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Third Front Politics: क्या 2024 आम चुनाव से पहले खड़ा हो पायेगा तीसरा मोर्चा?

तीसरा मोर्चा भारतीय राजनीति का वो बेताल है जो उड़ता तो है लेकिन फिर खाली हाथ लौटकर डाल पर आ जाता है। तीसरे मोर्चे के नाम पर छोटे दलों को इकट्ठा करने का प्रयास होता है और हर बार वह प्रयास हवा में उड़ जाता है।

third Front Politics Mamta Nitish kumar Chandrasekhar Rao vs bjp in 2024 general election

Third Front Politics: 2024 आम चुनाव से पहले ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और चंद्रशेखर राव अपने अपने स्तर पर तीसरा मोर्चा बनाने का प्रयास कर रहे हैं। नीतीश कुमार जहां कांग्रेस को लेकर बीजेपी के खिलाफ छोटे दलों को जोड़ना चाहते हैं वहीं ममता बनर्जी गैर वाम दलों के साथ आगे बढ़ना चाहती हैं। तीसरे मोर्चे के तीसरे महारथी चंद्रशेखर राव गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी दलों को जोड़कर तीसरे मोर्चे को आकार देना चाहते हैं।

दो बड़े राष्ट्रीय दलों भाजपा और कांग्रेस के इतर देश में दर्जनों ऐसे छोटे दल हैं जो स्थानीय स्तर पर अपना प्रभुत्व रखते हैं। कांग्रेस के सिकुड़ने के साथ एक ओर जहां भाजपा का विस्तार हुआ है वही क्षेत्रीय दलों का आकार भी बढ़ा है। ऐसे में ये क्षेत्रीय दल समय समय पर एकजुट होने की कोशिश करते रहते हैं जिसे भारतीय राजनीति में तीसरा मोर्चा कहा जाता है।

तीसरे मोर्चे का इतिहास भी कोई कम पुराना नहीं है। आपातकाल के बाद से ही इस तरह के प्रयास शुरु हो गये थे। लेकिन भारतीय राजनीति में राष्‍ट्रीय स्‍तर पर गैर-भाजपा एवं गैर-कांग्रेस दलों के तीसरे मोर्चे का इतिहास देखें तो यह हताश करने वाला है। मोर्चे के नेताओं की महत्‍वाकांक्षा ने हर बार जनता को निराश किया है। 1977 में आपातकाल के खिलाफ भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), प्रजा सोशलिस्‍ट पार्टी तथा भारतीय लोकदल ने एक साथ मिलकर जनता पार्टी के बैनर तले चुनाव लड़ा तथा 295 सीटें जीतीं।

सियासी उठापटक के बीच जगजीवन राम और चौधरी चरण सिंह को पीछे छोड़ते हुए मोरारजी देसाई 24 मार्च 1977 को पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने, परंतु आपसी कलह और नेताओं की महत्‍वाकांक्षा की वजह से पहली गैर कांग्रेसी सरकार ढाई साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाई। सरकार को भारतीय जनसंघ का समर्थन भी था, जो बाद में भाजपा बन गया।

जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई सरकार से समर्थन वापस लेकर कांग्रेस के सहयोग से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बन गये। उनकी सरकार भी छह महीने से ज्‍यादा नहीं चल पाई। जनवरी 1980 में कांग्रेस ने उनसे समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी। जनता पार्टी टूट गई। 1980 के मध्‍यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्‍व में कांग्रेस ने 353 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत हासिल किया।

1977 के बाद तीसरा मोर्चा बनाने का दूसरा प्रयास वीपी सिंह के नेतृत्‍व में सन 1989 में हुआ। जनता दल के नेतृत्‍व में राष्‍ट्रीय मोर्चा बना। जनता दल को 143 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस 197 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। भाजपा एवं अन्‍य दलों के सहयोग से वीपी सिंह राष्‍ट्रीय मोर्चा के बैनर तले 2 दिसंबर 1989 में प्रधानमंत्री बने।

राष्‍ट्रीय मोर्चा का प्रयोग भी असफल रहा। वीपी सिंह एक साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर पाये। बिहार में रामरथ रोके जाने से नाराज 85 सांसदों वाली भाजपा ने नवंबर 1990 में सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, जिससे वीपी सिंह की सरकार गिर गई। राष्‍ट्रीय मोर्चा में टूट हो गई। चंद्रशेखर समाजवादी जनता पार्टी राष्‍ट्रीय के नाम से नया गुट बनाकर अलग हो गये।

कांग्रेस ने 10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर को बाहर से समर्थन देकर सरकार बनवाई, लेकिन यह प्रयोग भी चार माह भी नहीं चल पाया। 6 मार्च 1991 को कांग्रेस ने चंद्रशेखर की पार्टी से अचानक समर्थन वापस ले लिया और उनकी सरकार गिरा दी। मात्र दो साल के अंतराल के बाद ही सन 1991 में ही जनता दल के नेतृत्‍व में बना राष्‍ट्रीय मोर्चा टूट गया।

कई समाजवादी क्षत्रप अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र वाले राज्‍यों में अलग-अलग नामों से दल बनाकर जनता दल से अलग हो गये। गैर-कांग्रेस एवं गैर-भाजपा दलों का मोर्चा बनाने का तीसरा प्रयास 1996 में हुआ। जनता दल के क्षेत्रीय घटक दलों ने आपस में मिलकर संयुक्‍त मोर्चा बनाया, जिसमें वामपंथी दलों को भी शामिल किया गया।

13 पार्टियों के गठबंधन वाले संयुक्‍त मोर्चा ने 129 सीटों पर जीत हासिल की, लेकिन 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण राष्‍ट्रपति ने भाजपा को आमंत्रित किया। भाजपा ने अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्‍व में अपनी पहली सरकार बनाई, लेकिन बहुमत हासिल नहीं होने के चलते यह सरकार 13 दिन में ही धराशायी हो गई।

कांग्रेस के समर्थन से संयुक्‍त मोर्चा ने एचडी देवगौड़ा के नेतृत्‍व में 1 जून 1996 को सरकार बनाई, लेकिन आपसी खींचातान में एक साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही 21 अप्रैल 1997 को देवगौड़ा को हटाकर कांग्रेस ने इंद्र कुमार गुजराल को नया प्रधानमंत्री बनवा दिया। संयुक्‍त मोर्चा की गुजराल सरकार भी एक साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पायी।

कांग्रेस के समर्थन वापस ले लिये जाने के कारण मार्च 1998 में गुजराल सरकार गिर गई। संयुक्‍त मोर्चा बनाने का यह प्रयास भी बहुत सफल नहीं रहा, जिसके चलते मध्‍यावधि चुनाव कराने पड़े। 1998 के बाद से अब तक कांग्रेस नीत यूपीए और भाजपा नीत एनडीए के गठबंधन की ही सरकारें बनती आ रही है।

इस तरह भारतीय राजनीति में तीसरे मोर्चे का इतिहास निराशाजनक ही रहा है। भाजपा या कांग्रेस का सहयोग लिए बिना तीसरा मोर्चा सरकार की देहरी तक कभी नहीं पहुंच पाया है। शायद यही कारण है कि नीतीश कुमार ने तीसरे मोर्चे की कवायद शुरु की तो कांग्रेस के साथ मिलकर आगे बढ़ने की रणनीति बनाई। लेकिन तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष तथा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव इस इतिहास को झुठलाकर तीसरे मोर्चे को आकार देने में जुटे हैं।

पिछले हफ्ते उन्होंने हैदराबाद में जो रैली आयोजित की उसमें केरल के सीएम पी विजयन, पंजाब के सीएम भगवंत मान, दिल्‍ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, सपा अध्‍यक्ष अखिलेश यादव, भाकपा नेता डी राजा शामिल हुए थे। इस रैली को भारत राष्‍ट्र समिति के बैनर तले आयोजित किया गया था जिसे तीसरे मोर्चे को तैयार करने की कवायद माना जा रहा है। हालांकि कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी ममता बनर्जी की टीएमसी इस रैली से नदारद रही।

केसीआर ने रैली के माध्‍यम से एनडीए और भाजपा के खिलाफ राष्‍ट्रीय स्‍तर पर तीसरा मोर्चा बनाने की दिशा में पहला कदम बढ़ा दिया है, लेकिन यह कितना आगे तक जायेगा इसको लेकर संशय लगातार बना रहेगा। वह भी तब, जब टीएमसी, जदयू, राजद, डीएमके, एमडीएमके, एनसीपी जैसे क्षेत्रीय दल केसीआर से दूरी बनाये हुए हैं।

दरअसल, क्षेत्रीय नेताओं में पीएम बनने की महत्‍वांकाक्षा गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी है। यूपी में मुख्‍य विपक्षी दल सपा ने बीते यूपी विधानसभा चुनाव में टीएमसी और ममता बनर्जी से नजदीकी दिखाई थी, लेकिन अब अखिलेश यादव केसीआर के साथ नजर आ रहे हैं।

भाजपा और कांग्रेस विरोध के नाम पर कई वैचारिक ध्रुवों को एक मोर्चे पर साथ लाना आसान नहीं है, लेकिन केसीआर इस सियासी बाधा को पार कर भी लेते हैं तो बड़ा सवाल है कि इस मोर्चे का नेतृत्‍व कौन करेगा? क्‍या केजरीवाल केसीआर के नाम पर तैयार होंगे? टीएमसी, एनसीपी, डीएमके या एआईडीएमके जैसे दलों के शामिल हुए बगैर तीसरे मोर्चे की प्रभावी कल्‍पना संभव है?

ममता बनर्जी कांग्रेस और वामपंथविहीन तीसरे मोर्चे की वकालत करती रही हैं। ममता ने कहा था कि वह हेमंत सोरेन, नीतीश कुमार, अखिलेश यादव एवं अन्‍य क्षेत्रीय दलों के सहयोग से भाजपा की सौ सीटें घटाने का प्रयास करेंगी, लेकिन नये समीकरण के लिहाज से अखिलेश केसीआर के साथ नजर आ रहे हैं।

साफ है तीसरे मोर्चे के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है छोटे दलों का अपना राजनीतिक स्वार्थ और पूर्वाग्रह। बड़े दलों के खिलाफ वो एकजुट तो होते हैं लेकिन उनके निजी हित आपस में इतनी तेजी से टकराते हैं कि थोड़े ही समय वो सब अलग अलग हो जाते हैं। इसलिए इस बार भी तीसरे मोर्चे का मार्ग कठिन ही लग रहा है।

यह भी पढ़ें: Pasmanda Muslims: भाजपा की नजर क्यों हैं पसमांदा मुसलमानों पर?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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