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UP By-election : भाजपा के लिए बड़े खतरे का संकेत है जाटलैंड में हार

खतौली में हार के बाद एक बड़ा सवाल BJP की रणनीति पर भी उठ रहा है। प्रदेश अध्‍यक्ष भूपेंद्र चौधरी, क्षेत्रीय अध्‍यक्ष मोहित बेनिवाल तथा सांसद संजीव बालियान के जाट होने के बावजूद जाट मतदाता जयंत चौधरी के साथ क्‍यों चला गया?

Uttar pradesh By-election Results 2022 BJP performance in western UP

UP By-election: उत्‍तर प्रदेश में एक लोकसभा एवं दो विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजों से अंकगणित नहीं बदला, लेकिन संकेत मिल गये कि भाजपा के लिए पश्चिमी यूपी में 2024 आसान नहीं रहने वाला है।

भाजपा ने एक तरफ रामपुर का अजेय गढ़ भेद लिया तो दूसरी तरफ अपनी खतौली सीट को गंवा दिया। मैनपुरी में भाजपा को अपेक्षानुरूप परिणाम नहीं मिले, जिसकी उम्‍मीद पार्टी नेतृत्‍व को थी। भाजपा को उम्‍मीद थी कि इस सीट पर नजदीकी लड़ाई रहेगी, इसके विपरीत सपा ने मैनपुरी को बड़े अंतर से जीतकर 2024 के लिये कार्यकर्ताओं को संजीवनी दे दी है।

भाजपा के लिये सबसे बड़ा झटका मुजफ्फरनगर की खतौली सीट पर लगा है। रालोद ने भाजपा से इस सीट को बड़े अंतर से छीन लिया है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद भाजपा ने इस सीट पर मजबूत समीकरण तैयार किया था, लेकिन स्‍थानीय सांसद एवं केंद्रीय मंत्री डा. संजीव बालियान से जनता की नाराजगी ने बड़ा झटका दिया है।

खतौली में भाजपा की हार भविष्‍य के लिये खतरे की घंटी है। खतौली विधानसभा में आने वाले कवाल गांव में 2013 में हुए तिहरे हत्‍याकांड के बाद भड़के दंगों की जमीन पर भाजपा ने जाटलैंड में अपनी जड़े जमायी थीं। इन दंगों के बाद ही पश्चिमी यूपी में रालोद का मजबूत एवं जिताऊ जाट-मुस्लिम समीकरण ध्‍वस्‍त हुआ था। रालोद के वोट बैंक माने जाने वाले जाट एवं गुर्जर दंगों के बाद भाजपा के साथ जुड़ गये थे। वर्ष 2014 एवं 2019 के लोकसभा तथा 2017 एवं 2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को इसका लाभ मिला था।

दलित बाहुल्‍य पश्चिमी यूपी में जाट वोटरों को साधने के लिये भाजपा ने अन्‍य तमाम जातियों के प्रतिनिधित्‍व को दरकिनार कर जाट समुदाय से आने वाले प्रदेश अध्‍यक्ष भूपेंद्र चौधरी एवं क्षेत्रीय अध्‍यक्ष पश्चिम मोहित बेनिवाल को खतौली जिताने की जिम्‍मेदारी दी थी। लेकिन दोनों इस परीक्षा में असफल रहे। जाट वोटर पूरी तरह से सपा-रालोद गठबंधन के साथ चला गया। खतौली की हार सामान्‍य नहीं है बल्कि उस समीकरण एवं रणनीति पर सवाल है, जिसे साधकर भाजपा पश्चिमी यूपी में 2024 का समर जीतने की तैयारी कर रही है।

पश्चिमी यूपी में उत्तर प्रदेश की मात्र डेढ़ दर्जन विधानसभा सीटों पर निर्णायक प्रभाव रखने वाले जाटों को जोड़े रखने के लिये भाजपा ने अन्य जातियों के प्रतिनिधित्‍व को दरकिनार कर जाट नेताओं को आगे किया था। आरोप हैं कि स्‍थानीय सांसद डा. संजीव बालियान से नाराजगी के चलते जाट एवं गूर्जर वोटर रालोद गठबंधन के साथ चला गया। डा. बालियान के रालोद प्रत्‍याशी के खिलाफ पैनिया मारकर ठीक करने के दिये गये बयान ने गुर्जरों को भाजपा से दूर कर दिया। पर, इन आरोपों से इतर खतौली की हार ने भाजपा के जाट नेताओं की वोट जुटाने की क्षमता पर सवाल खड़े कर दिये हैं।

भविष्‍य को लेकर भी एक आशंका पैदा हो गई है कि भाजपा पश्चिमी यूपी में केवल जाटों पर भरोसा करके चुनावी समर में उतरेगी तो झटका लग सकता है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में भाजपा की जीत में दलित वर्ग के वोटरों का बड़ा योगदान था, लेकिन भाजपा ने इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की बजाय बसपा का वोटर मानकर छोड़ दिया। इस प्रभावशाली वर्ग को अपने साथ जोड़े रखने के लिये भाजपा ने मजबूत दलित नेतृत्‍व खड़ा करने का कोई प्रयास नहीं किया। भाजपा के पास पश्चिमी यूपी में दलित चेहरे के नाम पर राज्‍यसभा सांसद कांता कर्दम हैं, जिनकी इस वर्ग पर कोई पकड़ नहीं है।

खतौली विधानसभा सीट पर मुस्लिम, दलित, सैनी, गुर्जर तथा जाट मतदाताओं का दबदबा है। इस सीट पर 70 हजार मुस्लिम, 60 हजार दलित, 35 हजार सैनी, 30 हजार जाट एवं 29 हजार गुर्जर मतदाता हैं। ब्राह्मण 12 हजार, कश्‍यप 10 हजार तथा क्षत्रिय वोटर 5 हजार के आसपास है। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा मुजफ्फरनगर लोकसभा की पांच विधानसभा सीटों में सदर एवं खतौली पर ही जीती थी। चरथावल, बुढ़ाना तथा सरधना में सपा-रालोद गठबंधन के प्रत्‍याशी जीते थे। अब खतौली की हार के बाद भाजपा की एक सीट रह गई है, जिस पर प्रदेश के मंत्री कपिलदेव अग्रवाल विधायक हैं।

भाजपा के लिये सबसे बड़ी हार यह है कि दंगों के बाद जो जाट वोटर भाजपा की तरफ आया था, उसका बड़ा हिस्‍सा वापस रालोद की ओर लौट गया है। ऐसा तब हुआ है जब भाजपा का प्रदेश अध्‍यक्ष जाट, क्षेत्रीय अध्‍यक्ष जाट एवं स्‍थानीय सांसद भी जाट है। दूसरी तरफ, जाटों ने रालोद अध्‍यक्ष जयंत चौधरी पर अपना भरोसा जताकर भाजपा के लिए परेशानी भी खड़ी कर दी है। जयंत ने एक मंझे हुए नेता की तरह ना केवल जमीन पर उतर कर जाटों को साधा बल्कि चंद्रशेखर रावण को साथ लेकर जाट, गुर्जर, दलित एवं मुस्लिम का ऐसा मजबूत समीकरण तैयार किया, जिसने भाजपा को धूल चटा दी है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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