Undemocratic Language: भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी, लेकिन नेताओं का स्तर गिरा

विपक्ष को भारत के लोकतंत्र को विदेशों में बदनाम करने और चुने हुए प्रधानमंत्री के खिलाफ भद्दी भाषा का इस्तेमाल करके उन 45 प्रतिशत वोटरों का अपमान नहीं करना चाहिए, जिन्होंने उन्हें चुना है।

Undemocratic language used by opposition leader for pm and Indias democracy

Undemocratic Language: आज सोचने का विषय यह है कि भारत का लोकतंत्र कमजोर होता जा रहा है, या मजबूत हो रहा है| पहले लोकसभा चुनाव में 17 करोड़ वोटर थे और 45.7 प्रतिशत वोटरों ने मतदान किया था| 2019 में हुए अंतिम लोकसभा चुनाव में 91 करोड़ वोटर थे और 67.11 प्रतिशत वोटरों ने वोटिंग की| यानी लोकतंत्र डेढ़ गुना ज्यादा मजबूत हुआ है| फर्क सिर्फ इतना आया है कि देश ने कांग्रेस का विकल्प खड़ा कर दिया है| कांग्रेस ने पहले लोकसभा चुनाव में 497 में से 364 सीटें जीतीं थीं, लेकिन कांग्रेस को 45 प्रतिशत वोट ही मिले थे| चार साल पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 303 और एनडीए ने 353 सीटें जीतीं, अकेली भाजपा को 37.36 प्रतिशत और एनडीए को 45 प्रतिशत वोट मिला|

Undemocratic language used by opposition leader for pm and Indias democracy

ये आंकड़े बताते हैं कि भारत का लोकतंत्र जितना मजबूत 1952 में था, उससे कहीं ज्यादा मजबूत हुआ है| फिर प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेता राहुल गांधी का विदेशों में जाकर यह बताना कि भारत के लोकतंत्र पर खतरे के बादल मंडरा रहे है, कहां तक ठीक है| विपक्षी नेता बार बार यह कहते हैं कि भाजपा को देश की ५० प्रतिशत जनता ने नहीं चुना, जनता ने विपक्ष को ज्यादा वोट दिए हैं| तो आंकड़े उनके सामने हैं कि 1952 में जितने प्रतिशत वोटों से जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री बने थे, उतने प्रतिशत वोटों से ही नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं|

जिस तरह 1977 में विपक्ष कांग्रेस के खिलाफ एकजुट हुआ था, उसी तरह मौजूदा विपक्ष को भी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ एकजुट होने का अधिकार है| सबसे बड़े दल के नाते अगर यह कोशिश कांग्रेस करे, तो भी अच्छा, सबसे छोटा दल आम आदमी पार्टी करे, तब भी अच्छा| लेकिन भारत के लोकतंत्र को विदेशों में बदनाम करने और बाकायदा चुने हुए प्रधानमंत्री के खिलाफ भद्दी भाषा का इस्तेमाल करके उन 45 प्रतिशत वोटरों का अपमान नहीं करना चाहिए, जिन्होंने उन्हें चुना है| राहुल गांधी या अरविन्द केजरीवाल प्रधानमंत्री के लिए जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, वे भारत के लोकतंत्र का अपमान कर रहे हैं| क्योंकि वे जीते नहीं है, इसलिए मोदी को चुनने वालों को ही गलत ठहरा रहे हैं, यह लोकतंत्र तो कतई नहीं है|

राहुल गांधी ने लन्दन में अपने भाषण में कहा था कि भारत में लोकतंत्र नष्ट हो रहा है, न्यायपालिका नष्ट हो रही है, चुनाव आयोग नष्ट हो रहा है, सब कुछ नष्ट हो रहा है और खुद लोकतंत्र का प्रहरी कहने वाले देश अमेरिका और यूरोप आँख मूंदे हुए हैं| स्वाभाविक है कि उनके भाषण के ये अंश भारत की छवि को खराब करने वाले थे| राहुल गांधी के भाषण के इन्हीं अंशों को सही साबित करने के लिए पिछले एक सप्ताह में समूचे विपक्ष ने दो बड़े काम किए| शरद पवार के घर पर हुई विपक्षी दलों की बैठक में वोटिंग मशीनों पर एक बार फिर से सवाल उठाया गया|

पिछले लोकसभा चुनाव तक विपक्ष की मांग थी कि वोटिंग मशीनों के साथ पर्ची यानी वीवीपीएटी का इस्तेमाल किया जाए, विपक्ष के नेता सुप्रीमकोर्ट गए। सुप्रीमकोर्ट ने चुनावों से ठीक पहले 9 अप्रेल 2019 को जो निर्देश दिए थे, उसी के अनुसार सभी 543 लोकसभा सीटों पर वीवीपीएटी का इस्तेमाल किया गया था| कुल 17.4 लाख वीवीपीएटी मशीनों और 39.6 लाख ईवीएम का इस्तेमाल हुआ था|

हाल ही के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने हिमाचल प्रदेश में भाजपा को हरा कर जीत हासिल की है| इसी तरह पंजाब में कांग्रेस को हरा कर आम आदमी पार्टी ने सरकार बनाई है| दिल्ली नगर निगम के चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भाजपा को हरा कर नगर निगम चुनाव जीता है| शरद पवार की बुलाई इस बैठक में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों शामिल थीं| विपक्ष का यह अभियान राहुल गांधी को सच साबित करने के लिए भारत के लोकतंत्र पर सवाल उठाता है|

दूसरी बात यह हुई कि मानहानि के मामले में सूरत कोर्ट के फैसले के खिलाफ कांग्रेस ने सेशन कोर्ट जाने में उतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई, जितनी सूरत कोर्ट के जज के खिलाफ विषवमन करने में दिखाई| बाकी विपक्षी दलों ने भी कांग्रेस का साथ दिया| सूरत कोर्ट के फैसले के कारण राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता चली गई, तो समूचे विपक्ष ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च करने की कोशिश की| यह भी राहुल गांधी के लन्दन में दिए गए भाषण को सही ठहराने की कोशिश थी कि भारत की न्यायपालिका भी नष्ट हो गई है| जबकि ऐसे हजारों उदाहरण मौजूद है, जिनमें निचली अदालत के फैसले ऊपरी अदालतों में बदल जाते हैं| लेकिन निचली अदालत के जजों के खिलाफ इस तरह विषवमन नहीं किया जाता|

निचली अदालतों के हाल ही के दो फैसलों पर विपक्ष ने बहुत ज्यादा विषवमन किया है| सूरत की जिला अदालत के बाद गुजरात हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ तो आम आदमी पार्टी, ख़ास कर अरविन्द केजरीवाल ने अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है| गुजरात हाईकोर्ट ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री पर बिना वजह सवाल उठाने पर अरविन्द केजरीवाल पर 25 हजार का जुर्माना ठोका है|

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को चोर कहना शुरू किया हुआ है, तो अरविन्द केजरीवाल उन्हें अनपढ़ कह रहे हैं| गुजरात हाईकोर्ट से डांट खाने के बाद केजरीवाल और उनकी पार्टी का हर नेता कोर्ट पर भी सवाल उठा रहे हैं और फिर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री मांग रहे हैं| हाईकोर्ट के फैसले के अगले दिन उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर के हाईकोर्ट पर तीखी टिप्पणियाँ की| जिसमें उन्होंने कहा कि क्या कोई प्रधानमंत्री की डिग्री ही नहीं पूछ सकता, जो डिग्री पूछता है, उस पर 25 हजार का जुर्माना लगा दिया जाता है|

जिस तरह उन्होंने प्रधानमंत्री को फिर से अनपढ़ कहा और उनकी डिग्री पर फिर से सवाल उठाया है, लगता है उन्होंने हाईकोर्ट का वह फैसला नहीं पढ़ा| कोर्ट ने अपने फैसले में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक संस्थाओं के बारे में तीन महत्वपूर्ण बातें कही हैं| पहली बात तो यह कही है कि चुनाव लड़ने और मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बनने के लिए किसी डिग्री का होना अनिवार्य नहीं है| कोई भी चुनाव लड़ सकता है और अपनी सामाजिक योग्यता के आधार पर सीएम पीएम बन सकता है| केजरीवाल को इतना तो पता ही होगा कि चुनाव लड़ते समय उनसे उनकी डिग्री नहीं पूछी गई थी| वह वाराणसी में नरेंद्र मोदी के सामने लोकसभा का चुनाव लदे थे और दिल्ली में तीन बार विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं|

कोर्ट ने दूसरी बात यह कही है कि प्रधानमंत्री की डिग्री की मांग करना पब्लिक इंटरेस्ट वाला कोई मामला नहीं बनता, देश की जनता को इस बात से कुछ लेना देना नहीं कि उनके प्रधानमंत्री कितना पढ़ा लिखे हैं, उन्हें इस बात से मतलब है कि वह सरकार ठीक से चला रहे हैं या नहीं, उनके हाथों में देश सुरक्षित है या नहीं|

तीसरी बात सीधे सीधे केजरीवाल की पढाई लिखाई पर सवाल उठाने वाली है| कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि नरेंद्र मोदी की पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री 9 मई 2016 को यूनिवर्सिटी की वेबसाईट पर डाल दी गई थी| वैसे इस से पहले जब केजरीवाल ने पहली बार मोदी की डिग्री का सवाल उठाया था तब अमित शाह और अरुण जेटली ने प्रेस कांफ्रेंस करके दिल्ली यूनिवर्सिटी और गुजरात यूनिवर्सिटी की दोनों डिग्रियां दिखाई थीं|

जो डिग्री पहले से पब्लिक डोमेन में है, यूनिवर्सिटी की वेबसाईट पर मौजूद है, उसके लिए आरटीआई लगा कर आरटीआई का दुरूपयोग किया गया, विश्व विद्यालय, सूचना आयोग और कोर्ट का समय बर्बाद किया गया, इसलिए कोर्ट ने उन पर जुर्माना लगाया है| यह बात कोर्ट के फैसले में लिखी है, और यह अक्सर होता है कि कोर्ट का समय बर्बाद करने के लिए जुर्माना लगता ही है| कोर्ट के इस फैसले के बाद भी अरविन्द केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अनपढ़ कहना नहीं छोड़ा है|

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    अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जिस तरह की भाषा का राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे ये दोनों जरुर भारतीय लोकतंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं| दो अप्रेल को अरविन्द केजरीवाल ने असम में जाकर असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा के खिलाफ जिस तरह की भद्दी भाषा का इस्तेमाल सार्वजनिक तौर पर किया और उन्हें अपमानित किया, वह सारी सीमाएं लांघने वाला है| अगर दिल्ली की जनता ने उन्हें चुना है, तो असम की जनता ने भी हेमंत बिस्व सरमा को चुना है| केजरीवाल ने हेमंत बिस्व सरमा का नहीं असम की जनता का अपमान किया है|

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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