Malviya Nagar Fire: 'बेटी-दामाद-बच्चे, पांचों जिंदा जले'- आपबीती, 21 लाशों के ढेर में अपनों को ढूंढती आंखें

Delhi Malviya Nagar Fire Oneindia Hindi Ground Report: सुबह के 8:50 बजे मालवीय नगर के लेमन ग्रीन रेस्टोरेंट और फ्लोरिश स्टे होटल परिसर में धुआं उठा। पहले हल्का-सा, फिर घना काला। और फिर चीखें 'बचाओ... बचाओ... मम्मी... पापा...'। इमारत के अंदर फंसे लोग खिड़कियों पर हाथ पटक रहे थे। शीशे तोड़ रहे थे। लेकिन बाहर निकलने का रास्ता... वो तो था ही नहीं। होटल का मेन गेट इलेक्ट्रॉनिक था। बिजली गई, गेट लॉक हो गया। बेसमेंट से लेकर छठी मंजिल तक लोग जिंदा जलने के लिए मजबूर हो गए।

जब आग बुझी, तब 21 जिंदगियां राख हो चुकी थीं। 37 लोग इतने बुरी तरह झुलस चुके थे कि अस्पताल में उनकी चीखें अब भी गूंज रही हैं। लेकिन सबसे दर्दनाक थीं उन परिवारों की कहानियां, जिन्होंने एक ही पल में सब कुछ गंवा दिया। एक बेटी, जो कल बेंगलुरु से पिता को देखने आई थी, आज लाश में बदल गई। दामाद-बेटी, दो नन्हीं बच्चियां, पूरा परिवार एक साथ तड़प-तड़प कर जल गया। आइए Oneindia Hindi के कैमरे से देखते हैं, पूरे मंजर की Ground Report...

malviya-nagar-fire-tragedy-eyewitness-story

नकुल गोयल की आवाज में फटा दिल

रोहिणी के नकुल गोयल मैक्स हॉस्पिटल के बाहर खड़े थे। गला रुंधा हुआ, आंखों में आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उन्होंने कांपती आवाज में बताया, 'सर... हमारे पांच लोग थे। घटना पर पहुंचे नकुल गोयल के पिता ने बताया कि दामाद, बहन और उनकी दो छोटी-छोटी बेटियां। बेटी कल ही बेंगलुरु से आई थी, अपने बाबा को देखने। सुबह 9:30 के आसपास आग लगी। अंदर 50-55 लोग थे। हमारे पांचों... पांचों एक्सपायर हो गए।'

उनकी आवाज भर्रा गई। 'सिर्फ बेटी के ससुर वेंटिलेटर पर बचे हैं। उनकी हालत... पता नहीं। एक ही परिवार से पांचों चले गए। गुड़गांव में रहते थे। यहां मैक्स हॉस्पिटल के पास ठहरे थे, ताकि ससुर के इलाज में आसानी हो। लेकिन... एग्जिट का समय ही नहीं मिला। फायर एग्जिट? वो तो था ही नहीं। जब तक उन्हें बाहर निकाला गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इलाज का मौका भी नहीं मिला।' नकुल जी की आंखें अब भी अपनों की जली लाशों को ढूंढ रही हैं। एक परिवार में से सिर्फ एक बुजुर्ग बचा है...वो भी मौत की दहलीज पर।

malviya-nagar-fire-tragedy

कांगो की बहन... कहां है मेरी बहन?

हादसे वाली जगह पर कांगो नागरिक एक विदेशी महिला फूट-फूटकर रो रही थी। उसकी आंखों में वो दर्द था, जो किसी भी भाषा में समझा जा सकता है। वो चीख-चीख कर बोल रही थी मेरी बहन अब इस दुनिया में नहीं रही।

मौके पर मौजूद एक चश्मदीद ने बताया कि मेरा घर ठीक सामने है। सुबह 8 बजे फोन आया, आग लग गई है। हम बाहर निकले। अंदर से चीखें आ रही थीं, बचाओ... बचाओ। मुख्य गेट इलेक्ट्रॉनिक था। रात में अपने आप बंद हो जाता था। बिजली गई तो गेट जाम। आग नीचे से शुरू हुई। ऊपर वाले लोग फंस गए। उसने और कई लोगों ने मिलकर शीशे तोड़े, गद्दे बिछाए, रस्सी डाली। एक महिला चौथी मंजिल से रस्सी पकड़कर उतरने की कोशिश कर रही थी। फिसल गई, लेकिन गद्दों पर गिरकर बच गई। आखिरी पलों में एक और महिला लटककर नीचे आई। लेकिन कई नहीं बच पाए। कांगो के इस युवक की बहन भी उनमें शामिल थी। वो अस्पताल के चक्कर काट रही है, लाश की पहचान के लिए। उसकी बिलखती आवाज दिल्ली की सुबह को और भी दर्दनाक बना रही है।

malviya-nagar-fire-tragedy

स्थानीय हीरो - अनीस और मोहल्ले के लोग

जब फायर ब्रिगेड पहुंचने में कीमती मिनट निकल गए, तब मालवीय नगर के आम लोग आगे आए। अनीस और उनके साथी सोए हुए थे। किराएदार ने जगाया कि भैया, आग लग गई! अनीस दौड़े। भयंकर आग थी। लोग खिड़कियों पर हाथ पीट रहे थे। शीशे तोड़ रहे थे। आग की लपटें बाहर निकल रही थीं। अनीस और मोहल्ले वालों ने गद्दे की दुकान से गद्दे निकाले। सड़क पर बिछाए। छह मंजिला होटल की फोर्थ फ्लोर से कूदने वाले लोग गद्दों पर गिरे। चोट तो लगी, लेकिन जान बच गई।

कुछ लोगों ने लंबी-लंबी सीढ़ियां बांधकर ऊपर पहुंचने का जुगाड़ किया। बेसमेंट का ऑटोमैटिक गेट लॉक हो गया था। वहां भी लाशें निकलीं। स्थानीय लोगों ने कहा कि हम यहीं के हैं। पूरा मोहल्ला हमारा है। हमने गद्दे बिछाए, सीढ़ी बनाई, एंबुलेंस में लोगों को डाला। ये सराहनीय है। लेकिन सवाल ये भी है कि आखिर क्यों आम आदमी को दमकल का काम करना पड़ रहा था?

वो पल जब मौत ने सब कुछ छीन लिया

आग बेसमेंट से शुरू हुई। एक ही मुख्य गेट। बेसमेंट में भी अवैध कमरे। लाइसेंस से चार गुना ज्यादा रूम। विदेशी मेहमान, मरीजों के परिजन, व्यापारी, सब फंस गए। धुआं घना था। सांस लेना मुश्किल। लोग तड़प-तड़पकर मरे। कुछ कूदे, कुछ जल गए। अधजली लाशों को अब रिश्तेदार पहचानने की कोशिश कर रहे हैं।

सिस्टम की नाकामी, बार-बार का दर्द

मालवीय नगर कोई पहला हादसा नहीं। उपहार सिनेमा, अनाज मंडी, मुंडका, हर बार यही कहानी। एक गेट, बंद एग्जिट, अवैध निर्माण, फायर सेफ्टी की अनदेखी। हर बार जांच, गिरफ्तारी, मुआवजा... और फिर भूल जाना। नकुल गोयल का परिवार, कांगो की बहन, दो नन्हीं बच्चियां...ये सिर्फ आंकड़े नहीं, जिंदा लोग थे। सपने थे। उम्मीदें थीं। एक बेटी कल आई, आज चली गई। ये दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

21 मौतें को मिलेगा न्याय?

21 मौतें। 37 झुलसे। परिवार टूटे। विदेशी मेहमानों की मौत। ये सिर्फ एक होटल की लापरवाही नहीं, पूरे सिस्टम की नाकामी है। MCD, फायर विभाग, पुलिस, सबकी जवाबदेही बनती है। नकुल गोयल की आंसू भरी आंखें, कांगो के युवक की बिलखती आवाज, अनीस जैसे स्थानीय लोगों की बहादुरी...ये सब हमें चेतावनी दे रहे हैं। दिल्ली की हर सुबह सुरक्षित होनी चाहिए। हर मां-बाप को अपने बच्चों के लौटने का इंतजार नहीं करना चाहिए। मालवीय नगर की इस आग ने दिल जलाए हैं। अब वक्त है कि हम अपनी चेतना जला दें। जवाबदेही मांगें। सुरक्षा सुनिश्चित करें। ताकि कोई और नकुल गोयल अपना पूरा परिवार न खोए। कोई और विदेशी महिला अपनी बहन को ढूंढती न रहे।

ये हादसा सिर्फ 21 मौतों का नहीं, ये हमारी सामूहिक लापरवाही का है। अपनों की जली लाशें ढूंढती आंखें अब भी रो रही हैं। क्या हम उन्हें न्याय दिला पाएंगे?

Delhi Fire: अंगारों पर दिल्ली! उपहार सिनेमा से Malviya Nagar तक, 'गोद में पाले' कितने अग्निकांड? मौतें 195 पार
Delhi Fire: अंगारों पर दिल्ली! उपहार सिनेमा से Malviya Nagar तक, 'गोद में पाले' कितने अग्निकांड? मौतें 195 पार
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+