Strategic and Tactical Weapons: जंग में जीत के लिए कितना तैयार है भारत?
सीमा सुरक्षा को लेकर भारत दोहरी चुनौतियों से घिरा हुआ है। अगर जंग होती है तो भारत में हथियारों की उपलब्धता कैसी है और क्या उनके जरिए जंग में निर्णायक जीत हासिल की जा सकती है?

Strategic and Tactical Weapons: भारत-चीन के बीच लगातार चल रहा तनाव हमारे देश में लोगों के मन में सेना, हथियार, चीन और भारत की शक्ति की तुलना, परमाणु बम जैसे विषयों पर बहुत उत्सुकता और कुतूहल पैदा कर रहा है। भारत में मिलिट्री सर्विस अनिवार्य नहीं है इसलिए रक्षा विषयों में आम जनता की जानकारी काफी कम है। उनमें से दो प्रश्न अधिक होते हैं: एक भारत के पास प्रर्याप्त हथियार/गोला-बारूद है? दूसरा अगर चीन ने एटम बम प्रयोग किया तो?
इनका सटीक उत्तर विशेषज्ञों के पास भी नहीं है और इसका उत्तर देने का प्रयास करना भी उचित नहीं। परन्तु कुछ बातें समझना बहुत आवश्यक है। इनको समझ लेने से बहुत सी शंकाओं का स्वत: समाधान हो जाएगा। बहुत कम लोग हैं जो इन विषयों को ठीक से समझते हैं। सारे हथियारों को आम तौर पर दो भागों में बांटा जाता है: रणनीतिक (strategic) और युद्धनीतिक (Tactical)।
रणनीतिक हथियार
रणनीतिक हथियार (strategic weapons) उनको कहा जाता है जो असल में युद्ध में प्रयोग करने के लिए होते ही नहीं हैं। ऐसे हथियार अत्यंत भयावह स्थिति में प्रयोग किये जाते हैं, जो परस्पर विनाश की ओर ले जाते हैं। ये हथियार अधिकतर युद्ध की रोकथाम के लिए होते हैं। ये डिटेरेंट (deterrent) होते हैं। इनकी खास बातें निम्न प्रकार हैं:
1.रणनीतिक हथियार सामूहिक नरसंहार के अस्त्र- शस्त्र (वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन) होते है। यानी ये हथियार महाविनाश के हथियार होते हैं जिसमें बिना भेदभाव के नरसंहार एवं महाविनाश होता है।
2. यह हथियार अधिकतर युद्ध में प्रयोग किए जाने के लिए नहीं बल्कि युद्ध को रोकने के लिए होते हैं।
3. यह हथियार सशस्त्र सेनाओं (आर्म्ड फोर्सेज) के पास ही होते हैं और चलाने का सारा प्रशिक्षण भी सिर्फ सेना (थल, जल, और वायुसेना) के ही पास होता है मगर चलाने का अधिकार नहीं होता।
4. इन हथियारों को चलाने का निर्णय देश के शिखर नेतृत्व यानी प्रधानमंत्री या कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (भारत में सुरक्षा पर निर्णय लेने के लिए बनी सर्वोच्च संस्था यानी कि "मंत्रिमंडल की सुरक्षा समिति") लेती है। इसमें प्रधानमंत्री के अलावा वित्त मंत्री, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री और विदेश मंत्री होते हैं।
5. स्ट्रैटेजिक वेपंस का प्रयोग आमतौर पर दो स्थितियों में ही होता है: एक, जब शत्रु ने उस हथियार का प्रयोग पहले करके हमारा बहुत बड़ा विनाश कर दिया हो या दो, हमारा बहुत बड़ा भूभाग, सभी संसाधनों सहित, शत्रु ने छीन लिया हो जिससे देश की एकता/अखंडता के ऊपर बहुत गंभीर खतरा पैदा हो गया हो।
इस परिभाषा के बाद अब यह समझना आसान होगा कि इस कैटेगरी में कौन से हथियार आते हैं। इसमें सिर्फ एक ही हथियार आता है जिसे हम परमाणु बम या एटम बम कहते हैं। इसके अलावा न्यूट्रॉन बम या हाइड्रोजन बम भी इसी कैटेगरी में आते हैं। इन हथियारों को रखने के लिए और संचालित करने के लिए एक पूरी अलग से कमांड है जिसे ट्राई सर्विस स्ट्रेटजिक कमांड (Tri-service strategic command) कहा जाता है। इसकी कमांड सेना के अति वरिष्ठ अधिकारी (जो कि लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का होता है) के हाथ में होती है जिसे आर्मी कमांडर भी कहते हैं। यह सेनाध्यक्ष के ठीक नीचे और कोर कमांडर के ऊपर होता है। ट्राई सर्विस स्ट्रैटेजिक कमांड स्ट्रैटेजिक वेपंस के रखरखाव एवं संचालन में निपुण होते हैं परंतु इसे चलाने का अधिकार उन्हें नहीं होता। इसे चलाने का अधिकार सर्वोच्च नेतृत्व के ऊपर होता है और उनसे आदेश मिलने पर ही इन्हें चलाया जाता है।
रणनीतिक हथियारों के युद्ध टालने का प्रभाव हम रूस-अमेरिका सम्बन्धों से बहुत आसानी से समझ सकते हैं। रूस और अमेरिका दोनों के पास एक दूसरे को पूरी तरह तहस-नहस करने की शक्ति है। इस कारण कोई युद्ध नहीं छेड़ना चाहता। क्योंकि दोनों को पता है कि यदि युद्ध हुआ तो दोनों तबाह हो जायेंगे। इसी को परस्पर विनाश (mutual destruction) कहते हैं। परस्पर तबाही के भय से दोनों में से कोई युद्ध आरम्भ नहीं करना चाहता। यही कारण है कि अमेरिका यूक्रेन के मामले में सीधे सम्मिलित नहीं हो रहा है।
भारत के पास परमाणु बम ले जाने की क्षमता रखने वाली अग्नि मिसाइलें (मुख्यतः अग्नि-5), पृथ्वी मिसाइलें और ब्रह्मोस (यदि इसे परमाणु हथियार ले जाने के लिए प्रयोग किया जाता है) इस श्रेणी में आती हैं। ब्रह्मोस का प्रयोग जब लड़ाकू विमानों से नाभिकीय या हाइड्रोजन बम गिराने के लिए होता है तो ब्रह्मोस एक स्ट्रेटेजिक हथियार की श्रेणी में आ जाती है। असल में यह मिसाइल नहीं वरन उसमें ले जाने वाला warhead यह तय करता है की यह स्ट्रेटजिक हथियार है या टैक्टिकल।
युद्धनीतिक हथियार (tactical weapons)
दूसरी तरफ युद्धनीतिक हथियार वे सारे हथियार हैं जो स्ट्रैटेजिक की कैटेगरी में नहीं आते। ये ऐसे हथियार हैं जो पूरी तरह से युद्ध के दौरान सेनाधिकारियों के विवेक पर प्रयोग किए जाते हैं। इसमें आमतौर पर परमाणु बम, हाइड्रोजन बम और नाइट्रोजन बम जैसे वेपंस ऑफ मास डिस्ट्रक्शन को छोड़कर बाकी सब हथियार आते हैं।
इसमें राइफल पिस्टल जैसे छोटे हथियारों से प्रारंभ कर मोर्टार, तोप, टैंक, रॉकेट, मिसाइलें, लड़ाकू विमान, सभी प्रकार के युद्ध पोत सम्मिलित हैं। इन्हें परम्परागत हथियार भी कहते हैं।
संसार में बहुत कम देशों के पास रणनीतिक हथियार हैं। कुल मिलाकर 10 से अधिक नहीं है, जैसे अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, इंग्लैंड, भारत, इजराइल, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया और सम्भवतः ईरान। चूंकि रणनीतिक हथियार प्रयोग के लिए बने ही नहीं, इसीलिए प्रत्येक देश जिसके पास रणनीतिक हथियार हैं, परम्परागत हथियार और परम्परागत सेना में कोई कटौती नहीं करता। जिनके पास रणनीतिक हथियार हैं उन्हीं के पास विशालतम परम्परागत सेनाएं और सबसे शक्तिशाली परम्परागत और युद्धनीतिक हथियार भी हैं। मानव शक्ति की गणना के अनुसार सबसे बड़ी सेना चीन की, फिर अमेरिका, भारत, रूस, पाकिस्तान, फ्रांस के पास हैं।
भारत दोनों प्रकार के हथियारों से सज्जित है। इसीलिए भारत के पास दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी सेना है और चौथी सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है। सैन्य शक्ति के मापदंड अनेकों हो सकते हैं परन्तु फायर पावर (fire power) को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। जिस प्रकार हमारी सेना में आत्मनिर्भरता और आधुनिकीकरण हो रहा है भारत दुनिया की तीसरी सबसे सशक्त सैन्य शक्ति बनने के द्वार पर खड़ा है।
भारत की तैयारी दो फ्रंट पर लड़ने और दुश्मन को एंगेज करने की रही है। इसलिए अगर कभी ऐसी परिस्थिति बनती भी है तो हमारी ओर से तैयारी पूरी है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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