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Rahul and Priyanka: सोनिया गांधी के परिवार में चल क्या रहा है?

Rahul and Priyanka: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा से जब पूछा गया था कि कांग्रेस की तरफ से मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा, तो उन्होंने तपाक से कहा था, और कोई दिखता है क्या|

उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह उनकी अपरिपक्व शुरुआत थी, उनकी इस टिप्पणी से उन लोगों को बहुत निराशा हुई थी, जो पिछले एक दशक से कह रहे थे कि प्रियंका गांधी कांग्रेस का तुरुप का पत्ता है| वे लोग प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि देख रहे थे, क्योंकि उनकी नाक इंदिरा गांधी जैसी थी, क्योंकि उनका हेयर स्टाईल थोड़ा थोड़ा इंदिरा गांधी जैसा था, क्योंकि वह साड़ी इंदिरा गांधी की तरह पहनती थी|

Rahul and Priyanka:

प्रियंका ने नारा दिया था, लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ, लेकिन वह लड़ नहीं पाई, उनकी रहनुमाई में कांग्रेस को विधानसभा में सिर्फ दो सीटें और दो प्रतिशत वोट मिला| जो दो सीटें कांग्रेस जीती, उनमें प्रियंका गांधी की कोई भूमिका नहीं थी| एक तो प्रमोद तिवारी की बेटी आराधना मिश्रा जीती, और दूसरे फरेंदा सीट से लगातार तीन बार चुनाव हारने के बाद 12 सौ वोट से वीरेन्द्र चौधरी जीते|

कांग्रेस ने इसके बाद हुए हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने का श्रेय प्रियंका गांधी को दिया, क्योंकि नेहरू-गांधी परिवार की तरफ से वही वहां चुनाव प्रचार कर रही थी| हालांकि सच्चाई यह है कि ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करने के कांग्रेस के वायदे और भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी के कारण हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की जीत आसान हुई|

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इस समय नेहरू-गांधी परिवार में भारी कशमकश चल रही है| सोनिया गांधी खुद को असहाय पा रही हैं, क्योंकि बार बार की रिलांचिंग के बावजूद राहुल गांधी जनता में प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे और प्रियंका गांधी की लांचिंग भी बेकार गई| सच यह है कि सोनिया गांधी हिम्मत हार चुकी हैं, वह लोकसभा का चुनाव लड़ने की हिम्मत भी नहीं कर पाईं|

जबसे भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की सभी 80 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है, तभी से यह खबर आनी शुरू हो गई थी कि सोनिया गांधी उम्र और बीमारी की वजह से लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेगी| जबकि सच्चाई यह है कि 2019 में पारिवारिक सीट अमेठी से राहुल गांधी की हार के बाद सोनिया गांधी को भी रायबरेली से हारने का डर था| रायबरेली में अगर वह चुनाव लड़ती तो उनकी हार सुनिश्चित थी, क्योंकि पिछले पांच साल में वह रायबरेली गई ही नहीं| अगर बीमारी और उम्र ही चुनाव नहीं लड़ने की वजह है, तो राज्यसभा में जाने की भी क्या जरूरत थी, राज्यसभा अनुभवी लोगों का सदन तो है, लेकिन बीमार लोगों का सदन नहीं है|

जिस सोनिया गांधी ने 1991 में राजनीति में आने से ही इंकार कर दिया था, वह बीमारी और उम्र के कारण अब राजनीति से सन्यास क्यों नहीं ले रहीं| इसके दो बड़े कारण हैं, एक बड़ा कारण तो यह है कि उनके राजनीति से सन्यास लेने के बाद कांग्रेस राहुल और प्रियंका खेमों में बंट जाएगी| हम 2014 में कांग्रेस की करारी हार के बाद से देख रहे थे कि कांग्रेस के कुछ नेता राहुल गांधी के बजाए प्रियंका को नेतृत्व देने की मांग कर रहे थे| उत्तर प्रदेश के प्रमोद कृष्णम उनमें से एक थे, जिन्हें अब कांग्रेस ने इसी कारण निकाल बाहर किया है, क्योंकि वह खुलेआम राहुल गांधी की आलोचना कर रहे थे और प्रियंका के हाथ में कांग्रेस का नेतृत्व देने की बात कर रहे थे|

सोनिया गांधी के राजनीति से सन्यास नहीं लेने का दूसरा कारण यह है कि वह दस जनपथ नहीं छोड़ना चाहती, क्योंकि 1985 से वह इस विशाल कोठी में रह रही हैं, और इस कोठी की एक दीवार कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड से लगती है, जिसमें एक दरवाजा भी खोल दिया गया है| अगर वह सांसद नहीं रहेंगी, तो यह कोठी उन्हें खाली करनी पड़ेगी| हालांकि यह कोठी लोकसभा पूल की है, लेकिन मोदी सरकार इतनी बात तो मान ही लेगी कि यह विशाल कोठी राज्यसभा पूल में ट्रांसफर कर दी जाएगी|

सोनिया गांधी ने राज्यसभा का पर्चा दाखिल करने से पहले जो चिठ्ठी रायबरेली के वोटरों के नाम लिखी है, उसमें उन्होंने संकेत दिया है कि उस सीट से उनके परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़ेगा| तो अब सवाल पैदा होता है कि राहुल गांधी या प्रियंका गांधी| राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा तो यह भी चल रही थी कि प्रियंका वाड्रा हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा में आना चाहती थी, परंतु सोनिया गांधी और राहुल गांधी इससे सहमत नहीं हुए, लेकिन यह बात गले उतरने वाली नहीं है|

यह बात पूरी तरह शरारतपूर्ण लगती है कि प्रियंका राज्यसभा में आना चाहती थीं, लेकिन सोनिया और राहुल इसके लिए तैयार नहीं हुए, इसलिए वह नाराज हैं| इसी नाराजगी की वजह से वह राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल नहीं हुई| लेकिन इसका कारण दूसरा भी हो सकता है, वह यह कि वह राहुल गांधी के रास्ते में रूकावट नहीं बनना चाहती|

राहुल गांधी ने अपनी यात्रा में इंडी एलायंस के किसी भी सहयोगी को न्योता नहीं देकर खुद को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बना लिया है| हालांकि तेजस्वी यादव जरुर 16 फरवरी को बिहार के सासाराम में उनके सारथी बने दिखाई दिए| पिछली बार हमने देखा कि जैसे ही प्रियंका गांधी यात्रा में शामिल हुई थी, मीडिया में उनकी बात होने लगी थी| लेकिन यह बिलकुल सच नहीं लगता कि वह राज्यसभा का टिकट चाहती होंगी। पहली बार वह राज्यसभा में आने के बजाए चुनाव लड़कर लोकसभा में पहुंचना चाहेंगी|

अगर प्रियंका गांधी नाराज भी है, तो उसके कई और कारण हो सकते हैं, जैसे खुलेआम उनका समर्थन करने वाले प्रमोद कृष्णम को पार्टी से निकाल दिया जाना और उन्हें उत्तर प्रदेश के प्रभार से मुक्त कर दिया जाना| लेकिन 17 फरवरी को राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा जैसे ही चंदौली से उत्तर प्रदेश में प्रवेश करती, वह उस यात्रा में शामिल होने वाली थी| वह तो अचानक बीमार पड़ गई और 16 फरवरी को उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा|

राहुल गांधी 26 जनवरी को मध्यप्रदेश में प्रवेश से पहले 25 फरवरी तक उत्तर प्रदेश में ही है, अगर डाक्टर उन्हें इजाजत देंगे, तो वह उत्तर प्रदेश में ही या बाद में कहीं ओर यात्रा में शामिल हो सकती हैं| लेकिन वह पूरी यात्रा में ही शामिल नहीं होती हैं, तो यह सवाल जरुर उठेगा कि क्या वह किसी कारण मां और भाई से नाराज हैं| फिर भी एक बात तय है कि प्रियंका गांधी या राहुल गांधी दोनों में से एक रायबरेली में चुनाव लड़ेगा| यह सोनिया गांधी की रायबरेली की जनता के नाम लिखी खुली चिठ्ठी से स्पष्ट है|

अगर प्रियंका गांधी रायबरेली से चुनाव लड़ती हैं, तो वह राहुल गांधी की श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर विरोधी मुहिम के उलट राम लला के दर्शन करके चुनाव अभियान की शुरुआत कर सकती हैं| श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा का बायकाट करके कांग्रेस ने जो गलती की है, प्रियंका गांधी उसे ठीक करके रायबरेली या अमेठी में अपने जीतने की आधारशिला रख कर राहुल गांधी की राजनीति के विपरीत राजनीति शुरू कर सकती हैं|

श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मुख्य मुद्दा बना हुआ है| 17 फरवरी को जहां राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश के चन्दौसी में फिर से प्राण प्रतिष्ठा में बड़े बड़े लोगों को बुलाए जाने का मुद्दा उठाकर भाजपा को घेरने की कोशिश की, वहीं हरियाणा के रेवाड़ी में नरेंद्र मोदी ने भी श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर बनाने का वादा निभाने का मुद्दा उठाया|

रेवाड़ी वह जगह है, जहां से नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के बाद पहली रैली की थी| वहीं से मोदी ने 2024 के चुनाव का आगाज किया है| मोदी ने उसी रेवाड़ी में कहा कि कांग्रेस भगवान श्रीराम को काल्पनिक मानती है, इसलिए उसने श्रीराम जन्मभूमि की प्राण प्रतिष्ठा का बायकाट किया, लेकिन अब उसी कांग्रेस ने जय सियाराम बोलना शुरू कर दिया है|

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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