Movie on Sukesh: क्या फिर से ठगों के महिमामंडन की कहानी दोहराई जाएगी?
बॉलीवुड में एक परिपाटी बन गयी है जहां ठग, अपराधी, माफिया डॉन पर मूवी बनाकर उन्हें महिमामंडित किया जाता है। इसमें ताजा नाम ठग सुकेश चंद्रशेखर का जुड़ गया है जिस पर मूवी बनाने की तैयारी हो रही है।

बात 2017 की है जब शाहरुख खान की फिल्म 'रईस' आने वाली थी। अचानक आरोप लगने शुरू हो गए कि ये मूवी गुजरात के गैंगस्टर अब्दुल लतीफ के बेटों के पैसे से बन रही है क्योंकि मूवी में उसको ग्लेमराइज किया जाएगा। जबकि उससे पहले लतीफ के बेटों ने उस पर सवाल उठा दिए कि कहीं उनके पिता की इमेज को गलत तरीके से तो नहीं दिखाएंगे शाहरुख। इस पूरे मुद्दे पर शाहरुख खान और निर्देशक राहुल ढोलकिया कन्नी ही काटते रहे, क्योंकि फिल्म के निर्माताओं में गौरी खान, फरहान अख्तर और रीतेश सिद्धवानी का नाम था।
हालांकि फिल्म जब रिलीज हुई तो अब्दुल लतीफ कम से कम अपनी कौम में तो हीरो बन ही चुके थे। गली गली में बच्चों की जुबान पर चढ़ चुका था, 'कोई भी धंधा छोटा नहीं होता'। अब बारी है कॉनमेन सुकेश चंद्रशेखर की जिंदगी पर बन रही एक मूवी या वेबसीरीज की। इसे बना रहे हैं निर्देशक आनंद कुमार।
आनंद कुमार इसे बायोपिक मानने से बच रहे हैं। कह रहे हैं चंद्रशेखर के ठगी के जो तौर तरीके थे, उसका जो काम करने का स्टाइल था मूवी में उस पर फोकस होगा। कैसे वह किसी भी ठगी पर कम से कम एक साल पहले प्लान बनाकर काम करना शुरू करता था। कैसे उसे 12 भाषाएं आती थीं और इस खूबी का कैसे इस्तेमाल करता था। कैसे उसने फिल्मी हीरोइनों को इश्क के जाल में फंसाने से लेकर नेताओं व अधिकारियों तक को अपने जाल में फंसाया था। मूवी में इन्हीं बातों पर फोकस होगा, लेकिन उसका महिमामंडन नहीं होगा।
इस मूवी पर उनका काम 6 महीने पहले ही शुरू हो गया है, इस केस में तिहाड़ जेल के अधिकारियों से उनका मिलना हो रहा है। वो अभी रिसर्च मे ही जुटे हुए हैं ताकि सुकेश चंद्रशेखर का वो चेहरा सामने रख सकें, जो अभी तक सामने नहीं आया है। इसके लिए वो उसकी पूरी जन्मपत्री, उसके दोस्त, उसके दुश्मन, उससे जुड़ा हर शहर, हर शख्स, हर केस खंगालने में लगे हुए हैं। लेकिन वो ये नहीं मानते कि सुकेश का इसमें कोई रोल है या सुकेश स्वयं ये महिमामंडन करवा रहा है। बिलकुल वैसे ही जैसे कभी राहुल ढोलकिया या शाहरुख खान ने नहीं माना था।
आनंद के मुताबिक सुकेश की जिंदगी पर बन रही फिल्म या वेबसीरीज से ये सच भी सामने आएगा कि कैसे सुकेश ने रैनबैक्सी के मालिक शिविन्दर मोहन सिंह की पत्नी अदिति सिंह से 200 करोड़ की ठगी की थी। कैसे उसने मद्रास कैफे की हीरोइन मारिया पॉल से शादी की थी और कैसे उसने जैकलीन फर्नांडीज को अपने इश्क के जाल में फंसाया।
ये सच है कि आम लोगों को गैंगस्टर्स, माफिया, डॉन, डाकू आदि खलनायकों की जिंदगी पर बनी फिल्में देखना अच्छा लगता है। लेकिन ये काम उन्हें ग्लेमराइज किए बिना भी तो हो सकता है। पचासों फिल्में पिछले दो तीन दशक में बनीं, डॉन से लेकर 'दयावान' तक, 'सत्या' से लेकर 'कंपनी' तक, 'वास्तव' से लेकर 'मकबूल' तक, 'शूट आउट एट लोखंडवाला' से लेकर 'वंस अपॉन ए टाइम' तक, गंगाजल से लेकर अपहरण तक और 'रईस' से लेकर 'रंगबाज' सीरीज तक। किसी में हाजी मस्तान को महानायक की तरह पेश किया गया तो किसी में वरदराजन मुदलियार को तो किसी में दाऊद इब्राहिम को तो किसी में शहाबुद्दीन को। भले ही मूवी के आखिर में इन सबको मरते ही दिखाया गया, लेकिन वो स्टाइल में ही मरे। उनको कहीं भी डरते या गिड़गिड़ाते हुए नहीं दिखाया गया और ना ही जान की भीख मांगते हुए, जिससे बच्चों को ये मैसेज जाये कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है।
उलटा होता ये है कि ऐसे अपराधियों के लिए ऐसे ऐसे मारक डायलॉग लिखवाए जाते हैं कि बच्चों और युवाओं की जुबान पर चढ़ जाते हैं। उनके कपड़े पहनने, उनके बात करने, चश्मा पहनने, गाड़ियों को ड्राइव करने, सिगरेट-शराब आदि पीने का तरीका इतना ग्लैमरस होता है कि हर गली में लड़के 'सलाम रॉकी भाई' पर थिरक रहे होते हैं और उसी की तरह बनना चाहते हैं।
भारत की फिल्म इंडस्ट्री में खासतौर पर मुंबईया फिल्मों में दशकों से ब्लैक मनी तो चल ही रहा था, कोई भी स्टार साइनिंग एमाउंट को पूरा शो नहीं करता। 70 के दशक में तो साइनिंग अमाउंट सोने के सिक्कों में लिया जाता था, जो किसी भी टैक्स पेपर में दर्ज तक नहीं होता था। डिस्ट्रीब्यूटर और प्रोडयूसर के बीच भी कुछ इसी तरह का लेन देन होता था। आपसी कांट्रेक्ट की कई शर्तें कागज पर लिखी ही नहीं जाती थीं। सालों तक सरकारें इनसे निपटने के लिए नए कानून लाती रही और उसके तोड़ भी ढूंढे जाते रहे।
जब इतना गोलमाल फिल्मों में होने लगा तो इसमें राजनीतिक पार्टियों के गुर्गों से लेकर अंडरवर्ल्ड के लोग भी कूदे। सबको अपना हिस्सा चाहिए था और सबको अपना ब्लैक मनी यहां निवेश करना था। मशहूर सितारों के साथ तस्वीरें खिंचवाने और उन्हें अपनी पार्टियों में बुलाकर लोगों पर धाक जमाने का भी मौका था। एक दौर आया कि दाऊद इब्राहिम की दुबई की पार्टियों में कौन नहीं गया, उसको ढूंढा जाने लगा।
वो अपनी फिल्मों में दिखाते थे कि कैसे विलेन की पार्टी में वेश बदलकर जाते थे और विलेन का काम तमाम कर देते थे, लेकिन हकीकत में सब गब्बर की पार्टी में 'महबूबा' गाने पर नाचने गाने वाले हेलन और जलाल बन गए थे। कोई नहीं सुनता था तो उसके ऑफिस में गोली चलवा दी जाती थी। संजय दत्त को कैसे धमकाकर इस्तेमाल किया गया, पूरा देश जानता है। उसके बाद गुलशन कुमार की हत्या, मोनिका बेदी का अबू सलेम के हुकुम पर हीरोइन बनना, कई फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूशन राइट्स बेचना, स्टार्स के विदेश के शोज में भी अंडरवर्ल्ड का दखल, मंदाकिनी जैसे तमाम अनसुलझे किस्सों का सामने आना, ये बताता है कि फिल्मी दुनियां में काफी गोरखधंधे हैं। तमाम ब्लैक मनी यहां सफेद होता आया है और तमाम ब्लैक चेहरे यहां स्टाइलिश रूप से हीरो बनते आए हैं।
ताजा मामला सुकेश चंद्रशेखर का है, जिसके गाल पर किस करते सलमान की हीरोइन जैकलीन फर्नाडींज को देखकर पूरा देश चौंक गया था। हर युवा समझ गया था कि ये बड़ी बाली चीज है। जब उसने केजरीवाल को लेकर आरोप लगाए तो बहुतों को लगा कि इनमें कुछ ना कुछ तो सच्चाई जरूर होगी। ऐसे में जिला गाजियाबाद और कट्टे जैसी अंडरवर्ल्ड की चर्चित फिल्में बना चुके डायरेक्टर आनंद कुमार अचानक इतनी शिद्दत से सुकेश चंद्रशेखर पर मूवी प्रोजेक्ट में जुट जाते हैं तो शक होता है। आखिर जिस पैसे से सुकेश ने जैकलीन और नोरा फतेही जैसी हीरोइन्स को अपने जाल में फंसा लिया, तिहाड़ जेल के इतने बड़े स्टाफ को वो पैसे दे रहा था तो फिर उसके लिए अपने ऊपर मूवी बनवाना कितना मुश्किल काम है? सच्चाई पता नहीं कभी सामने आएगी या नहीं लेकिन सुकेश का उसी तरह हीरो बनना तय मानिए जैसे 'रईस' के बाद अब्दुल लतीफ अपनी कौम में बन गया।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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