Bageshwar Dham Controversy : चंगाई चमत्कार बनाम बागेश्वर धाम सरकार
बच्चे जब लुका छिपी का खेल खेलते हैं तो पकड़े जाने पर धप्पा बोलते हैं। बागेश्वर धाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री ने भी कुछ ऐसा ही किया। उन्होंने मिशनरियों के चंगाई चमत्कारों को धप्पा बोल दिया, इससे मिशनरी समर्थक बौखला गये हैं।

Bageshwar Dham Controversy: धीरेन्द्र शास्त्री अभी मात्र 26 साल के नौजवान हैं। लेकिन जिस तरह से सालभर में उनकी लोकप्रियता देशभर में फैली है उसके कारण उन पर आरोप भी लगने शुरु हो गये हैं। वो देश के अलग अलग हिस्सों में दरबार लगाते हैं। यह दरबार उनके आराध्य देव बागेश्वर धाम सरकार के नाम पर लगता है। इन दरबारों में वो लोगों के मन की बात जानकर उन्हें मार्गदर्शन देते हैं। भीड़ से कुछ लोग उनके पास आते हैं और अपनी समस्या नहीं बताते बल्कि खुद धीरेंद्र शास्त्री उनको उनकी समस्या बताते हैं और निदान भी।
कुछ कुछ वैसे ही जैसे कोई नाड़ी वैद्य आपकी नाड़ी पर हाथ रखकर आपके शरीर और मन का हाल बता दे। लेकिन क्योंकि धीरेन्द्र शास्त्री कोई नाड़ी वैद्य नहीं है इसलिए उनकी इस कला को चमत्कार के रूप में लोग देखते हैं। इससे उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है उनके दरबारों में आने वाले लोगों की भीड़ भी। इसमें नितिन गड़करी या छत्तीसगढ की राज्यपाल अनुसुइया उइके जैसे नाम भी शामिल हो गये हैं।
लोकप्रियता बढ़े तो संकट भी पैदा हो ये जरूरी नहीं होता लेकिन धीरेन्द्र शास्त्री के वक्तव्य ऐसे होते हैं जिससे कुछ लोगों के लिए समस्या पैदा होने लगती है। जैसे वो सनातन धर्म की बात ही नहीं करते बल्कि सनातन धर्म के दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब देने की बात भी करते हैं। स्वाभाविक है इस देश में धर्म के दुश्मनों की संख्या कोई कम तो है नहीं। अगर कोई धर्म और राष्ट्र की बात करे तो एक खोजो हजार दुश्मन खड़े मिलते हैं। धीरेन्द्र शास्त्री को भी मिल गये।
भारत में धर्म है तो अधर्म भी है। श्रद्धा है तो तर्कवादी अश्रद्धा भी है। राष्ट्रवादी विचार हैं तो राष्ट्रवाद विरोधी विचार भी है। महाराष्ट्र के नागपुर में धीरेन्द्र शास्त्री जब 7 जनवरी को दरबार लगाने पहुंचे तो वहां तर्कशास्त्री श्याम मानव ने उन्हें चुनौती दे दी कि अगर वो अपने चमत्कारों को सिद्ध कर दें तो वो उन्हें तीस लाख रूपये देंगे। अगर सिद्ध नहीं कर सके तो उनके खिलाफ महाराष्ट्र के ही अंधश्रद्धा उन्मूलन कानून के तहत केस दर्ज करवाया जाएगा।
हालांकि अपने नियत समय 11 जनवरी तक धीरेन्द्र शास्त्री ने अपना कार्यक्रम किया लेकिन इस तर्कवादी चुनौती के बाद देश का राष्ट्रवाद विरोधी और धर्म विरोधी वर्ग सक्रिय हो गया। उसने सोशल मीडिया पर मुहिम चलाना शुरु कर दिया कि धीरेन्द्र शास्त्री समाज में अंधविश्वास फैला रहा है। इस पर रोक लगायी जानी चाहिए। स्वाभाविक है धीरेन्द्र शास्त्री के बचाव में समाज का दूसरा वर्ग भी उतर आया जिसने सवाल उठाया कि अगर धीरेन्द्र शास्त्री अंधश्रद्धा फैला रहे हैं तो ईसाई मिशनरियां चंगाई सभाओं के नाम पर क्या कर रही हैं? उनके खिलाफ तर्कवादी समुदाय कभी मुंह क्यों नहीं खोलता?
धीरेन्द्र शास्त्री स्वयं भी दरबार में खुलेआम ईसाई मिशनरियों के खिलाफ बोलते रहते हैं। ठेठ बुन्देली शैली में बोलने वाले धीरेन्द्र शास्त्री अपने मंच से 'चादर और फादर' को चुनौती देने से नहीं चूकते। विवाद के बाद एक टीवी चैनल पर जब उनसे पूछा गया तो उन्होंने बताया कि दामोह में उन्होंने कुछ परिवारों की घर वापसी करवायी थी जिन्हें रूपये पैसे का लालच देकर ईसाई बना दिया गया था। इसके बाद से ही वो ईसाई मिशनरियों के निशाने पर आ गये हैं।
धीरेन्द्र शास्त्री का यह दावा सही है। दिसंबर 2022 के महीने में क्रिसमस के आसपास दामोह में लगभग पांच सौ वनवासी लोगों की घर वापसी का कार्यक्रम हुआ था जिसका नेतृत्व धीरेन्द्र शास्त्री ने ही किया था। दो चरणों में पहले 22 दिसंबर को फिर 26 दिसंबर को इन वनवासी लोगों की घर वापसी हुई थी। वो आगे भी इसे जारी रखना चाहते हैं, मतलब ईसाई मिशनरियों से उनकी भिड़ंत होती रहेगी। इसके लिए वो तैयार भी दिखते हैं।
मामला अगर केवल श्रद्धा और तर्क का हो तो कोई समस्या नहीं है। श्रद्धावादी अपनी श्रद्धा के साथ जीने के लिए स्वतंत्र है और तर्कवादी अपने तर्क के साथ। लेकिन समस्या तब आती है जब तर्कवादी श्रद्धा को अंधश्रद्धा बताकर उस पर प्रहार करता है। यह सही है कि श्रद्धा के नाम पर दुनिया भर में लूटपाट हुई है, लोगों को मूर्ख भी बनाया जाता रहा है। ठगों का गिरोह श्रद्धा और विश्वास के नाम पर ही लोगों से अपनी बात मानता और मनवाता है लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं हो सकता कि इसमें ईसाई और इस्लामिक "चमत्कारियों" को छोड़कर किसी धर्म विशेष पर ही हमला किया जाए?
इन तर्कवादियों का आजकल सबसे बड़ा सहारा वह साइंस बनता है जो खुद क्रिश्चियनिटी के अंधश्रद्धा उन्मूलन से पैदा हुआ बताया जाता है। लेकिन क्रिश्चियन साइंस भी परफेक्ट कहां है? साइंस स्थूल चीजों को देखता परखता है। सूक्ष्य या अभ्यांतर विषयों तक पश्चिमी साइंस की पहुंच नहीं हो पाती। सूक्ष्म और अभ्यांतर विषयों पर जितना चिंतन भारत में हुआ है उतना संसार में कहीं नहीं हुआ। मनुष्य के स्थूल शरीर से गहरे एक सूक्ष्म शरीर का अन्वेषण भारतीय चिंतन परंपरा की ही देन है।
भारत का तंत्रशास्त्र मनोदैहिक शरीर का इतना उन्नत शास्त्र है कि शरीर को लेकर वेस्टर्न साइंस ने भी उतना उन्नत अध्ययन नहीं किया है। तंत्र शास्त्र से ही योग का जन्म हुआ और इसी से ध्यान का विकास हुआ। तंत्र शास्त्र पांच महाभूत बताता है। ये पांच महाभूत हैं धरती, अग्नि, जल, हवा और आकाश। तंत्रशास्त्र के अनुसार यही पांच महाभूत हैं जो प्रकृति की रचना करते हैं और इसी प्रकृति में जीवों की उत्पत्ति होती है। अगर कोई इन पंच महाभूतों के रहस्य को समझ जाए तो वह योगी हो जाता है, सिद्ध हो जाता है। जिसका प्रकृति के पंचमहाभूतों पर नियंत्रण हो जाता है वह संसार में कोई भी कार्य अपनी इच्छा मात्र से कर सकता है।
इसे ही लौकिक भाषा में चमत्कार कह दिया जाता है। असल में ये चमत्कार नहीं हैं बल्कि विधिवत विज्ञान है। यहां यह भी समझना चाहिए कि विज्ञान शब्द ही तंत्र शास्त्र का दिया हुआ है जिसको अब साइंस का अनुवाद बना दिया गया है। विज्ञान शब्द साइंस से सदियों पुराना है लेकिन दुर्भाग्य से क्रिश्चियन साइंस को जानने वाले लोग न तो तंत्र को जानते हैं, न श्रद्धा को, न विज्ञान को और न ही भारत को। वो जो कुछ कहते हैं उसका आधार बहुत स्थूल और भौतिक होता है। वो अपने सीमित ज्ञान से असीमित विज्ञान को बांधना चाहते हैं।
बागेश्वर धाम वाले धीरेन्द्र शास्त्री हो या ऐसे कोई भी साधु संत जो पंचमहाभूतों की सिद्धि को समर्पित हैं उनके द्वारा किया जाने वाला कार्य चमत्कार नहीं होता। वो तो इसका श्रेय भी नहीं लेते बल्कि हनुमान जी को दे देते हैं। धीरेन्द्र शास्त्री कहते हैं कि उनकी सभाओं में जो लोग ठीक होते हैं वो हनुमानजी महाराज की कृपा है। वही बुलाते हैं। वही ठीक करते हैं। अब हनुमान जी तो स्वयं अष्ट सिद्धि (अणिमा, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व) के दाता है। पश्चिमी साइंस वाले समुदाय को तो यह भी पता नहीं होगा कि सिद्धियां क्या होती हैं, तो वह ऐसी बातों को अंधश्रद्धा बताकर उसे अल्प समझ वाली साइंस से चुनौती ही देगा।
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बहरहाल, इस बहस से अलग धीरेन्द्र शास्त्री ने अपने बालाजी दरबार से ईसाई मिशनरियों की चंगाई सभाओं को जबर्दस्त चुनौती दी है। अपने प्रायोजित कार्यक्रमों के जरिए मिशनरी जिन झूठे चमत्कारों का सहारा लेकर अपना प्रचार कर रहे थे और लोगों को ईसाईयत में कन्वर्ट करा रहे थे, बाला जी हनुमान ने उनके सामने जबर्दस्त चुनौती पेश कर दी है। यही उनकी और उनके समर्थकों के लिए चिंता का कारण भी है और धीरेन्द्र शास्त्री पर हमले का कारण भी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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