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Red Sea: समुद्री लुटेरों के बाद हूतियों का बढ़ता आतंक भारतीय व्यापार के लिए खतरा

Red Sea: सोमवार 15 जनवरी को भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने तेहरान के विदेश मंत्री एच अमीरब्दुल्ला से मुलाकात की। यह मुलाकात हूतियों द्वारा लाल सागर में भारत की ओर आनेवाले मालवाहक जहाजों को निशाना बनाने को लेकर थी।

पिछले दो महीनों में दो दर्जन से ज्‍यादा व्‍यापारिक जहाजों को ऐसे हमलों का सामना करना पड़ा है। अमेरिका का दावा है कि इन सभी हमलों के पीछे यमन के हूती आतंकियों का ही हाथ है।

terror of Houthis After pirates in Red Sea is a threat to Indian trade

तेहरान में हुई इस मुलाकात से उम्मीद की जानी चाहिए कि मालवाहक जहाजों पर हूती आतंकियों के हमले रुकेंगे। परोक्ष रूप से यमन में हूतियों पर ईरान का ही नियंत्रण हैं और समझा जाता है कि ईरान के दखल देने के बाद यमन में सक्रिय हूती लाल सागर में अपनी आतंकी गतिविधियों पर लगाम लगाएंगे। क्योंकि बीते साल दिसंबर के आखिरी हफ्ते में जहाज एमवी साईंबाबा पर आतंकियों द्वारा ड्रोन से हमले की घटना ने इस समस्‍या को बहुत गहरा दिया है। इस घटना के कुछ ही घंटे पहले एक और जहाज एमवी चेम प्‍लूटो पर हवाई हमला हुआ था, जिसकी वजह से उसमें आग लग गई थी।

अभी तक व्‍यापारिक जहाजों पर हमलों को, हाईजैकिंग कर फिरौती वसूलने का इरादा रखने वाले सोमालियाई समुद्री लुटेरों से जोड़कर देखा जाता रहा है। लेकिन, ये घटनाएं काफी अलग मिजाज की है। इनकी तपिश भारत में भी शिद्दत से महसूस की गई। क्‍योंकि चेम प्‍लूटो हादसे के वक्‍त गुजरात तट के आसपास था, जबकि साईंबाबा तेल टैंकर पर दक्षि‍णी लाल सागर में भारत की ओर आते हुए हमला हुआ। पहले तो अमेरिकी नौसेना की सेंट्रल कमांड के हवाले से यह भी कहा गया था कि साईंबाबा एक भारतीय जहाज है।

लेकिन, बाद में पता चला कि उस पर अफ्रीकी देश गैबॉन का फ्लैग लगा था। इसके क्रू में 25 भारतीय शामिल थे। जाहिर है कि भारत तटस्‍थ नहीं रह सकता था। इन घटनाओं के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ऐलान किया कि भारत हमलावरों को पाताल से भी खोज नि‍कालेगा। और फिर नौसेना ने आनन-फानन में अपने चार फ्रंट लाइन गाइडेड मिसाइल डिस्‍ट्रॉयर वॉरशिप अरब सागर में उतार दिए।

इस चुस्‍ती का फायदा भी तुरंत देखने को मिला। कुछ ही दिन बीते थे कि अरब सागर में सोमालियाई समुद्री डाकुओं ने एमवी लीला नोरफॉक को हाईजैक करने की कोशिश की, जिसे आईएनएस चेन्‍नई के मैरीन कमांडो दस्‍ते मारकोस ने समय रहते नाकाम कर दिया और 15 भारतीयों समेत 21 सदस्‍यीय क्रू को सुरक्षित निकालने में सफलता हासिल की। इसके बाद भारत ने दो और वॉरशिप समुद्र में उतार दिए हैं, ताकि इस क्षेत्र के समुद्री मार्ग को आवागमन के लिए सुरक्षित बनाया जा सके और जहाजों को ड्रोन हमलों से बचाया जा सके।

सामरिक दृष्टि से भारत के लिए इसका बहुत महत्‍व है। क्‍योंकि चीन, लाल सागर में पिछले कई सालों से अपना प्रभुत्‍व बढ़ाने की कोशिशों में लगा है। हालिया घटनाओं के बाद इस क्षेत्र को सुरक्षा प्रदान करने के नाम पर वह यहॉं भी अपने जहाज तैनात कर सकता था। लेकिन, भारत ने तुरंत यह कदम उठाकर उससे यह अवसर छीन लिया है और अरब सागर के इस क्षेत्र के नेट सिक्‍युरिटी प्रोवाइडर के रूप में इसे सुरक्षित रखने की जिम्‍मेदारी लेकर एक सागरीय महा‍शक्ति कहलाने का अधिकारी हो गया है।

अगर हम व्‍यापारिक दृष्टिकोण से सोचें तो हमें ऐसा लग सकता है कि भारत को यह सब करने की बहुत ज्‍यादा आवश्‍यकता नहीं होनी चाहिए। समुद्री कारोबार को अंजाम दे रहे वाणिज्यिक जहाजों में भारतीय जहाजों की भागीदारी करीब आठ फीसदी के आस-पास ही है। जबकि, तीन दशक पहले यह 40 फीसदी से भी अधिक थी। पचास व्‍यस्‍ततम बंदरगाहों में भारतीय बंदरगाहों की संख्‍या भी सिर्फ दो ही है।

इसके बावजूद भारत हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता। क्‍योंकि, भले ही इस रूट पर चलने वाले उसके जहाज कम हों, लेकिन कारोबार कम नहीं है। भारत के कुल व्‍यापार का 95% वॉल्‍यूम, मूल्‍य की दृष्टि से 68%, समुद्री मार्गों पर ही निर्भर है। यह सुचारू रूप से चलता रहे, इसके लिए आवश्‍यक है कि अरब सागर और लाल सागर के बीच के इस 3200 किमी लंबे समुद्री मार्ग पर चलने वाले जहाजों को समुचित सुरक्षा प्रदान की जा सके।

इस रूट से आने वाले जहाजों का सत्तर प्रतिशत व्‍यापार भारत से संबंधित है। इसे सुगम बनाने के लिए वर्ष 2008 के बाद से भारत इस क्षेत्र में 110 वॉरशिप तैनात कर चुका है, जो निगरानी और हिफाजत, दोनों का काम बहुत मुस्‍तैदी के साथ कर रहे हैं और पूर्वी अरब सागर में समुद्री डाकुओं के हमलों के प्रसार को रोके हुए हैं।

लेकिन लाल सागर संकट के चलते जहाज कंपनियों ने अपना रास्‍ता बदल लिया है। इसी का नतीजा है कि सिर्फ आठ फीसदी कारोबार ही इस रूट के जरिए हो पा रहा है। बाकी का 92% केप ऑफ गुड होप रूट के जरिए हो रहा है, जो अपेक्षाकृत बहुत ज्‍यादा लंबा है। इसे तय करने में जहाजों को करीब दो हफ्ते ज्‍यादा यात्रा करनी पड़ती है, जिससे परिवहन की लागत बढ़ती है।

साथ ही लाल सागर के संकट के चलते मद्देनजर इंश्‍योरेंस प्रीमियम की दरें भी बहुत बढ़ चुकी हैं। इस सबसे माल की कीमतें बढ़ना लाजिमी ही है। वाणिज्‍य मंत्रालय का अनुमान है कि अगर लाल सागर का संकट लंबा खिंचता है तो भारत के निर्यात में तीस अरब डॉलर का नुकसान हो सकता है।

यह संकट और न बढ़े, इसके लिए भारत के हक में है कि इसे जल्‍दी से जल्‍दी सुलझाया जा सके। इसीलिए वह इन घटनाओं के बाद अमेरिका के नेतृत्‍व वाले बीस देशों के साझा ऑपरेशन गार्डियन में शामिल न होते हुए भी परोक्ष रूप से इसका समर्थन कर रहा है। इसके अलावा तेहरान में हुई मुलाकात के भी सकारात्मक परिणाम आने के आसार हैं।

भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के हित में है कि लाल सागर संकट और ज्‍यादा न गहराए, क्‍योंकि अमेरिका ने हालिया हमलों के बाद हूतियों के खिलाफ जो आक्रामक रुख अपनाया है, उससे उन्‍हें समर्थन दे रहे ईरान के हस्‍तक्षेप का खतरा पैदा हो गया है। ऐसे में पश्चिम एशिया में एक क्षेत्रीय युद्ध की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। इससे ग्‍लोबल जीडीपी में समुद्र की 16% हिस्‍सेदारी पर ऑंच आ सकती है।

समुद्री कानूनों को लेकर संयुक्‍त राष्‍ट्र का 1982 में अपनाया गया एक समझौता (अनलॉक्‍स) है, जिस पर 150 से ज्‍यादा देशों ने हस्‍ताक्षर किए थे। इसे महासागरीय संविधान का दर्जा प्राप्‍त है और यह समुद्री मार्गों को जहाजों के लिए मुक्‍त व सुरक्षित बनाने बनाने पर जोर देता है। वर्तमान दौर में यह बहुत आवश्‍यक है कि सभी संबंधित देश अपने राजनीतिक स्‍वार्थों से ऊपर उठकर, इसके लक्ष्‍यों की प्राप्ति के लिए एक-दूसरे के साथ सहयोग करें।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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