावेदारों पर दांव लगाया है वहीं दूसरी ओर स्थानीय समीकरण का भी पूरा ध्यान रखा है। जहां मुस्लिम मतदाता अधिक हैं और उम्मीदवार हिन्दू है वहां पार्टी की ओर से मुस्लिम पदाधिकारी नियुक्त किये गये हैं ताकि मुस्लिम वोटर पूरी तरह से सपा कांग्रेस के पाले में न चला जाए।
मुसलमानों से अपील करते हुए मायावती उन्हें भरोसा दिला रही हैं कि सिर्फ बसपा के साथ जाने पर ही मुसलमान "भाजपा को हरा" पायेंगे क्योंकि बसपा के पास उसका अपना दलित वोटबैंक है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मायावती की नजर में सिर्फ दलित या मुस्लिम वोटर ही हैं। ऐसा लगता है कि शायद पहली बार बसपा में टिकट देते समय सिर्फ अपने वोटबैंक और उम्मीदवार के पैसे को ही ध्यान में नहीं रखा गया है। हर एक सीट पर मंथन हुआ है और उस जाति या वर्ग के उम्मीदवार पर ध्यान केन्द्रित किया गया है जिसकी सपा-कांग्रेस या फिर भाजपा के द्वारा उपेक्षा की गयी है।
इसलिए अकेले होने कारण बसपा प्रदेश में कुछ खास नहीं कर पायेगी, ऐसा समझ बैठना एक प्रकार की भूल होगी। सर्वे भले ही यह बता रहे हों कि बसपा का खाता नहीं खुलेगा लेकिन संभव है कि टिकट बंटवारे में जिस गणित का ध्यान रखा गया है, उसका परिणाम आये और बसपा दो से तीन सीटें जीत भी जाए।
अगर वह सीट जीतने में कामयाब नहीं भी होती है तो दूसरे दलों के उम्मीदवारों की हार जीत का कारण तो बन ही जाएगी। जौनपुर को ही देखें तो धनंजय सिंह की पत्नी को टिकट देकर बसपा ने भाजपा के ठाकुर उम्मीदवार की परेशानी बढ़ा दी है। इसी तरह मुजफ्फरनगर में जहां भाजपा और सपा ने जाटों पर दांव लगाया है वहीं बसपा ने एक पिछड़ी जाति के उम्मीदवार को टिकट दे दिया है।
बिजनौर में भाजपा ने गुज्जर को टिकट दिया और सपा ने सैनी को। उम्मीद की जा रही थी कि बसपा मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट दे सकती है। अगर ऐसा होता तो वह सपा कांग्रेस का वोट काटने का काम करता जबकि बसपा ने जाट उम्मीदवार को टिकट दे दिया। इस तरह इस सीट पर जाट, गुज्जर और सैनी की त्रिकोणीय लड़ाई हो गयी।
आशय यह है कि इस बार बसपा अकेले जरूर है लेकिन न तो वह सिर्फ चुनाव लड़ने के लिए चुनाव लड़ रही है और न ही उसने किसी दूसरी पार्टी को फायदा पहुंचाने के लिए उम्मीदवार उतारे हैं। बसपा के इतिहास में शायद पहली बार एक प्रोफेशनल पार्टी की तरह टिकट बंटवारा किया है। पार्टी के उम्मीदवार भले हार जाएंगे लेकिन उसकी पूरी कोशिश एक पार्टी के तौर पर पुनर्वापसी है। एक ऐसी पार्टी जिसका अपना मजबूत वोटबैंक तो है लेकिन वह बाकी जातियों के साथ तालमेल करके एक बार पुन: प्रदेश में खड़ा होने का दम रखती है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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