Virtual World: देखना सुनना जरूरी है या पढ़ना समझना?
वर्चुअल वर्ल्ड आभासी दुनिया में देखना सुनना वही मृग हो गया है जिसके पीछे त्रेतायुग के राम धनुष लेकर दौड़ पड़े थे।अक्सर होकर भी वह नहीं होता है जिसके बारे में में हमें बताया जाता है।

वैसे तो देखना सुनना सबसे अधिक विश्वसनीय होता है लेकिन वास्तविक जगत में। आभासी जगत में एक कथा कही जाती है जिसे वास्तविकता के इतने पास रखा जाता है कि उसे देखते सुनते हुए हम सहसा भरोसा नहीं कर पाते कि जो हम देख रहे हैं वह आभासी है, वास्तविक नहीं।
नाटक कला या प्रहसन प्राचीन विधा है जिसके जरिए मनुष्य के मन को इतने गहरे तक प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है कि जो दिखाया जा रहा है, वह उसी को सत्य मान ले। लेकिन जब तक यह रंगमंच तक सीमित रहा लोग अभिनय और वास्तविकता का अंतर करते रहे। बीसवीं सदी में जैसे ही इसने तकनीकी का सहारा लिया यह माया का मृग बन गया। कल्पना की दुनिया फिल्म से होते हुए टेलीविजन और अब इंटरनेट तक आ पहुंची है। इंटरनेट जगत में भी वास्तविक प्रस्तुति के आगे अब आर्टिफिशिएल इन्टेलिजेन्स जनित आभासी प्रस्तुति का नया दौर शुरु हो गया है जहां पर्दे पर दिखनेवाली हर घटना काल्पनिक है लेकिन उसे वास्तविकता के तौर पर दिखाया जा रहा है।
ऐसे में सबसे बड़ा संकट विश्वसनीयता का ही पैदा होता है। आभासी जगत में हम जो देख रहे हैं और सुन रहे हैं उस पर हमारी बुद्धि सहज विश्वास कर रही है बिना यह जाने कि वह कितना वास्तविक है। जबकि पढ़ते समय ऐसा नहीं होता। पढ़ते समय हमारी तर्कबुद्धि ज्यादा प्रभावी तरीके से काम करती है। इसलिए देखने सुनने से अधिक प्रभावी होता है पढ़ना। जो मनुष्य पढ़ना बंद कर देता वह बहुत जल्दी देखे या सुने हुए के प्रभाव में आ जाता है। जो बात आप देखकर सुनते हैं उससे आप जल्दी प्रभावित होते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वहां हमारे दिमाग की निर्णय क्षमता घट जाती है। देखी सुनी गयी बातों के खिलाफ हमारा मष्तिष्क सवाल नहीं उठा पाता है।
अगर यह प्रत्यक्ष में घटित हो रहा है तब तो कोई बात नहीं लेकिन देखना सुनना अगर आभासी माध्यम से योजनापूर्वक निर्मित किया गया हो तो खतरनाक होता है। क्योंकि हमारा दिमाग उस समय भी देखी सुनी बातों को वास्तविक मान रहा होता है जबकि हमें पता होता है कि जो कुछ हम देख सुन रहे हैं वह प्रत्यक्ष घटना नहीं है। इसे आभासी रूप से रचा गया है। फिर भी उस समय या बाद में भी आभासी माध्यम से देखी सुनी ऐसी बातों पर हम सवाल नहीं उठा पाते हैं और प्रामाणिक मान लेते हैं।
यही कारण है कि नब्बे के पहले दशक में ह्यूमन डेवलमेन्ट इंडेक्स बनाते समय इस बात का भी उल्लेख किया जाता था कि उस देश में टेलीविजन कितना बिका है। टेलीविजन का मानवीय विकास से भला क्या लेना देना? लेकिन इस बात को अगर ह्यूमन डेवलपमेन्ट इंडेक्स में संयुक्त राष्ट्र की विकास परक संस्था यूएनडीपी द्वारा शामिल किया जाता था तो इसका निश्चित रूप से कोई उद्देश्य रहा होगा।
जो बाजार को प्रभावी रूप से विकसित करना चाहते हैं उनके लिए मनुष्य की तर्कबुद्धि सबसे बड़ी बाधा होता है। अगर किसी कंपनी के विज्ञापन में लिखकर ये बताया जाए कि इस उत्पाद से ये फायदे हैं तो तर्क बुद्धि उसका विश्लेषण करती है। लेकिन उन्हीं बातों को आभासी रूप से रचकर एक चलचित्र के माध्यम से बार बार दिखाया जाए तो हम सहज ही उस पर भरोसा करने लगते हैं। आभासी जगत मानव मन को प्रभावित करने का बहुत सशक्त औजार है। इसीलिए विकसित बाजार के लिए यूएनडीपी द्वारा टेलीविजन के विस्तार पर जोर दिया गया और इसे ह्यूमन डेवलपमेंट इन्डेक्स का हिस्सा बनाया गया।
लेकिन उसके बाद उभरे इंटरनेट ने तो इसे नया ही आयाम दे दिया। अब मनुष्य के सामने दिनभर कुछ न कुछ देखते सुनते रहने का अवसर पैदा हो गया। अब हम दिन भर इंटरनेट पर या तो कुछ देख रहे हैं या सुन रहे हैं। इसका सबसे बड़ा लाभ वो ले रहे हैं जो विज्ञापन को ही कन्टेन्ट बनाकर लोगों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं। अब किसी गाड़ी या मोबाइल का विज्ञापन देखने से अच्छा हम उसकी समीक्षा देखना पसंद करते हैं और ऐसी हर समीक्षा यूट्यूब पर आमतौर पर प्रायोजित होती है। लेकिन न केवल हम उन्हें देखते हैं बल्कि विश्वास भी कर लेते हैं कि वह जो बता रहा है बिल्कुल सही बता रहा है।
निश्चय ही देखना सुनना हमारे लिए सुविधाजनक होता है लेकिन आभासी जगत में देखने सुनने के साथ विश्वास का गहरा संकट है। लगातार आभासी जगत में देखते सुनते रहना हो सकता है हमारे लिए सुविधाजनक लगता हो लेकिन इससे हमारी तर्क क्षमता बुरी तरह प्रभावित होती है। तर्क क्षमता का विकास सदैव पढ़ने से ही होता है, क्योंकि वहां हमारी बुद्धि के पास समझने और विश्लेषण करने का अवसर होता है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि पढ़ना हमें तार्किक बनाता है जबकि देखना सुनना हमारी तर्क क्षमता को कमजोर करता है। आभासी जगत में लगातार देखते सुनते रहने के कारण हमें लगता है कि हमारी समझ बढ़ रही है परंतु वास्तविकता में हमारी सूचना बढ़ रही होती है, जबकि समझ घट रही होती है। समझ का सीधा संबंध बुद्धि के तार्किक विश्लेषण से हैं जो सिर्फ पढ़ने या चिंतन मनन से ही पैदा होता है। आभाषीय जगत का देखना सुनना हमें तार्किक विश्लेषण का अवसर ही नहीं देता। वह हमारी बुद्धि को मान लेने पर विवश करता है।
आज इंटरनेट के युग में हमारे सामने दोनों अवसर मौजूद है। हम देखना सुनना चाहें या फिर कुछ पढ़ना चाहें ये हमें तय करना है। हम चाहें देखें सुने या मन लगाकर कोई बात पढें, इसके निर्णायक हम स्वयं होते हैं। लेकिन हमें दोनों का अंतर जरूर पता होना चाहिए। हम जो चुनेंगे वैसे ही बन जाएंगे। वैसे भी अभी तक के सभी वैज्ञानिक अध्ययन हमें यही निष्कर्ष बताते हैं कि वर्चुअल वर्ल्ड में देखने से कहीं अच्छा पढ़ना होता है। पढ़ना आपके दिमाग को रिलैक्स करता है जबकि देखना टेंशन देता है।












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