IFFI Controversy: लेफ्टिस्ट लेपिड को आमंत्रित करने के पीछे किसका हाथ?
यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि नदाव लेपिड को ज्यूरी अध्यक्ष के रूप में बुलाने का फैसला करने वालों में कौन कौन शामिल थे, जो उस भारत विरोधी लॉबी के साथ मिला हुए थे, और भारत सरकार को बदनाम करना चाहते थे।

IFFI Controversy: हाल ही में गोवा में सम्पन्न हुए इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल इंडिया (IFFI 2022) ने किसान आन्दोलन के समय की टूलकिट की याद ताज़ा कर दी। ज्यूरी के अध्यक्ष नदाव लेपिड की कश्मीर फाइल्स पर अपमानजनक टिप्पणी ने देश में नया बवाल खड़ा कर दिया है।

इजराइल मूल के स्क्रिप्ट राईटर लेपिड अब इजराइल में नहीं रहते, वह ज्यादातर फ्रांस में रहते हैं, क्योंकि इजराइल में उन्हें राष्ट्रविरोधी और फिलिस्तीन समर्थक माना जाता है। उनकी एक फ़िलिस्तीन समर्थक फिल्म "अहेड्स नी" से भी जाहिर हो जाता है कि मानवाधिकारों के नाम पर वह फिलिस्तीन समर्थक हैं।
लेपिड फिल्म फेस्टिवल ज्यूरी के उन चार सदस्यों में से एक थे, जिन्हें कलात्मक पक्ष के विशेषज्ञ के तौर पर बुलाया गया था। आप को यह जानकर हैरानी होगी कि ज्यूरी में जिन चार सदस्यों को बुलाया गया था, उनमें लेपिड समेत तीन सदस्य फ्रांस से आए थे।
इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में एक ही देश से तीन सदस्यों को बुलाया जाना भी कई तरह के संदेह पैदा करता है कि कहीं यह भी किसान आन्दोलन के समय भारत को बदनाम करने वाली टूल किट जैसा ही षड्यंत्र तो नहीं था। तब भारत विरोधी तत्वों ने ग्रेटा थनबर्ग का इस्तेमाल किया था। अब भारत विरोधी तत्वों ने लेपिड का इस्तेमाल किया है। तब ग्रेटा के ट्विट के तुरंत बाद जिस तरह भारत विरोधी लॉबी ने सोशल मीडिया पर अभियान चलाया था, ठीक उसी तरह कश्मीर फाईल्स का विरोध करने वाली लॉबी ने लेपिड के भाषण के तुरंत बाद ट्विटर पर कश्मीर फाईल्स के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया।
इसलिए अब बड़ा सवाल यह है कि लेपिड को ज्यूरी अध्यक्ष के रूप में बुलाने का फैसला करने वालों में कौन कौन शामिल था, जो इस भारत विरोधी लॉबी के साथ मिला हुआ था। लेपिड का काम फेस्टिवल में दिखाई गई 15 फिल्मों की कलात्मक योग्यता का आकलन करना था। लेकिन फिल्म फेस्टिवल के समापन भाषण में उन्होंने कश्मीर फाईल्स के कलात्मक पक्ष पर टिप्पणी करने की बजाए यह कह कर राजनीतिक टिप्पणी कर दी कि फिल्म बेहूदा है और प्रोपेगंडा के लिए बनाई गई है। उनका यह काम ही नहीं था कि वह फेस्टिवल में दिखाई गई किसी एक फिल्म पर राजनीतिक टिप्पणी करे।
लेपिड की टिप्पणी के कुछ सैकिंड के अंदर वे लोग सोशल मीडिया पर फिर से सक्रिय हो गए, जिन्होंने पहले भी कश्मीर फाईल्स के खिलाफ अभियान चलाया था। इसीलिए टूलकिट की याद ताज़ा हुई, क्योंकि उस वक्त की टूलकिट में लिखा गया था कि ग्रेटा थनबर्ग के ट्विट के बाद सोशल मीडिया पर किस तरह अभियान चलाना है। यह याद करना कोई मुश्किल काम नहीं कि जब द कश्मीर फाईल्स फिल्म रिलीज हुई थी तो भारत के भीतर वे कौन लोग थे जिन्होंने कश्मीर फाईल्स को झूठ कहा था।
फिल्म फेस्टिवल के समापन समारोह में लेपिड के भाषण पर देश भर में प्रतिक्रियाओं की सुनामी आ गई है। कश्मीरी पंडित तो सडकों पर आए ही हैं, क्योंकि द कश्मीर फाईल्स उनकी आपबीती पर आधारित फिल्म है। देश भर में हिन्दू संगठन भी सड़कों पर उतर कर लेपिड का विरोध कर रहे हैं। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि लेपिड ने फिल्म की सत्यता पर सवाल उठाया है, जो उनका काम ही नहीं था। भारत में पहले ही एक वामपंथी लॉबी फिल्म की सत्यता पर सवाल उठाती रही है।
लेपिड ने खुद को उस लॉबी के साथ जोड़ कर खुद को बेनकाब कर लिया कि उनकी प्रतिक्रिया सुनियोजित एवं प्रायोजित थी। समापन समारोह के दो दिन बाद एक प्रेस कांफ्रेंस करके उन्होंने कश्मीर फाईल्स की मुखालफत के प्रायोजित एजेंडे को आगे बढाया, जब उन्होंने कश्मीर फाईल्स फिल्म को बढावा देने के लिए भारत सरकार की आलोचना की। भारत की लेफ्टिस्ट लॉबी भी कश्मीर फाईल्स को बढावा देने के लिए मोदी सरकार की आलोचना करती रही है। मोदी सरकार के घोर विरोधी आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी कश्मीर फाईल्स को झूठ कहा था। उन्होंने दिल्ली विधानसभा में कश्मीर फाईल्स की खिल्ली उड़ाते हुए यहाँ तक कहा था कि भाजपा फिल्म के प्रोपेगंडा में लगी है। अब वही शब्द लेपिड ने इस्तेमाल किए हैं।
कोई भी व्यक्ति विकिपीडिया पर जाकर लेपिड के विचारों को पढ़ सकता है। वह कश्मीरी मुसलमानों की तरह फिलिस्तीन समर्थक और अपनी ही इजराइली सरकार का विरोधी रहा है। अगर वह भारत में रह रहा होता, तो उसकी पहचान निश्चित रूप से टुकड़े टुकड़े गैंग और खान मार्केट गैंग के सदस्य के रूप में होती। उसकी पहचान स्वरा भास्कर के पुरुष रूप के तौर पर की जाती, जिसने सब से पहले लेपिड के भाषण पर ट्विट किया। फिर सवाल पैदा होता है कि लेपिड को ज्यूरी का सदस्य और अध्यक्ष बनाने का फैसला किसने और किसके कहने पर किया। उनका इतिहास क्यों नहीं जांचा गया।
राजनीतिक तौर पर इसके लिए सूचना प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं, उनकी अंतिम सहमति के बिना वामपंथी विचारधारा के लेपिड को नहीं बुलाया जा सकता था। सूचना प्रसारण मंत्रालय के कुछ अधिकारी भी इस फैसले के लिए निश्चित रूप से जिम्मेदार होंगे। फिल्म फेस्टिवल डायरेक्टर रविन्द्र भाकर तो सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं ही। वह सी.बी.एफ.सी और एन.एफ.डी.सी के भी प्रमुख हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को बदनाम करने का टूल बनने के लिए सभी जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
फिल्म फेस्टिवल की तैयारियों में जुटे करण जौहर, खुशबू सुंदर, प्रसून जोशी, प्रियदर्शन और शूजीत सरकार को भी लैपिड को आमंत्रित करने की जिम्मेदारी लेनी होगी। यह एक गंभीर मामला है, क्योंकि लेपिड ने सिर्फ फिल्म पर राजनीतिक टिप्पणी नहीं की है, बल्कि भारत सरकार पर भी टिप्पणी की है। मोदी सरकार को निष्पक्ष जांच करवानी चाहिए कि भारत को बदनाम पर करने के लिए भारत की लेफ्टिस्ट लॉबी से जुड़े लेपिड को आमंत्रित करने का प्रस्ताव किसने किया था, और उसके बाद किस किस ने समर्थन किया था।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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