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BJP Rebels in Himachal election: बागियों के कारण भाजपा के लिए पथरीली हुई हिमाचल की राह

हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनाव में मोदी की छवि के सहारे सत्ता में वापसी का प्रयास कर रही भाजपा के लिए उसी के बागी उम्मीदवार खतरा बन गए हैं।

BJP Rebels in Himachal election: अनुशासित माने जाने वाली भारतीय जनता पार्टी के अनुशासन को हिमाचल प्रदेश में तगड़ा झटका लगा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हिमाचल से ही आने वाले जेपी नड्डा के तमाम मानमनौवल के बाद भी हिमाचल में भाजपा के बागीयों ने हथियार नहीं डाले और खुलकर चुनाव मैदान में डटे हुए है। बगावत से भाजपा कितनी परेशान है इसका इस बात से अंदाज लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी खुद बागी उम्मीदवारों को संदेश भेजकर मुकाबले से हटने का आग्रह कर रहे है।

BJP Rebels in Himachal elections 2022 importance

हिमाचल प्रदेश ऐसा प्रदेश है जहां थोड़े से अंतर से ही हार जीत तय होती है। ऐसे में लगातार दूसरी बार सरकार बनाने का संकल्प लेकर चल रही भाजपा की राह में भाजपा के ही बागी रोड़ा बन गए है। सत्ता बरकरार रखने के लिए और सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए भाजपा ने दो मंत्रियों सहित 11 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए। भाजपा ने 23 नए चेहरों को मैदान में उतारा है जिसके कारण 14 सीटों पर बगावत का सामना करना पड़ रहा है।

पार्टी में नेताओं की बगावत ने प्रधानमंत्री मोदी को भी चिंतित कर दिया है और इस कारण हिमाचल में चुनाव की घोषणा के बाद पहली बार मंडी पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी को जनसभा के दौरान कहना पड़ा कि "कमल का फूल ही भाजपा है। कमल के फूल पर मिला हुआ वोट उन्हें मजबूत करेगा।" उनके भाषण से साफ झलक रहा था कि पार्टी को बगावत का डर है। मोदी ने हिमाचल की जनता को संदेश दिया कि कैंडिडेट कौन है, इस पर मत जाइए। भाजपा के सर्वाेच्च नेता मोदी ही नहीं, हिमाचल से आने वाले पार्टी अध्यक्ष जे पी नड्डा और मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की नींद भी बागियों ने उड़ा दी है।

भाजपा के जिन नेताओं ने भाजपा के लिए राह में कांटे बिछा दिए है उनमें मंडी से प्रवीण शर्मा, बिलासपुर में सुभाष ठाकुर, बंजार में हितेश्वर सिंह, किन्नौर में तेजवंत नेगी, चंबा में इंदिरा ठाकुर, नूरपूर में कृपाल परमार, देहरा में होशियार सिंह, आनी में किशोरी लाला, करसोग में युवराज कपूर, बड़सर में संजीव शर्मा, नालागढ़ में केएल ठाकुर जैसे बड़े नेता शामिल हैं।

यही वजह है कि पार्टी बगावत को लेकर चिंतित नजर आ रही है। भाजपा के लिए चिंता इस बार यह भी है कि उनके मुकाबले कांग्रेस में मात्र 7 सीटों पर ही बागी मैदान में हैं। मौजूदा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर मंडी जिले से आते है। पिछले विधानसभा चुनाव में यहां की 10 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का सफाया हो गया था लेकिन लोकसभा उपचुनाव में यहां भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था।

इस बार मुख्यमंत्री ठाकुर के लिए अपना जिला बचाना आसान नहीं होगा। केन्द्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर के क्षेत्र हमीरपुर की 5 विधानसभा सीटों में से 3 पर बीजेपी मुश्किल में है। चंबा सदर सीट पर भाजपा उम्मीदवार नीलम नय्यर के खिलाफ उसी की नेता इंदिरा कपूर मैदान में है। पार्टी ने यहां पहले इंदिरा कपूर को टिकट दिया और फिर उनकी जगह नीलम नय्यर को उम्मीदवार बना दिया।

फतेहपुर सीट पर जयराम सरकार में वनमंत्री रहे राकेश पठानिया को हराने के लिए भाजपा के ही प्रदेश उपाध्यक्ष कृपाल परमार मैदान में है। देहरा सीट पर विधायक होशियार सिंह ठाकुर भाजपा प्रत्याशी रमेश धवाला के खिलाफ लड़ रहे हैं। होशियार सिंह कुछ समय पहले भाजपा में शामिल हुए थे लेकिन टिकट न मिलने से निर्दलीय मैदान में है। वह 2017 में इसी सीट से निर्दलीय जीते थे। इंदौरा सीट पर पार्टी उम्मीदवार रीटा धीमान के सामने मनोहर धीमान ने मोर्चा खोल रखा है। कांगड़ा सीट पर कुलभाष चौधरी की मौजूदगी पवन काजल के लिए परेशानी पैदा कर रही है।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा के घर बिलासपुर में पार्टी उम्मीदवार त्रिलोक जमवाल को सुभाष शर्मा से चुनौती मिल रही है। झंडूता सीट पर वर्तमान विधायक कटवाल की राह में पूर्व मंत्री स्व. रिखीराम कौंडल के बेटे राजकुमार ने कांटे बिछा दिए हैं। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के क्षेत्र मंडी में भी भाजपा को अपने बागियों से लड़ना पड़ रहा है।

सुंदरनगर सीट पर भाजपा के प्रदेश महामंत्री राकेश जमवाल को पूर्व मंत्री रूप सिंह के पुत्र अभिषेक ठाकुर से, नाचन सीट पर 2017 में प्रदेश में सबसे अधिक मार्जिन से जीतने वाले विनोद कुमार को ज्ञानचंद से और मंडी सदर सीट पर प्रवीण शर्मा की बगावत ने भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार अनिल शर्मा की राह मुश्किल कर दी है।

कुल्लू, किन्नौर,शिमला और सोलन में भी भाजपा के नाक में बागी उम्मीदवारों ने दम कर रखा है। कुल्लू सीट पर महेश्वर सिंह के नामांकन वापस लेने के बावजूद भाजपा उम्मीदवार नरोत्तम ठाकुर के सामने रामसिंह मैदान में है। यही स्थिति कुल्लू जिले की आनी, मनाली और बंजार सीट पर है। किन्नौर में भी पार्टी प्रत्याशियों के सामने बागियों की चुनौती है।

हिमाचल में परंपरागत रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला होता रहा है। पिछले 2017 के चुनाव में जब भाजपा को कुल 68 में से 43 सीटें मिली थी, तब भी 20 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत का अंतर 3000 से कम और छह में 1000 से कम था। ऐसे में प्रदेश में भाजपा की वापसी पर पार्टी के बागी ग्रहण लगा सकते है।

राज्य में भाजपा पूरी तरह मोदी के चेहरे और करिश्मे के साथ साथ अमित शाह और जेपी नड्डा के चुनावी प्रबंधन पर निर्भर है। भाजपा मोदी के चेहरे और बूथ प्रबंधन के जरिए गोवा, उत्तराखंड जैसे राज्यों में सत्ता विरोधी लहर को काबू कर बेहतर नतीजे हासिल कर चुकी है। पार्टी अब यही प्रयोग हिमाचल प्रदेश में कर रही है।

बागियों की चुनौती के बीच भाजपा इस बात से राहत महसूस कर रही है कि आम आदमी पार्टी के मैदान में होने से वह कांग्रेस का वोट काटेगी जिससे भाजपा की सत्ता में वापसी की संभावना बनी हुई है। कांग्रेस के अंदर जारी आपसी खींचतान भी भाजपा के लिए राह आसान कर सकता है। प्रतिभा सिंह के करीबी हर्ष महाजन और पवन काजल ने भाजपा का दामन थाम लिया है। पवन काजल अब कांगडा से भाजपा के उम्मीदवार है।

इसके अलावा कुलदीप सिंह राठौर, सुखविंदर सिंह सुक्खू,आशा कुमारी और मुकेश अग्निहोत्री जैसे नेताओं के विभिन्न गुटों के अलावा पूर्व केन्द्रीय मंत्री आनंद शर्मा और वरिष्ठ नेता विद्या स्टोक्स के वफादारों के साथ कांग्रेस की राज्य ईकाई गुटबाजी का शिकार है। यही भाजपा के लिए थोड़ी राहत की बात हो सकती है। लेकिन भाजपा के भीतर जारी गुटबाजी का असर चुनाव परिणाम पर क्या आता है, ये देखनेवाली बात होगी।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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