Shiv Sena Symbol: न तीर बचा न कमान, उद्धव हैं परेशान
उद्धव के लिए यह अस्तित्व बचाने की लड़ाई थी जिसे वो हार गये हैं। लहूलुहान कर देने वाली इस लड़ाई के बाद अब उद्धव वीरान रणक्षेत्र को निहारते हुए अपने जख्म गिन रहे हैं, और पिता की बनाई शिवसेना का नामोनिशान मिटते हुए देख रहे।

सात महीने पहले महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के हाथों सत्ता गंवा चुके उद्धव ठाकरे शुक्रवार को शिवसेना पर कब्जे की लड़ाई भी हार गए। शुक्रवार को चुनाव आयोग ने अपने आदेश में शिवसेना का नाम और चुनाव निशान तीर कमान एकनाथ शिंदे गुट को देने का फरमान सुनाया। चुनाव आयोग ने पाया कि शिवसेना का मौजूदा संविधान अलोकतांत्रिक है। बिना किसी चुनाव के पदाधिकारियों के रूप में एक गुट के लोगों को अलोकतांत्रिक रूप से नियुक्त करने के लिए इसे बिगाड़ दिया गया है। इस तरह की पार्टी की संरचना विश्वास को प्रेरित करने में विफल रहती है।
चुनाव आयोग के इस निर्णय के बाद एक अपरिहार्य प्रश्न उठता है कि अब आगे क्या होगा? एकनाथ शिंदे के हाथों सत्ता और पार्टी गंवा चुके उद्धव ठाकरे क्या महाराष्ट्र की राजनीति में अहम किरदार बने रहेंगे या समाप्त हो जाएंगे? उद्धव ठाकरे की असली परीक्षा 90 दिन के भीतर होने वाले 20 नगर निगमों, 25 जिला परिषदों और 210 नगर परिषदों के महत्वपूर्ण चुनाव में होगी। इस चुनाव में उद्धव ठाकरे को यह साबित करना होगा कि भले ही कोई उनसे सत्ता छीन ले और पार्टी का नाम और सिंबल भी ले ले लेकिन सच्चे शिवसैनिकों को उनसे कोई नहीं छीन सकता और शिवसैनिक ही मातोश्री की ताकत हैं। इसलिए उद्धव की असली परीक्षा तो अब होगी जब वो शिवसेना के नाम और निशान के बगैर मैदान में उतरेंगे।
शिवसेना ऐसी पार्टी है, जिसके कार्यकर्ताओं का उल्लास और जीवंतता के साथ मातोश्री के प्रति अपार श्रद्धा ही उनकी जीवनी शक्ति है, लेकिन उद्धव ऐसे शख्स हैं जिनकी फितरत उस वक्त भी अपने खोल में दुबक जाने की है जब जमीन के साथ धड़कते हुए जुड़ाव की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। उद्धव, जो पहले ही शारीरिक तौर पर कमजोर थे, इस सबके कारण और भी कमजोर महसूस करेंगे।
30 जून 2022 को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवाने के बाद ही उद्धव ठाकरे ने शिवसेना को बचाने की कोशिश तेज कर दी थी। कुर्सी छोड़ने के अगले 10 दिनों में उन्होंने मध्य मुम्बई में दादर स्थित पार्टी मुख्यालय 'शिवसेना भवन' का चार बार दौरा किया। हर दूसरे दिन वह पार्टी पदाधिकारियों और निर्वाचित प्रतिनिधियों को संबोधित करते रहे। उद्धव यह सब इसलिए कर रहे थे क्योकि उनके अपने पैरों के नीचे जो भी जमीन बची थी, उसे बचाए रखने की कोशिश थी। विशेष रूप से इस बात की कि उनकी पार्टी पूरी तरह से उनका तख्ता पलट कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने वाले एकनाथ शिंदे के हाथों मे न चली जाए। लेकिन उद्धव शिवसेना बचा नहीं सके। शिवसेना के जन्म से शिवसेना का स्थायी पता मातोश्री से बदलकर थाणे चला गया। विधानसभा में शिवसेना के 55 में से 40 विधायकों और 12 सांसदों को तोड़ने के बाद पार्टी विभाजित करने में सफल होने के बाद पार्टी पर भी शिंदे का कब्जा होने का खतरा न सिर्फ वास्तविक था, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न भी था। उद्धव इसे भांपने और संभालने में विफल रहे।
उद्धव ठाकरे का राजनीति करने का तरीका अपने पिता बाल ठाकरे से काफी अलग रहा। बाल ठाकरे एक कार्टूनिस्ट थे, जिन्होंने बॉम्बे को आमची मुंबई में तब्दील किया। बाला साहेब बेमिसाल शख्सियत के मालिक थे। बाल ठाकरे ने जननायक की तरह भाषणबाजी में चहचहाता हास परिहास मिलाकर, भावनात्मक स्थानीय गौरव को बेलगाम हिंदुत्व के साथ जोड़कर और शहरी नौजवानों के बीच जबरदस्त स्वीकार्यता में विचारधारा का तड़का लगाकर लोकप्रियता हासिल की थी। बाल ठाकरे अपने आप में एक समूची दुनिया बन गए थे। शिवसेना के जनक बेशक वही थे। ऐसी पार्टी जिसने मराठी संस्कृति और राजनैतिक इतिहास की गहरी जड़ों से इस तरह ताकत ग्रहण की जैसे पहले कभी किसी ने नहीं की थी।
उद्धव को विरासत में पार्टी का ढांचा मिला, पर उन्होंने एक बुनियादी जटिलता के साथ काम किया। उनका व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था - ज्यादा मृदुभाषी और तकरीबन शर्मीले राजनीतिक के तौर पर उनकी विचारधारा कुछ कम तीखी और ज्यादा अनिश्चित थी। उद्धव ने असंभव को संभव बनाने की कोशिश की और घोर विरोधी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस से हाथ मिलाया और परिणामस्वरूप सत्ता और पार्टी दोनों गंवाई।
यह संकट उद्धव के असामान्य राजनीतिक करियर के लिए निर्णायक साबित होगा। उद्धव को यह सिद्ध करना होगा कि उनमें विपरीत स्थितियों से उबरने और संकटों को झेल पाने के लिए जरूरी दमखम है। जब उनके पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने 1997 मे उन्हें बृहन्मुबंई महानगरपालिका के चुनाव के लिए रणनीति बनाने की जिम्मेदारी सौंपी, तो उन्होंने अपने अंदर एक चतुर राजनेता के छिपे होने का सबूत दिया। उद्धव ने अपने पहले प्रयास में ही कांग्रेस को पटखनी दे दी और तब से अब तक बीएमसी पर अपनी पकड़ नहीं खोई है।
वर्ष 2003 में जब बालासाहेब ने राज ठाकरे की इच्छा के विरूद्ध उद्धव को शिव सेना के कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में पदोन्नत किया तब से शिंदे के विद्रोह करने तक उद्धव अपने सभी राजनीतिक विरोधियों को खत्म करने में सफल रहे थे। उद्धव के लिए उम्मीद की डोर अभी भी बहुत कमजोर नहीं है। कैडर का उन पर भरोसा है। कुछ अपवादों को छोड़कर शिवसेना के किसी भी पदाधिकारी ने शिंदे का समर्थन नहीं किया है। शिवसेना की लगभग पूरी राष्ट्रीय कार्यकारिणी 256 सदस्यों में से 249 द्वारा उ़द्धव के साथ एकजुटता व्यक्त करने के बाद भी शिवसेना को बचा नहीं सके।
शिवसेना पाकर एकनाथ शिंदे भले ही शिवसेना के नए सुप्रीमो बन गए हो, सच्चे शिवसैनिकों का वोट पाना एकनाथ के लिए आसान नहीं होगा। शिवसैनिकों की अटूट आस्था मातोश्री के साथ ही है। तमाम बगावतों और भाजपा, कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के तमाम भागीरथी प्रयासों और प्रलोभन के बाद भी शिवसैनिक मातोश्री के साथ जुड़े रहे। शिवसैनिकों के लिए मातोश्री किसी तीर्थ से कम नहीं है। शिवसैनिकों से उनकी पार्टी का नाम और चिन्ह भले ही एकनाथ शिंदे को चला गया हो, शिवसैनिकों का वोट एकनाथ के साथ चला जाएगा संभव नहीं है। एकनाथ शिंदे के लिए शिवसेना को उसी आक्रामकता के साथ भाजपा के सामने खड़े रखना संभव नहीं होगा।
अपना सबकुछ लुटा चुके उद्धव ठाकरे भावनात्मक रूप से शिवसैनिकों को कैसे जोड़ते हैं, यह देखना बाकी है। बीएमसी पर एकछत्र राज करने वाले उद्धव के सामने मुम्बई महानगर पालिका का चुनाव जीतना बेहद जरूरी है। शिवसैनिक इसी महानगर पालिका से पैसों की रसद पाते हैं और मातोश्री का झंड़ा उठाते हैं।
अब उद्धव ठाकरे को अपनी नई पार्टी शिवसेना उद्धव बालासाहेब ठाकरे को महाराष्ट्र के मराठीयों की रगो में बहने वाली पार्टी बनाना होगा। जैसे बाला साहेब ने शिवसेना को बनाया था। अभी महाराष्ट्र की राजनीति मे कई सस्पेस हैं और क्लाइमेक्स आना बाकी है। मुंबई की लोकल ट्रेन के समान लोगों के जीवन में बस गई शिवसेना किस रूप में नजर आती है और कहां नजर आती है, इसे देखने के लिए अभी थोडा इंतजार करना होगा। उद्धव के लिए शून्य से शिखर पर जाना आसान नहीं होगा। चुनौती बहुत बड़ी है। उद्धव ठाकरे कैसे पार पाते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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