China and Tibet: जब चीन ने तिब्बत पर कब्जा किया, लेकिन भारत ने नहीं उठाया कोई कदम
चीन ने जब 10 मार्च 1959 के दिन तिब्बत पर कब्जा किया तब भारत सरकार पंचशील जैसे एकतरफा नियमों का हवाला दे रही थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री को लगता था कि गुटनिरपेक्षता की उनकी नीति का दुनिया के सभी देश पालन करेंगे।

China and Tibet: बात 8 मई 1959 की है। इस दिन कांग्रेस की केंद्रीय कार्यसमिति ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया। प्रस्ताव में कहा गया कि "दलाई लामा और उनके साथ आये तिब्बतियों ने भारत में शरण ली है। इन शरणार्थियों को हम अपनी मान्यता प्रदान करते है। इन सभी की भारत में आस्था है। मानवीय आधार पर यह जरुरी और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार न्यायसंगत भी था।"
बात यहां तक तो ठीक है। मगर इसके आगे प्रस्ताव में जो बातें कांग्रेस कार्यसमिति कहती है वह चौंकाने वाली है। उस प्रस्ताव में आगे कहा गया कि "भारत के सभी देशों के साथ दोस्ताना सम्बन्ध है। हमने यह तय किया है कि हम किसी देश के आतंरिक मामलों में दखल नहीं देंगे। यह पंचशील सिद्धांत के नियमों में से एक है।"
दरअसल, इसी साल 17 मार्च को दलाई लामा ने तिब्बत की राजधानी ल्हासा को छोड़ दिया था। वे हजारों की संख्या में तिब्बती नागरिकों के साथ भारत में शरण लेने को मजबूर हो गए थे। कांग्रेस कार्यसमिति ने इसी संदर्भ में वह प्रस्ताव पारित किया था।
अब सवाल है कि ये लोग क्यों भारत आये? तो इसका जवाब प्रस्ताव से मात्र चार दिन पहले 4 मई को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राज्य सभा में दिया। उन्होंने उस दिन बताया कि आखिर तिब्बत में क्या हुआ था। उनका कहना था, "11 मार्च को ल्हासा स्थित हमारे कांसुलेट-जनरल का हमारे पास एक सन्देश आया। उन्होंने बताया कि शहर में कुछ गड़बड़ है क्योंकि बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, अधिकारी, बौद्ध भिक्षु, मोनास्ट्री के प्रमुख यहां आ रहे हैं। वे लगातार चीनी सरकार की शिकायतें कर रहे है और बहुत ही परेशान हैं। कांसुलेट-जनरल को पता ही नहीं था कि उसे क्या करना है? इसलिए उन्होंने 10 मार्च को हमें सन्देश भेजा जोकि हमें 11 मार्च को मिला।"
प्रधानमंत्री नेहरू फिर आगे बताते है, "यह पहली बार हमें जानकारी मिली थी कि वहां कुछ हलचल हो रही है। इसके बाद 14 तारीख को हमें फिर से एक सन्देश मिला कि 5,000 तिब्बती महिलायें कांसुलेट-जनरल के पास आई और ल्हासा स्थित चीनी विदेश विभाग के बारे में शिकायतें करने लगी। उन्होंने कांसुलेट-जनरल से कहा कि आप हमारे साथ चीनी विदेश विभाग के दफ्तर चलिए तभी आपको पता चलेगा कि हमारे साथ क्या हो रहा है।" प्रधानमंत्री आगे बताते है, "उस बेचारे कांसुलेट-जनरल को पता ही नहीं था कि उन्हें क्या करना है? उन्होंने जाने से साफ मना कर दिया। फिर उन्होंने हमें सन्देश भेजा। हमने जवाब में कहा कि ल्हासा में जो कुछ हो गया और जो कुछ हो रहा है उसमें आप मत उलझिए।"
राज्यसभा के अपने इस भाषण में प्रधानमंत्री नेहरू ने दलाई लामा से मिली जानकारी के आधार पर बताया कि "दलाई लामा के अनुसार 17 तारीख को शाम चार बजे समर प्लेस के पास दो बम आकर गिरे। इसके बाद उन्होंने तय कर लिया कि अब यहां से निकलने में ही उन सबकी भलाई थी क्योंकि यह युद्ध की शुरुआत थी। इस प्रकार उन्होंने ल्हासा छोड़ दिया। और इतना ही मैं जानता हूँ।"
वास्तव में वे इतना ही नहीं बल्कि इससे कहीं ज्यादा जानते थे। आगे बढ़ने से पहले जब चीन ने 1962 में भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया तब प्रधानमंत्री ने क्या कहा, वह जानना चाहिए। उस दौरान उन्होंने 12 नवंबर 1962 को लोक सभा में कहा, "पिछले पांच सालों से हम हमारी उत्तरी सीमाओं पर चीनी हमलें झेल रहे है।" इस भाषण में उन्होंने यह भी जोड़ा कि, "साम्राज्यवाद अब समाप्त हो गया है। यूरोपीय उपनिवेश से कई देश मुक्त हो चुके हैं और अब स्वतंत्र है। दिलचस्प बात यह है कि साम्राज्यवाद विरोधी, यानी चीन की जनवादी सरकार, अब आक्रामकता और साम्राज्यवादी विस्तार के रास्ते पर चल रही है।"
यानी बतौर प्रधानमंत्री नेहरू, साल 1957 में यह जानते थे कि भारत के सीमावर्ती इलाकों पर चीनी हमलों के क्या मायने हैं? फिर भी वे शांत रहे। जब 10 मार्च 1959 को चीन ने पूरी तरह से तिब्बत को हड़प लिया, उस दिन भारत के प्रधानमंत्री के पास एक मौका था कि वे भविष्य में पैदा होने वाले चीनी खतरे को पहले ही रोक ले। मगर तब न सिर्फ वे खुद, बल्कि कांग्रेस कार्यसमिति, और तिब्बत में मौजूद भारतीय अधिकारी सभी असहाय से नजर आ रहे थे। जबकि हर किसी को पता था कि चीन ने भारत पर हमले शुरू कर दिए है। जल्दी ही वह तिब्बत पर कब्जा कर लेगा और फिर उसकी नजर भारत पर होगी।
तिब्बत हमेशा से ही स्वतंत्र देश रहना चाहता था। 8 जनवरी 1949 को तिब्बती सरकार के प्रतिनिधि त्सेपोन शाकबापा ने प्रधानमंत्री नेहरू से दिल्ली में मुलाकात कर तिब्बत की स्वाधीनता की मदद मांगी थी। उन्होंने तिब्बत के खस्ता आर्थिक हालातों की ओर ध्यान दिलाते हुए प्रधानमंत्री से दो मामलों में सहायता मांगी। एक, भारत और तिब्बत के बीच मुक्त व्यापार, जिससे तिब्बती माल भारत में बेचा जा सके। दूसरा, वैश्विक व्यापार के लिए तिब्बत को सोना खरीदना था जिसके लिए उन्होंने भारत सरकार से दो मिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक सहायता मांगी। दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री नेहरू ने दोनों ही प्रस्तावों को चीन के दबाव में नामंजूर कर दिया।
इसके बाद तिब्बत के पास कोई विकल्प नही बचा और उसे चीन की अधीनता स्वीकार करनी पड़ गयी। साल 1951 में चीन के साथ हुए एक समझौते के तहत तिब्बत को स्वायत्त देश कहा गया । मगर यह एक चीनी साम्यवादी षड्यंत्र था। दरसअल, चीनी सरकार इस समझौते की आड़ में तिब्बत में दाखिल हो गयी। आखिरकार साल 1956 के आसपास तिब्बती बौद्ध नागरिकों को चीन के खिलाफ हथियार उठाने पड़ गए। तीन सालों के गुरिल्ला संघर्ष के बाद इन प्रयासों ने भी दम तोड़ दिया।
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ऐसा नही है कि इन सब घटनाक्रमों की जानकारी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को नहीं थी। सबकुछ उन्हीं के आंखों के आगे हो रहा था। उन्होंने कोई ठोस कदम उठाने के बजाए गुटनिरपेक्षता और पंचशील जैसे एकतरफा और दकियानूसी सिद्धान्तों को महत्व दिया। अंत में तिब्बत तो गया ही बल्कि भारत की सार्वभौमिकता और अंखडता पर भी चीन ने चोट पहुंचाई। जो तिब्बत एक बफर के रूप में भारत और चीन के मध्य स्थित था, उस पर कब्जा करके चीन भारत की सीमाओं पर पहुंच गया और तब से भारत की भूमि पर अपनी नजरें गड़ाए बैठा है।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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