Satyapal Malik: पुलवामा हमले को लेकर कितना सच बोल रहे हैं सत्यपाल मलिक?
पुलवामा में सैनिकों के काफिले पर हुए आतंकी हमलों को लेकर पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक जिस तरह के सवाल उठा रहे हैं उससे इतना तो स्पष्ट होता है कि वो सेना की गतिविधियों के बारे में कुछ नहीं जानते।

Satyapal Malik: सत्यपाल मलिक ने एक बार फिर पुलवामा में सीआरपीएफ के जवानों पर हुए आतंकी हमले पर दिये गये अपने बयान का बचाव करते हुए कहा है कि जब वो राज्यपाल थे तब भी पुलवामा और किसानों के मुद्दे पर बोला था। इसलिए उनके ऊपर यह आरोप लगाना गलत है कि राज्यपाल पद से हटने के बाद वो जानबूझकर मोदी सरकार को घेरने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं।
कुछ दिनों पहले जम्मू कश्मीर के राज्यपाल रह चुके सत्यपाल मलिक ने यह कहकर सनसनी फैला दिया था कि सीआरपीएफ ने गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय से हवाई जहाज की मांग किया था लेकिन केन्द्र सरकार ने मना कर दिया था। इसकी वजह से सैन्य बल सड़क मार्ग से गया और उस पर आतंकी हमला हो गया।
यह राष्ट्र का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि अधिकांश राजनीतिज्ञों को सेना और सुरक्षा बलों के काम करने के तरीके समझ में नहीं आते। वे अपने अल्प ज्ञान से, चाहे वह मंत्री हों, राज्यपाल हो या अन्य कुछ और हैं, अत्यंत त्रुटिपूर्ण निष्कर्ष निकालते हैं। राजनीतिज्ञों के अनेक ऐसे भाषण, अनेक ऐसे वक्तव्य रिकॉर्ड पर हैं जो उनकी सिर्फ अज्ञानता ही नहीं बल्कि किसी हद तक सेना और सुरक्षाबलों के विषय में उनकी मूर्खता को ही प्रदर्शित करते हैं।
आगे बढ़ने से पहले सबसे महत्वपूर्ण है कि हम यह समझ लें कि विवाद क्या है? 14 फरवरी 2019 को कश्मीर घाटी के पुलवामा जिले के अवंतीपुरा कस्बे के निकट जैश-ए-मोहम्मद नामक आतंकवादी संगठन के एक आत्मघाती आतंकवादी आदिल अहमद डार ने सीआरपीएफ के गाड़ियों के काफिले में अपनी विस्फोटकों से भरी कार को अचानक तेज गति से घुसा दिया था। इसके कारण बहुत बड़ा धमाका हुआ और 40 सीआरपीएफ के जवान मारे गए, अनेकानेक जवान घायल हुए तथा अनेक गाड़ियां डैमेज हो गई। सीआरपीएफ के लगभग 2500 जवानों और अफसरों को ले जा रहे इस काफिले में 78 बसों के अलावा वैन गार्ड और रियर गार्ड की सुरक्षा की गाड़ियां भी थी।
ज्ञातव्य है कि लगभग प्रतिदिन सीआरपीएफ ही नहीं, सेना का भी काफिला जम्मू से श्रीनगर और श्रीनगर से जम्मू सड़क मार्ग से आता जाता रहता है। गाहे-बगाहे दुर्घटनाएं और आतंकवादियों द्वारा आक्रमण होते रहे हैं, किन्तु इतना बड़ा आत्मघाती हमला इसके पहले नहीं हुआ। यह कोई साधारण घटना नहीं थी। पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित इस आतंकवादी हमले के बदले में, अत्यंत दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए भारत सरकार ने, पाकिस्तान के बालाकोट में एयर स्ट्राइक करके आतंकवादियों के कई शिविर नष्ट कर दिए थे।
अब वापस लौटते हैं सत्यपाल मलिक के बयान पर। जब यह दुर्घटना हुई उस समय सत्यपाल मलिक जम्मू कश्मीर के गवर्नर थे। उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा। इस दुर्घटना के लगभग 4 वर्ष बाद उन्होंने बयान दिया कि "दुर्घटना के बाद शाम को उसी दिन मैंने जब प्रधानमंत्री से बात की तो मैंने बताया कि इसमें पूरी तरह से हमारी गलती है। यदि हम इन जवानों को जाने के लिए हवाई जहाज दिए होते तो दुर्घटना नहीं होती। प्रधानमंत्री ने मुझसे कहा कि मुझे चुप रहना चाहिए।" इतना ही नहीं मलिक ने यह भी कहा कि इसके बाद उन्होंने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत दोवल से बात की और यही बात उन्होंने अजीत डोवाल को भी बताई। अजीत दोवाल ने भी कहा कि मुझे चुप रहना चाहिए। सत्यपाल मलिक कहते हैं कि मैंने अजीत डोवाल से कहा कि हम लोग तो सहपाठी हैं आपस में खुलकर बात कर सकते हैं, तो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने कहा- "आपको इस विषय में मुंह नहीं खोलना चाहिए।"
प्रश्न यह है कि क्या पुलवामा में हुई आतंकी वारदात के लिए प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, गृहमंत्री या यूं कहें कि सरकार किसी भी तरह से जिम्मेदार थी? एक सेना अधिकारी होने के नाते और कश्मीर में आतंकवाद विरोधी कार्यवाही में सम्मिलित होने और सैकड़ों मिलिट्री ऑपरेशन करने का जो अनुभव है उसके आधार पर यह कह सकता हूं कि इसमें सरकार की रत्ती भर भी गलती नहीं थी। यह विवाद या तो सत्यपाल मलिक की सैन्य प्रक्रियाओं की नासमझी के कारण है या राजनीति से प्रेरित हैं, जिसमें वह प्रधानमंत्री और सरकार को सिर्फ बदनाम करना चाहते हैं। निम्न कारणों से उनका यह वक्तव्य अनुचित और राजनीति से प्रेरित लगता है:
पहला, जम्मू से श्रीनगर और श्रीनगर से जम्मू प्रतिदिन सेना और अन्य सुरक्षा बलों के काफिले आते जाते हैं, जिसमें हजारों की संख्या में सुरक्षाकर्मी विभिन्न कारणों से इस मार्ग पर आवागमन करते हैं। तो यह कहना अत्यंत हास्यास्पद है कि यदि सीआरपीएफ को हवाई जहाज दिया गया होता तो यह दुर्घटना नहीं होती। क्योंकि यह दुर्घटना सीआरपीएफ के साथ नहीं होती तो किसी और के साथ हो सकती थी और अगर किसी और के साथ नहीं होती तो बहुत अच्छा होता। लेकिन मुख्य बात यह बताना है कि इस तरह की गतिविधि प्रतिदिन होती है तो यह कहना कि उनको हवाई जहाज से नहीं लाया गया इसलिए घटना हुई वह बिल्कुल ही आधारहीन है।
दूसरा, सड़क मार्ग से सैनिकों और सुरक्षा बलों का आना-जाना समाप्त नहीं किया जा सकता। उसके अनेक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण यह है कि यदि हम सड़क मार्ग से आना जाना बंद कर दें तो उसका निष्कर्ष यह होगा कि हम आतंकवादियों की गतिविधियों से डर गए हैं। हमने अपना अधिकार सड़क मार्ग और भूमि पर त्याग दिया है। कम से कम सेना की कार्यप्रणाली में यह सम्मिलित नहीं है। सेना, चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियां हो और चाहे कितना भी त्याग करना पड़े, भूमि से आवागमन या भूमि का त्याग नहीं कर सकती। सेना का यह सिद्धांत है कि जहां सैनिकों के पैर जमीन पर होते हैं वही भूमि हमारी होती है। क्योंकि सत्यपाल मलिक ने सेना में या सुरक्षाबलों में कभी काम नहीं किया इसलिए उनको इस विषय की बिल्कुल समझ नहीं है।
तीसरा, जो लोग इस बात की वकालत करते हैं कि सीआरपीएफ और सेना को हवाई जहाज से आने-जाने देना चाहिए और सड़क मार्ग से उनका आवागमन बंद कर देना चाहिए ताकि दुर्घटनाएं ना हो ऐसे लोग निहायत ही अज्ञानी, किसी हद तक कायर और भावुक हैं। ऐसे लोग कल यह भी तर्क दे सकते हैं कि सैनिकों और सुरक्षाबलों के लोगों की इतनी मृत्यु हो रही है इसलिए उनको वहां से हटा लिया जाना चाहिए। क्या हमें यह स्वीकार्य होगा?
चौथा कारण यह है कि इतनी बड़ी संख्या में जो आवागमन होता है उसको हवाई जहाज से लाना और ले जाना व्यावहारिक नहीं है। जो लोग यह वकालत करते हैं उनको यह समझ नहीं है कि हवाई जहाज हर व्यक्ति को उनके घर तक नहीं पहुंचायेगा। हवाई अड्डे से हर सैनिक को काफिले में अलग-अलग सड़क मार्ग से होकर ही अपनी यूनिट लोकेशन या अपनी ड्यूटी पर जाना पड़ेगा। क्या ऐसी घटना उस समय नहीं हो सकती?
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इसके अतिरिक्त कुछ राजनीतिक प्रश्न भी हैं जो सत्यपाल मलिक के बयान से जुड़े हैं। जिस समय सत्यपाल मलिक गवर्नर थे, राज्य की कानून व्यवस्था के लिए वह स्वयं जिम्मेदार थे। उन्होंने इस विषय में क्या कोई दिशानिर्देश जारी किया था? और यदि उनके दिशा निर्देशों का पालन नहीं हुआ या प्रधानमंत्री उनकी बात से सहमत नहीं हुए तो उन्होंने अपना विरोध किस प्रकार से दर्ज किया? अगर वह यही समझते थे कि प्रधानमंत्री ने जो कुछ किया वह अनुचित है तो वह त्यागपत्र दे सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
इससे इतना तो स्पष्ट है सत्यपाल मलिक आज जिस तरह के आरोप लगा रहे हैं या तो वो सच नहीं है और अगर सच हैं तो पुलवामा में जो कुछ हुआ उसके लिए वो भी समान रूप से जिम्मेवार हैं।
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