Two Finger Test: अवैज्ञानिक भी और अवैधानिक भी, फिर भी क्यों जारी है टू फिंगर टेस्ट?
Two finger test: हमारे देश में दुष्कर्म पीड़िता के विरुद्ध अपराध को प्रमाणित करते के लिये जॉंच एजेंसियों द्वारा अक्सर टू फिंगर टेस्ट किया जाता है। हालांकि यह पिछले करीब एक दशक से प्रतिबंधित है, फिर भी जागरूकता और जानकारी के अभाव में यह अभी भी प्रचलन में है।

पुलिस या जॉंच एजेंसियॉं तो दूर, बहुत सी अदालतें भी इस प्रतिबंध को लेकर बहुत अधिक गंभीर नजर नहीं आतीं। जिस मामले की वजह से यह मुद्दा फिर से सुर्खियों में आया है, वह झारखंड का है।
राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा बलात्कार के एक आरोपी को इसी आधार पर बरी कर दिया गया कि पुलिस ने पीड़िता का टू फिंगर टेस्ट नहीं कराया था। जबकि, वास्तविकता तो यह है कि सर्वोच्च न्यायालय 2013 में ही इस टेस्ट के विरुद्ध दिशा-निर्देश दे चुका है। उसने साफ-साफ कहा था कि टू फिंगर टेस्ट पीड़िता की निजता, शारीरिक और मानसिक अखंडता और गरिमा के अधिकार का उल्लंघन करता है।
इसके बाद 2014 में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस परीक्षण को लेकर विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये थे। इनमें इसे गैरजरूरी बताया गया था और कहा गया था कि इसे यौन हिंसा के मामलों के प्रमाणीकरण का आधार नहीं बनाया जाना चाहिये। इन दिशानिर्देशों में परीक्षण करने वाले डॉक्टरों की, दुष्कर्म पीड़िता के लिए 'पुरुष संसर्ग की आदी' या 'यौन संबंधों का अनुभव' जैसी टिप्पणियों पर भी रोक लगायी गयी थी।
2020 में गुजरात उच्च न्यायालय और इसी साल 21 अप्रैल को मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच द्वारा भी इसके निरंतर उपयोग की निंदा की जा चुकी है। इसके बावजूद अनेक राज्यों ने इन दिशानिर्देशों को लागू करने में कभी गंभीरता नहीं दिखायी।
अभी भी पुलिस दुष्कर्म के मामलों में पीड़िता का टू फिंगर टेस्ट कराती है। वकीलों द्वारा टेस्ट पॉजिटिव आने पर पीड़िता को दुष्चरित्र साबित कर, अपराधी को बचाने की कोशिश की जाती है। जबकि टेस्ट का पॉजिटिव होना, यह कतई साबित नहीं करता कि पीड़िता के साथ बलात्कार नहीं किया गया है।
कोर्ट के सख्त तेवर
अब एक बार फिर देश के सुप्रीम कोर्ट द्वारा टू फिंगर टेस्ट की निरूपयोगिता और निर्दयता को रेखांकित किया गया है। इस बार कोर्ट ने काफी सख्त तेवर अपनाये हैं। अभी भी टेस्ट जारी रहने पर नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पीड़ित महिला की गवाही ही आरोपी के अपराध को साबित करने के लिए पर्याप्त है। टू फिंगर टेस्ट घिनौना भी है और अवैज्ञानिक भी।
बल्कि यह यौन हिंसा की शिकार महिला को फिर से एक मानसिक यंत्रणा से गुजरने के लिए विवश करता है। कोर्ट ने कहा है कि यह धारणा गलत है कि सेक्सुअली एक्टिव महिला के साथ दुष्कर्म नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों, उनके डीजीपी और केंद्र सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय को यह सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिये हैं कि आगे किसी भी पीड़िता का टू फिंगर टेस्ट न किया जाये। कोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अब अगर कोई व्यक्ति टू फिंगर टेस्ट करता है या करवाता है तो उसे कदाचार का दोषी मना जायेगा।
यही नहीं, अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों को इस बेहद अपमानजनक, इनवेसिव टू-फिंगर टेस्ट परीक्षण को मेडिकल पाठ्यक्रम से हटाने का भी आदेश दिया है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में महाराष्ट्र की यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेज ने 'फोरेंसिक मेडिसिन एंड टॉक्सिकोलॉजी' के लिए कोर्स में बदलाव करते हुए 'साइन्स ऑफ वर्जिनिटी' के टॉपिक को हटा दिया है।
क्या होता है, टू फिंगर टेस्ट?
टू-फिंगर टेस्ट को पहले वर्जिनिटी टेस्ट भी कहा जाता था। इस परीक्षण में दुष्कर्म पीड़िता के निजी अंग में दो अंगुलियां प्रविष्ट कर चिकित्सक पता लगाते हैं कि क्या वह पहले से यौन संबंधों की आदी है।
इसमें पीड़िता के जननांग की मांसपेशियों के लचीलेपन और हाइमन की जांच होती है। अगर हाइमन अक्षुण होता है तो यह माना जाता है कि उसके साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाये गये हैं। अगर हाइमन को नुकसान पहुँचा होता है तो उस महिला को यौन संबंधों में सक्रिय माना जाता है।
सार्वजनिक रूप से यह टर्म पहली बार 1979 में यूनाइटेड किंगडम में सामने आया था। उस समय अपने मंगेतरों से शादी के लिए यूके आने वाली महिलाओं को एक प्रोटोकॉल का पालन करना पड़ता था। इसमें उनकी मेडिकल जॉंच की जाती थी।
24 जनवरी 1979 को एक 35 वर्षीय भारतीय महिला ने इसके खिलाफ आवाज उठायी। वह अपने भारतीय मूल के ब्रिटिश मंगेतर से तीन महीने के अंदर विवाह करके वहीं सेटल होने आयी थी। लंदन हवाई अड्डे पर उसका गहन चिकित्सकीय परीक्षण किया गया, क्योंकि इमीग्रेशन अधिकारी को शक था कि वह इतनी उम्र में भी अविवाहित कैसे हो सकती है।
इस घटना के एक सप्ताह बाद, लंदन के प्रसिद्ध अखबारों ने खुलासा किया कि चिकित्सकीय जांच के बहाने महिलाओं का वर्जिनिटी टेस्ट किया जाता है, जिसे टू फिंगर टेस्ट भी कहा गया। इसके बाद ऐसा करने वाले इमीग्रेशन अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश दिये गये।
कई देशों में बैन है यह टेस्ट
विश्व स्वास्थ्य संगठन काफी पहले टू फिंगर टेस्ट को अनैतिक और अनुपयोगी बता चुका है। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक इसकी वजह से पीड़िता फिर से अपमान और दर्द से गुजरती है। यह उसके मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है।
भारत में 2013 के बहुचर्चित निर्भया मामले के बाद इस पर रोक लगायी गयी थी। इसके अलावा, इंडोनेशिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान जैसे देशों में भी यह टेस्ट प्रतिबंधित है।
दिशा-निर्देशों की निरंतर अनदेखी
ध्यान देने योग्य है कि 2013 में यौन उत्पीड़न कानून संशोधनों में कहा गया था कि स्त्री जननांग में पुरुष जननेंद्रिय ही नहीं, बल्कि किसी भी चीज के जबरन प्रवेश को बलात्कार माना जाना चाहिए। इसके बावजूद इस क्षेत्र में कार्य करने वाले डॉक्टर इससे अनभिज्ञ हैं और टू फिंगर टेस्ट में लिप्त रहते हैं।
मार्च 2014 में दुष्कर्म पीड़िताओं से संबंधित केंद्र सरकार के दिशानिर्देशों में दुष्कर्म मामलों की जॉंच में सहयोग देने वाले चिकित्साकर्मियों के लिए समग्र प्रशिक्षण और सेफ (सेक्सुअल असॉल्ट फॉरेंसिक एविडेंस) किट के माध्यम से जॉंच की एक समान पद्धति अपनाने पर भी जोर दिया गया था। लेकिन, इस बात पर ध्यान देने की जरूरत कभी महसूस नहीं की गयी कि जमीनी स्तर पर इन दिशानिर्देशों का कितना पालन किया जा रहा है।
इससे यही समझा जा सकता है कि टू फिंगर टेस्ट को हतोत्साहित करने के लिए सिर्फ प्रतिबंध पर्याप्त नहीं है। बल्कि इसे रोकने के लिए एक ऐसा केंद्रीय कानून बनाया जाना आवश्यक है, जो इस तरह के परीक्षण को अपराध घोषित करे। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला इस दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
यह भी पढ़ें: क्या है 'टू-फिंगर टेस्ट' जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाया बैन?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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