Uttar Pradesh BJP: घोसी की हार के बाद भाजपा के भीतर भूचाल
Uttar Pradesh BJP: घोसी उपुचनाव में पार्टी प्रत्याशी दारा सिंह चौहान की करारी हार के बाद भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यूपी को लेकर असहज हो गया है। नीति ही नहीं नेताओं की समीक्षा भी शुरु हो गयी है। ओबीसी और जाट को एक साथ साधने के लिये प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किये गये भूपेंद्र चौधरी के कार्यकाल की भी समीक्षा हो रही है। भाजपा के भीतरी सूत्रों का कहना है कि चौधरी दोनों ही मोर्चों पर फेल हुए हैं। जाट बहुल खतौली में हार के बाद पिछड़ा बाहुल्य घोसी में भी करारी पराजय ने भाजपा नेतृत्व को अपने फैसले पर सोचने को विवश कर दिया है। फिलहाल, नेतृत्व कोई कठोर कदम उठाने की बजाय डैमेज कंट्रोल में जुट गया है।
उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कुर्सी पर भूपेंद्र चौधरी की नियुक्ति को एक वर्ष से ज्यादा हो चुका है, लेकिन वह संगठन पर अपना मजबूत प्रभाव छोड़ पाने में नाकाम रहे हैं। हालात यह है कि एक साल बाद भी उनकी क्षेत्रीय टीम तैयार नहीं हो पाई है। नए जिलाध्यक्ष तक नियुक्त नहीं हो पाये हैं। बहुत मुश्किल और उठापटक के बाद भूपेंद्र चौधरी ने प्रदेश संगठन में खाली हुए स्थानों को भरा था, उसके बाद क्षेत्रीय अध्यक्षों की नियुक्ति की थी लेकिन क्षेत्रीय अध्यक्ष अब तक अपनी टीम नहीं बना पाये हैं। उनकी भेजी हुई सूची प्रदेश स्तर पर लटकी हुई है। दूसरी तरफ, जिलाध्यक्ष बदले जाने का इंतजार पार्टी के तमाम कार्यकर्ता कर रहे हैं। खबर थी कि पचास फीसदी जिलाध्यक्षों को बदलकर नये चेहरे लाये जायेंगे, लेकिन एक भी अध्यक्ष नहीं बदला जा सका है।

प्रदेश स्तर पर त्वरित फैसले नहीं लिये जाने से कार्यकर्ताओं में निराशा है। जिलाध्यक्ष बनने के आकांक्षी एवं अपनी कुर्सी बचाने के लिए परेशान नेता लखनऊ से दिल्ली की दौड़ लगा रहे हैं, जिससे पार्टी की चुनावी तैयारियां प्रभावित हो रही हैं। ऐसा ही हाल प्रदेश मीडिया विभाग का है। मीडिया टीम को संतुलित किये जाने की बात कही गई थी, लेकिन प्रदेश अध्यक्ष एक वर्ष बाद भी इस विभाग में हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा सके हैं। मीडिया की गुटबंदी का आलम यह है कि आधी से ज्यादा टीम भूपेंद्र चौधरी के बजाय पूर्व अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह पटेल से नजदीकी दिखाने के लिए उनके निर्देश पर काम कर रही है।
प्रदेश अध्यक्ष को लग रहा है कि मीडिया टीम उनके हिसाब से काम कर रही है, लेकिन सच्चाई यह है कि मीडिया टीम प्रदेश अध्यक्ष को अपने हिसाब से चला रही है। प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ खबरें भी मीडिया में लीक की जा रही हैं। यूपी भाजपा का आईटी सेल भी सपा एवं कांग्रेस के हमलों का जवाब देने में नाकाम साबित हो रहा है। राजनीतिक दलों में सबसे मजबूत माना जाने वाले भाजपा के यूपी आईटी सेल का पिछड़ना भगवा दल के लिये चिंता का सबब बन गया है। यह स्थिति इसलिए बनी हुई है कि प्रदेश अध्यक्ष खुद अपनी कुर्सी को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। 2024 की तैयारियों पर इसका विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
दरअसल, स्वतंत्रदेव सिंह पटेल के योगी मंत्रिमंडल में शामिल होने के बाद भूपेंद्र सिंह चौधरी को यूपी की कमान सौंपी गई थी। नेतृत्व को उम्मीद थी कि भूपेंद्र चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने से पश्चिमी यूपी के जाट बेल्ट में भाजपा को इसका लाभ मिलेगा। ओबीसी वोटरों के साथ सीमावर्ती हरियाणा के जाट भाजपा से जुड़ेंगे। रालोद एवं जयंत चौधरी के असर को भी इससे कम किया जा सकेगा, जिसका प्रभाव किसान आंदोलन के बाद से बढ़ा है, लेकिन अध्यक्ष बनने के बाद भूपेंद्र चौधरी अपने पहले ही इम्तिहान में फेल हो गये। चौधरी के नेतृत्व में पश्चिमी यूपी के जाट बहुल खतौली विधानसभा उपचुनाव में भाजपा अपनी ही जीती हुई सीट हार गई।
भाजपा के विक्रम सिंह सैनी खतौली सीट से विधायक चुने गये थे, लेकिन दंगे के मामले में कोर्ट से सजा मिलने के बाद उनकी विधायकी चली गई। भाजपा ने विक्रम के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर उनकी पत्नी राजकुमारी सैनी पर भरोसा जताते हुए उन्हें अपना प्रत्याशी बनाया। रालोद ने भाजपा की इस सिटिंग सीट पर गुर्जर समुदाय से आने वाले मदन भैया को अपना प्रत्याशी बनाया। चुनाव परिणाम आया तो भाजपा अपनी जीती हुई सीट हार गई। भूपेंद्र चौधरी को अध्यक्ष बनाये जाने के बावजूद जाट वोटर भाजपा की बजाय रालोद और जयंत चौधरी की तरफ चला गया। जाट वोटरों को लेकर भाजपा का दांव फेल होने से शीर्ष नेतृत्व परेशान हो गया।
खतौली उपचुनाव में हार के बाद ही भूपेंद्र की नियुक्ति को लेकर दिल्ली टीम असमंजस में पड़ गई तथा 2024 को ध्यान में रखते हुए जयंत चौधरी को अपने खेमे में लाने की कोशिश में जुट गई। जयंत के एनडीए गठबंधन में शामिल किये जाने की खबरों से भूपेंद्र परेशान हो गये। उन्हें जयंत को खुद से बड़ा जाट नेता मानने में असहजता होने लगी। उन्होंने बयान दिया कि गठबंधन के बजाय रालोद अगर भाजपा में विलय करता है तो उसका स्वागत है। भूपेंद्र के इस बयान से जयंत को अपने खेमे में लाने के प्रयास में जुटे शीर्ष नेतृत्व को झटका लगा। दिल्ली से भूपेंद्र चौधरी को फटकार लगाते हुए इस मुद्दे पर संयम बरतने का निर्देश दिया गया।
भाजपा की जयंत चौधरी से अंदरखाने बातचीत चलती रही। डील फाइनल होने के बाद मामला बागपत और मुजफ्फरनगर सीट पर आकर अटक गया। रालोद ने इन दो सीटों समेत कुल सात सीटों पर दावेदारी की, लेकिन भाजपा नेतृत्व इसके लिये तैयार नहीं हुआ। दोनों सीटें भाजपा की जीती हुई सीटें थीं। भाजपा नेतृत्व का मानना था कि जब जाट बाहुल्य सभी सीटों पर रालोद ही लड़ेगी तो फिर इस गठबंधन का उसे क्या फायदा मिलेगा? पश्चिम में झटका मिलने के बाद ही नेतृत्व ने पूरब में खुद को मजबूत करने के लिये पिछड़े वर्ग के वोटरों पर फोकस किया। पिछड़े नेताओं को कई स्तर पर प्रमुखता दी गई। एमएलसी सीट पर भी पिछड़ों को प्रमुखता देकर उच्च सदन भेजा गया।
पूरब में खुद को मजबूत करने के लिए केंद्रीय नेतृत्व ने ओमप्रकाश राजभर की पार्टी सुभासपा से गठबंधन किया, लेकिन घोसी के परिणाम ने भाजपा को परेशान कर दिया है। इस हार को भाजपा उम्मीदवार दारा सिंह चौहान से स्थानीय स्तर पर नाराजगी की बात कह कर प्रचारित किया जा रहा है, लेकिन परिणाम ने स्पष्ट कर दिया है कि भगवा पार्टी के साथ माया मिली ना राम वाली कहावत चरितार्थ हुई है। जाट ओबीसी की राजनीति साधते साधते उसका परंपरागत सवर्ण वोटर उससे दूर छिटकता जा रहा है। घोसी में यही हुआ है जिसे लेकर भाजपा के भीतरखाने भूचाल आया हुआ है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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