Stubble Burning: दिल्ली के वायु प्रदूषण की समस्या का क्या है समाधान?
दिल्ली और लाहौर दोनों अब दो अलग अलग देशों के शहर भले बन गये हों लेकिन दोनों शहरों में बहुत कुछ साझा है। दिल्ली के लालकिले में लाहौरी गेट है तो लाहौर के शाही किले में दिल्ली गेट। दिल्ली में शाहदरा है तो लाहौर में भी शाहदरा है। दिल्ली में लक्ष्मी नगर है तो लाहौर में लक्ष्मी चौक। दिल्ली में सदर है तो लाहौर में भी सदर है। दिल्ली में पुरानी दिल्ली है तो लाहौर में भी पुराना लाहौर। यानी दोनों शहरों में इतना कुछ कॉमन है कि आप उन्हें सिस्टर सिटी कह सकते हैं।
लेकिन बीते कुछ सालों से दोनों ही शहरों में एक बात और साझी हो गयी है। दोनों शहर भीषण वायु प्रदूषण की मार झेल रहे हैं। खासकर सर्दियों के शुरु होने के समय में दोनों शहर धुएं के गुबार से दब जाते हैं और यहां रहनेवालों के लिए सांस लेना कठिन हो जाता है। हालांकि लाहौर की जनसंख्या न दिल्ली जितनी है और न ही दिल्ली की तरह 80 लाख वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। लाहौर में कोई पटाखों वाली दिवाली भी नहीं मनायी जाती तो फिर दिल्ली जितना वायु प्रदूषण लाहौर में कहां से हो जाता है?

दोनों ही शहरों को धुएं के गुबार में दबाते हैं दोनों तरफ के पंजाब के किसान। बंटवारे के बाद दो हिस्सों में बंट चुके पंजाब में इधर भी और उधर भी अक्टूबर-नवंबर का महीना धान की कटाई का हो गया है। जब तक कृषि तकनीकों का विकास नहीं हुआ था तब तक सबकुछ इतना खराब नहीं था। पंजाब में धान की खेती का कोई चलन भी नहीं रहा है कभी। इस इलाके के लोग चावल न के बराबर खाते हैं इसलिए उसे उगाते भी नहीं थे। लेकिन हरित क्रांति की सफलता के बाद इधर वाले पंजाब के किसानों को जब गेंहू की फसल की अच्छी सरकारी कीमत मिलने लगी तो उन्होंने और अधिक लाभ के लिए धान की खेती पर हाथ आजमाने की शुरुआत किया।
इसका परिणाम हुआ अत्यधिक भूजल दोहन और सूखे का आसन्न संकट। जब सिर्फ पैसा कमाने के लिए खेती हो तो समस्याओं का जन्म होता ही है। वही पंजाब में हुआ। यहां किसानों ने जून जुलाई की बजाय अप्रैल मई की शुष्क गर्मी में धान की रोपाई शुरु कर दिया। 2006 में उस समय के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह को पंजाब किसान आयोग की ओर से एक प्रस्ताव भेजा गया कि पंजाब में भूजल स्तर सुधारने के लिए अप्रैल मई के महीने में धान की रोपाई पर प्रतिबंध लगा दिया जाए। कैप्टन अमरिन्दर प्रस्ताव से तो सहमत थे लेकिन किसानों को नाराज करके राजनीतिक आत्महत्या नहीं करना चाहते थे। लिहाजा, उस प्रस्ताव पर उन्होंने कोई निर्णय नहीं लिया।
निर्णय लिया उनके बाद आनेवाली बादल सरकार ने। 2008 में प्रकाश सिंह बादल ने अध्यादेश जारी किया कि 10 जून से पहले पंजाब में कोई किसान धान की रोपाई नहीं करेगा। इससे पहले हालात यह हो गये थे कि अपनी थाली में चावल का एक दाना न रखनेवाले पंजाब के किसान चावल की दो फसल पैदा करने लगे थे। एक की रोपाई अप्रैल मई में करते थे और दूसरे की जून जुलाई में। धान की दोहरी पैदावार पाने के लिए वो साठा चावल की किस्म गोविन्दा बोते थे ताकि धान की दो फसल लेने के बाद समय से गेहूं की खेती भी की जा सके।
किसान साल में तीन फसल ले, इसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन, कीटनाशकों और रासायनिक खादों के मानक से कई गुना अधिक प्रयोग ने पंजाब में कई तरह की समस्याएं पैदा कर दीं। इसमें प्राकृतिक संसाधनों के विनाश से लेकर कैंसर की महामारी तक शामिल है। इसी में दिल्ली के वायु प्रदूषण का वह रहस्य भी छिपा हुआ है जो हर साल का एक नियत संकट बन गया है।
दिल्ली की हवा खराब होने के अपने भी कई कारण हैं। जैसे अत्यधिक मोटर वाहन का दबाव, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण गतिविधियां और सीमित क्षेत्र में मानक से अधिक जनसंख्या का निवास। लेकिन अक्टूबर नवंबर के महीने में दिल्ली की एक्यूआई बढ़ने का बड़ा कारण पंजाब में जलनेवाली पराली ही होती है। यही वह महीना होता है जब वातावरण में ठंड का असर बढ़ना शुरु होता है और इस मौसम में उठनेवाला धुआं त्वरित रूप से वातावरण के बाहर नहीं जा पाता। दिल्ली में आज से बीस पच्चीस साल पहले भी यह समस्या थी लेकिन तब इसके लिए डीजल की बसों, फटफट सेवा और घरेलू कोयला जलाने को बड़ा कारण माना जाता था।
अब जब ये सभी समस्याएं कानूनन समाप्त कर दी गयीं हैं तब भला दिल्ली में ठीक वही समस्या क्यों पैदा हो रही है जो 25-30 साल पहले भी थी? इसका एक बड़ा कारण है पंजाब में जलनेवाली धान की पराली। किसान इसी समय अमेरिकी हार्वेस्टर मशीनों से धान की कटाई करते हैं। क्योंकि इन मशीनों के कारण पराली खेत में ही छूट जाती है जो किसान के लिए एक समस्या बनती है। हाथ की कटाई या छोटी मशीनों का इस्तेमाल होने से ये समस्या पैदा ही नहीं होगी।
कोढ में खाज यह है कि जिन हार्वेस्टर म़शीनों से धान की कटाई की जाती है वो धान की कटाई के लिए बनी ही नहीं है। उन्हें गेहूं की कटाई के लिए डिजाइन किया गया है जो अमेरिका और यूरोप की मुख्य पैदावार है। यह वैसे ही है जैसे कोई लोहे के हथौड़े से पत्थर की डिजाइन बनाये। ऐसे में इस अनचाही पराली से छुटकारा पाने के लिए सबसे आसान काम यही होता है कि किसान उन्हें खेत में ही जला दे ताकि तत्काल गेहूं की बुआई कर सके।
दिल्ली से लेकर लाहौर तक इस महीने में होनेवाले वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण यही धान की जलाई हुई पराली बन जाता है। मसलन इस बार की समस्या को ही देखें तो 26 अक्टूबर से लेकर 29 अक्टूबर तक नासा ने पंजाब की जो सेटेलाइट इमेज जारी की है उसमें बताया गया है कि इन चार दिनों में मानों पूरा पंजाब पराली की आग में जल रहा है। इसमें भारत वाला पंजाब और पाकिस्तान वाला पंजाब दोनों शामिल हैं।
हालांकि एमएसपी के लिए होनेवाली खेती और अमेरिकी हार्वेस्टर के बेतहाशा इस्तेमाल के कारण भारत वाले पंजाब में पराली जलाने (stubble burning) की मात्रा अधिक है। नासा की सेटेलाइट इमेज के अनुसार 29 अक्टूबर को तो जैसे रिकार्ड ही टूट गया। भारत वाला पूरा पंजाब पराली वाली आग की लपटों से घिरा दिखाई दिया। उधर पराली जलनी शुरु हुई और इधर दिल्ली वालों के आंख और नाक से पानी बहना शुरु हो गया।
निश्चित रूप से यह दिल्ली के लिए यह स्थाई समस्या नहीं है। लेकिन यह प्राकृतिक समस्या भी नहीं है। इसे हमने खुद पैदा किया है और इसे कुछ सामान्य प्रशासनिक और सामाजिक प्रयासों से दूर भी कर सकते हैं। सबसे पहले पंजाब में धान की खेती को हतोत्साहित करके दोबारा से मोटे अनाजों की पैदावार के लिए प्रेरित किया जाए जो हमेशा से पंजाब की पैदावार रहे हैं। इसमें ज्वार, बाजरा, मक्का, उड़द की मानसूनी फसलें शामिल हैं। बड़े बड़े अमेरिकी यूरोपीय हार्वेस्टर के निर्माण और वितरण को सीमित किया जाए या फिर पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया जाए।
पंजाब के अलावा भारत के जिन दूसरे राज्यों में धान की खेती होती है वहां अभी यह समस्या तो नहीं है, लेकिन जिस तरह से गेहूं की कटाई वाले हार्वेस्टर देश के दूसरे हिस्सों में पहुंच रहे हैं और धान की कटाई कर रहे हैं इससे यह समस्या देश के दूसरे हिस्सों में भी बढ़नेवाली है। अगर सरकार समय रहते हार्वेस्टर मशीनों का विकल्प तैयार कर ले तो पराली की समस्या से स्वत: मुक्ति मिल जाएगी। इसके अलावा पराली के कॉमर्शियल इस्तेमाल के विकल्प तो खुले ही हुए हैं जिससे न केवल ग्रीन इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन को बढावा मिलेगा बल्कि किसानों को भी आर्थिक लाभ पहुंचेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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