Vasundhara Raje: कर्नाटक का सबक नहीं लिया, तो राजस्थान मुश्किल
Vasundhara Raje: आज़ादी से पहले भारतीय राजनीति ग्रास रूट पर आधारित थी| गांव ईकाई से कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव हुआ करते थे| नीचे से चुनकर आए लोग ही जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर के नेतृत्व का चयन करते थे| इससे हर राज्य में प्रभावशाली नेता पैदा हुए, जिनका जमीनी आधार जबर्दस्त था| धीरे धीरे कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व पर सत्ता का नशा हावी हो गया, और पार्टी का प्रादेशिक नेतृत्व भी ऊपर से ही तय होने लगा|
इंदिरा गांधी के सत्ता संभालने के बाद सरकार और कांग्रेस पार्टी के सारे फैसले ऊपर से लिए जाने लगे| क्षत्रपों के हाथ से ताकत लेकर उन्हें खत्म कर दिया गया| संगठन की चुनावी प्रक्रिया भी खत्म कर दी गई, कांग्रेस के एआईसीसी और पीसीसी मेंबर भी केन्द्रीय कार्यालय से तय होने लगे| इंदिरा गांधी ने सबसे बढिया तरीका निकाला था कि वह क्षत्रपों को केंद्र में मंत्री बना कर ले आती थीं, और राज्यों में अपने वफादारों की नई फ़ौज तैयार कर ली थी|

कांग्रेस आज उसी का नतीजा भुगत रही है कि उसके पास एक दो राज्य छोड़कर किसी भी राज्य में ऐसे क्षत्रप नहीं बचे, जो अपने बूते पर पार्टी को जीता कर सरकार बना सकें| सिर्फ कांग्रेस क्यों, राष्ट्रीय स्तर के बाकी राजनीतिक दल भी इसी बीमारी का शिकार हैं| भारतीय राजनीति उल्टी दिशा में चल रही है| ग्रास रूट की बजाए, पूरी राजनीति ऊपर से संचालित होने लगी है|
भारतीय जनता पार्टी में भी यही हो रहा है| कुछ लोग यह समझते हैं कि भारतीय जनता पार्टी में नए नेतृत्व के बाद केंद्र से पार्टी और राज्यों की सरकारों को चलाने की परंपरा शुरू हुई है, लेकिन यह पूरा सच नहीं है। कर्नाटक का उदाहरण हमारे सामने हैं| 2011 में कर्नाटक में येदीयुरप्पा को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था| हालांकि उनकी जगह पर मुख्यमंत्री बनाए गए सदानंद गौड़ा साल भर भी नहीं चल पाए। फिर सदानंद गौड़ा की जगह पर जगदीश शेट्टार को मुख्यमंत्री बनाया गया| भाजपा ने कर्नाटक को पांच साल में तीन मुख्यमंत्री दिए|

पार्टी आलाकमान से नाराज येदीयुरप्पा ने भाजपा छोड़कर अपनी पार्टी बना ली थी| नतीजा यह निकला कि 2013 के चुनाव में भाजपा बुरी तरह हार गई| भारतीय जनता पार्टी का नया निजाम रणनीति के तहत क्षत्रपों को दरकिनार करके प्रदेशों में नया नेतृत्व उभारने की कोशिशों में जुटा है| इसके लिए दूसरे दलों से नेता लाए जा रहे हैं। कई जगहों पर ब्यूरोक्रेसी से भी नेता बनाए जा रहे हैं, क्योंकि ब्यूरोक्रेसी से आए "हिज मास्टर्स वॉइस" में विश्वास रखते हैं|
स्वाभाविक है कि लम्बे समय तक पार्टी के लिए काम करके मुकाम हासिल करने वाले क्षेत्रीय नेताओं में इससे असंतोष पनप रहा है| कुछ लोग हालात से समझौता कर रहे हैं, कुछ लोग घर बैठ गए हैं, और कुछ लोग अभी भी डट कर मुकाबला कर रहे हैं| सबसे पहले हम गोवा का उदाहरण लेते हैं। गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर को जबरदस्ती दिल्ली लाकर रक्षामंत्री बना दिया गया था। लेकिन जब विधानसभा चुनाव में भाजपा को बहुमत नहीं मिला, तो बहुमत का जुगाड़ कर सरकार बनाने के लिए उन्हें वापस गोवा भेजना पड़ा|
दूसरा उदाहरण कर्नाटक का है। भाजपा ने 2018 का चुनाव अपने क्षत्रप येदीयुरप्पा के नेतृत्व में लड़ा, जिससे भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी| बहुमत से सिर्फ सात सीटें कम रह गई थीं, इसलिए कांग्रेस और जेडीएस ने मिल कर सरकार बना ली थी। लेकिन येदीयुरप्पा ने दोनों दलों के विधायकों को तोड़कर 2019 में अपनी सरकार बना ली| भाजपा के नए निजाम ने पदों के लिए 75 साल की अधिकतम सीमा तय कर रखी है। लेकिन उसे 76 वर्ष के येदीयुरप्पा को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा, क्योंकि उनसे बड़ा क्षत्रप वहां कोई नहीं था|
कर्नाटक विधानसभा चुनावों से एक साल पहले आलाकमान ने येदीयुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटा कर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया| ऊपर से नेतृत्व परिवर्तन का फैसला भाजपा को चुनावों में महंगा पड़ा| येदीयुरप्पा भारतीय जनता पार्टी के ऐसे क्षत्रप थे कि उनकी लिंगायत जाति के वोट उनके साथ खड़े थे, उन्हें हटाए जाने से उनकी जाति के वोट भाजपा के साथ उस तरह नहीं रहे, जैसे उनके मुख्यमंत्री रहते हुए थे|
कर्नाटक की राजनीति में जितना बड़ा कद येदीयुरप्पा का है, उतना ही बड़ा कद राजस्थान में वसुंधरा राजे का है| दोनों ही राज्यों में चुनाव जीतने के लिए जातीय समीकरणों को साधना पड़ता है| वसुंधरा राजे को भी आलाकमान ने 2014 में उसी तरह दिल्ली में केन्द्रीय मंत्री बनाने की पेशकश की थी, जैसे गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रीकर को लाया गया था| लेकिन वसुंधरा राजे तैयार नहीं हुई और उन्हें जबरदस्ती लाना संभव नहीं था, क्योंकि पार्टी के विधायक चट्टान की तरह उनके पीछे खड़े थे| अगर वसुंधरा राजे को मजबूर किया जाता तो राजस्थान में भाजपा विधायक दल दोफाड़ हो जाता|
पार्टी को वह अपने तेवर 2012 में तब भी दिखा चुकी थी, जब विधानसभा चुनावों से एक साल पहले गुलाब चंद कटारिया ने एक महीने की पदयात्रा का एलान किया था| तब वसुंधरा राजे ने पार्टी की कोर कमेटी से यह कहते हुए वाकआउट कर दिया था कि अगर कटारिया ने अपनी यात्रा रद्द नहीं की, तो वह पार्टी छोड़ देंगी| वसुंधरा राजे के पार्टी छोड़ने पर अन्य अनेक नेताओं ने भी पार्टी छोड़ने का एलान कर दिया था| आखिर आधे घंटे के अंदर कटारिया को अपनी यात्रा रद्द करना पड़ी थी| भाजपा ने 2013 का चुनाव वसुंधरा राजे की रहनुमाई में लड़कर जबर्दस्त जीत हासिल की थी| लेकिन 2018 में भाजपा ने वसुंधरा राजे की बजाए नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा, इतना ही नहीं मोदी समर्थकों ने नारे भी लगाए कि वसुंधरा तेरी खैर नहीं, मोदी तुझ से बैर नहीं| क्षत्रप की उपेक्षा का नतीजा यह निकला कि भाजपा हार गई|
मोदी के चेहरे पर भाजपा 2018 में राजस्थान ही नहीं, बल्कि मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ और कर्नाटक भी नहीं जीत पाई थी। 2015 और 2020 में दिल्ली भी नहीं जीत पाई, 2021 में बंगाल में नहीं जीत पाई और 2023 में हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक भी नहीं जीत पाई| जबकि 2022 में योगी आदित्यनाथ के चेहरे पर चुनाव लड़ने से उत्तर प्रदेश का मुश्किल चुनाव भी आसानी से जीत लिया। यहां तक कि गुजरात में भी पटेल समुदाय के भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बनाने से ही सत्ता वापसी संभव हो पाई। इससे साबित होता है कि राज्यों के चुनाव क्षत्रपों के चेहरे पर ही लड़े जाने चाहिए, मोदी के चेहरे पर नहीं| इसका कारण यह है कि प्रदेश की जनता विधानसभा चुनावों में अपने प्रदेश के किसी नेता में अपना विश्वास जताना चाहती है, किसी केंद्रीय स्तर के नेता में नहीं।
भाजपा आलाकमान ने 2018 में राजस्थान की हार से भी सबक नहीं सीखा है। पिछले साढ़े चार साल से न सिर्फ वसुंधरा राजे की उपेक्षा जारी रही, बल्कि उनके विरोधी नेताओं को हवा भी दी गई| तीन साल तक प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा रहा| उनकी जगह पर सीपी जोशी को अध्यक्ष बनाया गया, तो वह भी वसुंधरा राजे के साथ समन्वय बनाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे|
इस बीच भाजपा नेतृत्व ने कई नेताओं को उभारने की कोशिश की| वसुंधरा विरोधी माने जाने वाले ओम बिड़ला को लोकसभा का स्पीकर बनाया गया, गजेन्द्र शेखावत को केंद्र में मंत्री बनाया गया| ये दोनों अपने निर्वाचन क्षेत्र से बाहर कोई प्रभाव नहीं रखते| इससे पहले विपक्ष के नेता बनाए गए गुलाब चंद कटारिया भी उदयपुर बेल्ट तक सीमित थे| अब विधानसभा में विपक्ष के नेता बनाए गए राजेन्द्र राठौड़ भी ओम बिड़ला, गजेन्द्र सिंह शेखावत और अश्विनी वैष्णव की तरह मुख्यमंत्री पद के दावेदार बन बैठे हैं| लेकिन जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वसुंधरा राजे की सभाओं में भीड़ बढ़ने लगी है|
पिछले हफ्ते जेपी नड्डा के भरतपुर दौरे के समय ऐसा दिखाई देने लगा था कि पार्टी आलाकमान ने कर्नाटक से सबक सीखकर राजस्थान में गलती सुधारने का मन बना लिया है| लेकिन उससे अगले दिन जब अमित शाह उदयपुर की रैली में पहुंचे तो मंच संचालन कर रहे राजेन्द्र राठौड़ ने वसुंधरा राजे को पब्लिक मीटिंग में भाषण देने का मौक़ा ही नहीं दिया| वह तो अमित शाह ने स्थिति को संभाला और वसुंधरा राजे को हाथ जोड़कर उन्हें भाषण देने के लिए राजी किया|
जे पी नड्डा और अमित शाह, दोनों के ही संकेत ऐसे थे कि पार्टी आलाकमान ने वसुंधरा राजे के नेतृत्व में ही चुनाव लड़ने का मन बना लिया है| लेकिन अमित शाह के दिल्ली लौटते ही प्रदेश अध्यक्ष पीसी जोशी ने जो प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा की, उसने अंदरुनी जंग और तेज कर दी है| इस कार्यकारिणी में लोकसभा स्पीकर ओम बिडला, राजेंद्र राठौड़ और संगठन महामंत्री चन्द्रशेखर के समर्थकों की भरमार है, जबकि वसुंधरा राजे के समर्थकों को कार्यकारिणी में नहीं रखा गया|
माना जा रहा है कि पार्टी आलाकमान ओम बिड़ला के कंधों पर रख कर बंदूक चला रहा है, जबकि राज्य की राजनीति में वह बहुत छोटे कद के नेता हैं| ओम बिड़ला का कोटा से बाहर कोई प्रभाव नहीं है| पहली जुलाई को कार्यकारिणी घोषित हुई और 2 जुलाई को वसुंधरा राजे ने पार्टी में ओम बिड़ला के विरोधी माने जाने वाले कोटा के पूर्व विधायक प्रहलाद गुंजल की पीठ थपथपा दी| उन्होंने गुंजल की ओर से कोटा में आयोजित बहुत बड़ी रैली को संबोधित करके ओम बिड़ला को उनके घर में चुनौती दे दी है| वसुंधरा राजे ने इस रैली के माध्यम से अपनी ताकत का इजहार किया है। नरेंद्र मोदी सरकार के 9 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित रैली से भाजपा के बड़े नेताओं की गैर हाजिरी से यह साफ़ हो गया कि वसुंधरा राजे की उस ढंग से वापसी अभी नहीं हुई है, जैसे संकेत जेपी नड्डा और अमित शाह की रैलियों से मिले थे|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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