Criteria for National Party: क्यों जरूरी है राष्ट्रीय दल की मान्यता की शर्तों में बदलाव

भारत में राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर के राजनीतिक दल बनने की शर्तें बेहद लचीली और आसान हैं, जिनका लाभ उठाकर अनेक छोटी पार्टियां राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनकर उसके लाभ उठा रही हैं।

Time to change criteria for National Party bjp congress 8 national political parties Election Commission

Criteria for National Party: आम तौर पर यही माना जाता है कि भारत में दो ही बड़े राजनीतिक दल हैं कांग्रेस और भाजपा। बाकी सभी क्षेत्रीय दल हैं, लेकिन चुनाव आयोग की नजर में राष्ट्रीय स्तर के आठ राजनीतिक दल हैं। इनमें से माकपा और भाकपा की हैसियत भी अब क्षेत्रीय दलों की है, लेकिन वे राष्ट्रीय पहचान बनाए हुए हैं। जनता की नजर में बाकी चार तो शुद्ध क्षेत्रीय दल हैं ही, लेकिन चुनाव आयोग की नजर में वे राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं। ये हैं-मायावती की बहुजन समाज पार्टी, ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस, शरद पवार की नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी और दिवंगत पीए संगमा की नेशनल पीपल्स पार्टी।

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मोटे तौर पर ये सभी राजनीतिक दल अपने अपने राज्यों में सीमित हैं। इसके बावजूद इन्हें राष्ट्रीय दल की मान्यता है क्योंकि चुनाव आयोग का राष्ट्रीय दल की मान्यता देने वाला फार्मूला इतना लचीला है कि क्षेत्रीय दल होते हुए भी राष्ट्रीय दल की मान्यता मिल जाती हैं। ये दल मोलभाव कर के किन्ही तीन राज्यों में किसी बड़े नेता को चुनाव निशान देकर और उसकी हैसियत का फायदा उठा कर उस के राज्य में क्षेत्रीय दल का दर्जा हासिल कर लेते हैं, इस तरह राष्ट्रीय दल हो जाते हैं। इसलिए जरूरी है कि राष्ट्रीय दल की मान्यता और राज्य स्तरीय दल की मान्यता के मापदंड अलग अलग होने चाहिए।

मौजूदा नियम के मुताबिक़ राष्ट्रीय दल की मान्यता हासिल करने के लिए तीन विकल्प हैं। पहला- लोकसभा या विधानसभाओं के चुनावों में किन्ही चार विधानसभाओं में 6 प्रतिशत वोट और लोकसभा की चार सीटें जीतना। दूसरा- लोकसभा चुनावों में किन्ही तीन राज्यों से 11 लोकसभा सीटें जीतना। तीसरा-किन्ही चार राज्यों में राज्य स्तरीय पार्टी की मान्यता हासिल होना।

इनमें लोकसभा चुनाव परिणाम के आधार पर राष्ट्रीय दल की मान्यता हासिल करने के लिए मूलत: दो विकल्प हैं। इन दोनों विकल्पों पर भाजपा और कांग्रेस के अलावा कोई राजनीतिक दल खरा नहीं उतरता। माकपा, भाकपा, बसपा, एनसीपी, तृणमूल कांग्रेस और एनपीपी चार राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी की मान्यता के कारण राष्ट्रीय राजनीतिक दल बने हुए हैं। आम आदमी पार्टी अभी दिल्ली, पंजाब और गोवा में क्षेत्रीय पार्टी है। गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव में वह इसीलिए ज्यादा प्रचार कर रही है, क्योंकि इनमें से एक राज्य में क्षेत्रीय दल का दर्जा हासिल होते ही उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा, हैसियत और सुविधाएं मिल जायेंगी।

वैसे एच.डी. देवेगौडा की जनता दल सेक्युलर को भी इस समय कर्नाटक, केरल, और अरुणाचल प्रदेश में राज्य दल की मान्यता हासिल है, वह भी किसी एक राज्य में जोर लगा कर राष्ट्रीय दल बन सकता है। अब इन राष्ट्रीय दलों की वास्तविक हैसियत देख लीजिए। बसपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में 14 राज्यों में 351 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन सिर्फ यूपी में दस उम्मीदवार जीते, उसे पूरे देश में सिर्फ 3.63 प्रतिशत वोट मिला। माकपा सिर्फ तीन सीटें जीती और सारे देश में उसे 1.75 प्रतिशत वोट मिला। भाकपा दो सीटें जीती और पूरे देश में उसे सिर्फ 0.58 प्रतिशत वोट मिला।

नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी पांच सीटें जीती और उसे पूरे देश में 1.39 प्रतिशत वोट मिला। एनपीपी को सिर्फ एक सीट और 0.08 प्रतिशत वोट मिला। तृणमूल कांग्रेस एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसे 22 लोकसभा सीटें और 4.07 प्रतिशत वोट मिला, लेकिन वह भी सिर्फ एक राज्य बंगाल में। तृणमूल कांग्रेस को छोड़ कर बाकी पांच तथाकथित राष्ट्रीय दलों में से कोई 4 प्रतिशत वोट भी हासिल नहीं कर पाया।

फिर भी ये सभी राजनीतिक दल विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय राजनीतिक दल का दर्जा हासिल करने के नाते राष्ट्रीय दल का दर्जा हासिल किए हुए हैं। यह बहुत ही हास्यस्पद सा विकल्प है, जिसे खत्म किया जाना चाहिए। राज्य स्तर की मान्यता के लिए तो और भी हास्यस्पद शर्त है। राज्य स्तर पर मान्यता के लिए पांच विकल्प दिए गए हैं।

पहला विकल्प - किसी राज्य में छह प्रतिशत वोट के साथ विधानसभा की सिर्फ दो सीटें जीतना। दूसरा विकल्प - किसी राज्य में छह प्रतिशत वोट के साथ लोकसभा की सिर्फ एक सीट जीतना। तीसरा विकल्प -बिना कोई सीट जीते ही आठ प्रतिशत वोट हासिल कर के भी राज्य स्तरीय दल का दर्जा लिया जा सकता है। चौथा विकल्प - विधानसभा की तीन प्रतिशत सीटें जीतना, लेकिन न्यूनतम तीन सीटें। पांचवां विकल्प - किसी राज्य की लोकसभा की सीटों का चार प्रतिशत जीतना। यानि अगर किसी राज्य में लोकसभा की 100 सीटें हैं, तो चार सीटें जीतने पर राज्य स्तर की मान्यता मिल सकती है।

पी.ए. संगमा ने 2012 में नेशनल पीपल्स पार्टी बना कर 2013 में ही राष्ट्रीय दल की मान्यता हासिल कर ली थी, क्योंकि उन्होंने मेघालय के अलावा तीन अन्य छोटे राज्यों मणिपुर, अरुणांचल प्रदेश और नगालैंड में क्षेत्रीय दल की मान्यता हासिल कर ली थी। किसी बड़ी पार्टी से नाराज चल रहे राज्यों के प्रभावशाली नेताओं को अपने दल का चुनाव निशान दे कर मेघालय, मणिपुर, अरुणांचल प्रदेश और नगालैंड जैसे छोटे राज्यों में ये शर्तें पूरी करना कोई मुश्किल काम नहीं है।

संगमा ने 2013 में राजस्थान के विधानसभा चुनाव में भाजपा से नाराज चल रहे नेता और दौसा लोकसभा सीट से सांसद किरोड़ी लाल मीना को पार्टी में शामिल करके राजस्थान में भी विधानसभा की चार सीटें जीत ली थीं।

भाजपा, कांग्रेस, माकपा, भाकपा के अलावा बसपा एक समय राष्ट्रीय स्वरूप वाली पार्टी के रूप में जरुर उभरी थी। जब नौंवी लोकसभा से पन्द्रहवीं लोकसभा तक उसके चार राज्यों उतर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पंजाब से लोकसभा सांसद जीत रहे थे। राजस्थान, मध्य प्रदेश, पंजाब, छतीसगढ़, बिहार और उत्तराखंड में उसके विधायक भी जीत रहे थे। लेकिन सोलहवीं लोकसभा में उसका एक भी सांसद नहीं जीता था, उसकी राष्ट्रीय दल की मान्यता खत्म करने का नोटिस जारी कर दिया गया था, लेकिन जब भी किसी को नोटिस जारी किया जाता है, चुनाव आयोग नियमों में थोड़ा बहुत बदलाव कर के उनका अस्तित्व बचाने का काम करता है। बार बार नियमों में ढील दिया जाना इसका प्रमाण है।

तृणमूल कांग्रेस को भी पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, मणिपुर और अरुणाचल में राज्य स्तरीय दल की मान्यता के बाद राष्ट्रीय स्तर की मान्यता मिली थी। इससे पहले एनसीपी को भी महाराष्ट्र के अलावा पूर्वोतर के तीन राज्यों में राज्य स्तरीय पार्टी का दर्जा मिलने के कारण राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला था।

2019 के लोकसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस, एनसीपी और भाकपा राष्ट्रीय दल के लिए मान्यता का दर्जा खो चुके हैं। चुनाव आयोग ने इनकी राष्ट्रीय दल की मान्यता खत्म करने का नोटिस भी दिया था। लेकिन उनका जवाब आने के बाद चुनाव आयोग ने फिर लचीला रूख अपना लिया।

तृणमूल कांग्रेस का जवाब था कि उसे 2014 में राष्ट्रीय दल का दर्जा मिला था, कम से कम 2024 तक बरकरार रखा जाए। तीनों दलों ने आयोग के सामने पेश अपने जवाब में दलील दी है कि पुराने राजनीतिक दल होने के साथ-साथ, राष्ट्रीय राजनीति में उनका प्रमुख योगदान रहा है। इसलिए राष्ट्रीय दल के रूप में उनकी मान्यता का आकलन पिछले चुनावी प्रदर्शन के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। सीपीआई की दलील बाकियों से अलग थी, उसकी दलील थी कि सीपीआई कांग्रेस के बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी है और स्वतंत्रता आंदोलन में भी उसकी अग्रणी भूमिका रही है, एक समय में सीपीआई लोकसभा में प्रमुख विपक्षी दल रहा है, इसलिए उसका राष्ट्रीय दल का दर्जा बरकरार रखा जाए, उनकी दलील हमेशा के लिए राष्ट्रीय दल का दर्जा बरकरार रखने की है, भले ही सारे देश ने उसे पूरी तरह ठुकरा दिया है।

राष्ट्रीय दल के तौर पर मान्यता के लिए पहली दो शर्तों के विकल्प में लोकसभा की सीटें जीतना अनिवार्य है, लेकिन तीसरे विकल्प में लोकसभा में एक भी सीट न हो, तो भी किसी दल को राष्ट्रीय दल की मान्यता मिल सकती है और वह बिना एक भी लोकसभा सीट जीते राष्ट्रीय दल की मान्यता बरकरार भी रख सकता है।

अब वक्त आ गया है कि इसमें संशोधन किया जाए क्योंकि सिर्फ दो राजनीतिक दलों भाजपा और कांग्रेस के अलावा किसी अन्य दल का राष्ट्रव्यापी आधार नहीं है, फिर भी वे राष्ट्रीय दल का दर्जा हासिल किए हुए हैं।

राष्ट्रीय दल का दर्जा हासिल करने की पहली शर्त ही बहुत छोटी है कि सिर्फ चार राज्यों में 6 प्रतिशत वोट और लोकसभा की चार सीटें जीत कर कोई दल राष्ट्रीय दल की मान्यता पा सकता है। राष्ट्रीय राजनीतिक दल की मान्यता लोकसभा चुनाव परिणामों के आधार पर ही होनी चाहिए। राष्ट्रीय दल की मान्यता के लिए कम से कम दस राज्यों में दस प्रतिशत वोट और कम से कम 11 लोकसभा सीटें (कुल 543 की दो प्रतिशत) जीतना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

राज्य स्तर की मान्यता और राष्ट्रीय स्तर की मान्यता का घालमेल बंद करके चुनाव आयोग को सुधारात्मक कदम उठाने चाहिए। इतना ही नहीं, चुनाव आयोग को एक बार बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन भी करना चाहिए।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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