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UN Biodiversity Conference: धरती की जैव विविधता को बचाना जरूरी

संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन कनाडा के मॉन्ट्रियल में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में दुनिया भर की सरकारों द्वारा रसायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों पर दी जा रही सब्सिडी में हर साल 500 अरब डॉलर की कमी करने की सहमति बनी।

climate change

हाल ही में 7 से 19 दिसंबर के बीच कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन का आयोजन हुआ। इस सम्मेलन का समापन जिस समझौते से हुआ, वह मील का पत्थर साबित हो सकता है।

इस सम्मेलन के तहत कुल 23 लक्ष्य निर्धारित किए गए जो अल्पकालिक हैं। जैसे, 2030 तक दुनिया की कम से कम 30 प्रतिशत जमीन, तटीय इलाके और समुद्री क्षेत्र का संरक्षण करना, 30 प्रतिशत पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना, जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थानों पर नुकसान को शून्य करना आदि। इन सभी लक्ष्यों को सुरक्षित भविष्य की ओर बढ़ा ठोस कदम माना जा सकता है।

अभी जो स्थिति है, उसमें दुनिया में जीव-जंतुओं की 10 लाख प्रजातियों के अगले कुछ वर्षों में विलुप्त हो जाने का खतरा है। कहने की जरूरत नहीं कि जब हमारे बीच से इतनी बड़ी संख्या में जीव-जंतुओं का अंत होगा तो मानव अस्तित्व पर स्वाभाविक खतरा पैदा होगा।

उस खतरे के प्रति आगाह करने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण यह वैश्विक सम्मेलन कनाडा के मॉन्ट्रियल में संपन्न हुआ जिसमें धरती पर उपस्थित सभी प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधों को बचाने और उनके बसोवास को पुनर्बहाल करने के लिए तत्काल और ठोस कार्रवाई करने का फैसला हुआ। इसके लिए कार्रवाई के लक्ष्य निर्धारित किए गए और दिशा तय की गई।

यह सम्मेलन प्रतिष्ठित व चर्चित विश्व जलवायु सम्मेलन के समतुल्य था और इसमें स्वीकृत समझौते को पेरिस समझौता के बराबर माना जा रहा है। जलवायु सम्मेलन हर साल होते हैं, पर जैव विविधता सम्मेलन 1993 में हुए समझौते के बाद हर दो साल पर होते हैं। इसमें वैश्विक स्तर पर जैव विविधता के नुकसान को रोकने और प्राकृतिक बसोवास को बहाल रखने के बारे में विचार विमर्श होता है। मॉन्ट्रियल में हुआ यह सम्मेलन जैव विविधता सम्मेलनों की कड़ी में पंद्रहवां सम्मेलन था। इसे कॉप-15 कहा जा रहा है।

जैव विविधता सम्मेलन का विश्व जलवायु सम्मेलन के तुलना महज एक संयोग नहीं है। वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों की उत्पत्ति 1992 की रियो पृथ्वी सम्मेलन से हुई है। इस परिवार में तीसरा सदस्य मरुस्थलीकरण के खिलाफ वैश्विक सम्मेलन (सीसीडी) है। जैव-विविधता सम्मेलन( सीबीडी) की शुरुआत 1993 में हुई, बाकी तीन उसके अगले साल शुरु हुए।

तीनों पर्यावरणीय सम्मेलनों के कार्यक्षेत्र एक-दूसरे के पूरक हैं। जलवायु परिवर्तन जैव-विविधता के नष्ट होने के कारणों में है जबकि जमीन और समुद्र से उपयोग के तौर तरीकों में बदलाव का जलवायु परिवर्तन पर निर्णायक प्रभाव पड़ता है। धरती की स्थिति खराब होने का जलवायु परिवर्तन व जैव-विविधता दोनों पर प्रभाव पड़ता है।

इस कॉप-15 सम्मेलन में केवल लक्ष्य तय नहीं किए गए, उनकी निगरानी की व्यवस्था भी की गई। साथ ही जैव विविधता से संबंधित फंडिग के लिए सार्वजनिक व निजी स्रोतों से हर साल 200 अरब डॉलर जुटाने और विकासशील देशों को सालाना 30 अरब डॉलर देने की बात की गई है। मिट्टी और समुद्र ही नहीं, ईको-सिस्टम को बचाने की अनिवार्यता भी इसमें है।

चूंकि यह समझौता लक्ष्य केंद्रित है, इसलिए इसकी तुलना पेरिस समझौता से की जा रही है जिसमें वैश्विक तापमान की बढ़ोतरी को पूर्व औद्योगिक युग से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक पर रोक देने की बात थी। जिस प्रकार जलवायु परिवर्तन से बचाव को लेकर पहली बार एक ठोस लक्ष्य पेरिस में तय किया गया था, उसी तरह मॉन्ट्रियल में कॉप-15 में तीस प्रतिशत का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

सबसे अच्छी बात यह है कि इस सम्मेलन में दुनिया भर की सरकारों द्वारा रसायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों पर दी जा रही 18 खरब डॉलर की सब्सिडी में हर साल 500 अरब डॉलर की दर से कम करने की सहमति बनी है। इसका खाद्य व कृषि पर सीधा असर पड़ेगा। यह पर्यावरण अनुकूल खेती की राह प्रशस्त करेगा। ऐसी खेती संभव हो सकेगी जिसमें मिट्टी की पोषकता बनी रहेगी और इंसानों की सेहत भी दुरुस्त होगी।

समझौते में कीटनाशकों के उपयोग को 2030 तक पचास प्रतिशत घटाने का प्रावधान किया गया है। इसपर हालांकि कुछ देश सहमत नहीं हैं। पर सामूहिक फैसले का दबाव उन पर होगा और देर-सबेर उनके सहमत होने की संभावना बनी हुई है। भारत के लिए अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पहले से प्राकृतिक खेती की वकालत करने लगे हैं।

जैव विविधता के लिहाज से भारत का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा स्थान है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में विकास के नाम पर बड़े पैमाने पर पर्यावरण का विनाश किया गया है। छत्तीसगढ़ में कोयला खनन के नाम पर हजारों पेड़ काटने की बात चल रही है। उस खदान से निकला कोयला बिजली बनाने में इस्तेमाल होगा और वैश्विक तापमान की बढ़ोतरी में योगदान करेगा। अंडमान में विकास के नाम पर आठ लाख पेड़ काटे जाने की योजना है जिसके बदले में गुरुग्राम (हरियाणा) में वृक्षारोपण किया जाएगा।

पर्यावरण के लिहाज से ऐसी बेसिरपैर की कई योजनाएं सामने आ रही हैं। क्या इस तरह पारिस्थितिकी को बचाया जा सकता है? हरित क्रांति के समय से ही एकल कृषि को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसने जैव-विविधता को काफी चोट पहुंचाई है। जरूरत है कि पारिस्थितिकी में नुकसान का सही ढंग से आकलन किया जाए और उससे बचने के हर संभव उपाय किए जाए।

जैव-विविधता सम्मेलन केवल पारिस्थितिकी के संरक्षण से जुड़ा नहीं है, यह प्राकृतिक संसाधनों के सनातन उपयोग पर जोर देना वाला है। साथ ही इस संपदा के उपयोग से होने वाले फायदे के न्यायपूर्ण वितरण पर भी जोर है। अगर यूरोप का कोई औषध निर्माता तमिलनाडु में पैदा होने वाले किसी पौधे के औषधीय गुणों का उपयोग करना चाहता है तो उसे सभी हितधारकों के साथ लाभांश का बंटवारा करना होगा जिसमें वह समुदाय भी शामिल होगा जो उस पौधे का उपयोग करता रहा है।

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