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Chanda Kochhar: शानदार उत्थान से शर्मनाक पतन की कहानी

सवा तीन हजार करोड़ रुपये के कर्ज फर्जीवाड़े में कोचर दम्पत्ति और वीडियोकॉन समूह के चेयरमैन वेणुगोपाल धूत को सीबीआई द्वारा गिरफ्तार किया गया है। उनकी गिरफ्तारी ने बैंकिंग सेक्टर की कमजोरियों को फिर चर्चा में ला दिया है।

story of Chanda Kochhar Ex CEO of ICICI Bank Videocon fraud case

Chanda Kochhar: पद, अधिकार और सर्वोपरि होने का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है तो सबसे पहले इंसान की उचित-अनुचित के बीच फर्क कर पाने की सामर्थ्य ही हर लेता है। करीब एक दशक तक आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी रही चंदा कोचर के शानदार उत्थान और शर्मनाक पतन की कहानी इसी का एक सशक्त उदाहरण है।

चंदा कोचर, वर्ष 2009 में जब इस बैंक के सर्वोच्च पद पर पहुँची थीं, तो वह राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुखिर्यो की सरताज बन गयी थीं। उनकी इस उपलब्धि को नारी सशक्तीकरण की यात्रा में एक मील के पत्थर के रूप में देखा गया। लेकिन, कोई नहीं जानता था कि इस चमक के पीछे कितना स्याह सच छिपा हुआ है।

यह उनकी आर्थिक महत्वाकांक्षाएं थीं या पारिवारिक मजबूरियां, उन्होंने अपने पद की जवाबदेही और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, दोनों को भुला दिया। पतन की राह पकड़ने में कोचर ने न तो देर की और न संकोच। पद संभालने के साथ ही उन्होंने बैंकिंग व्यवस्था खामियों का लाभ उठाते हुए अधिकारों का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया।

'फेवर' के लिए हुआ फ्रॉड

इस किस्से की शुरुआत हुई 2009 में, जब आईसीआईसीआई बैंक की कमेटी ने वीडियोकॉन इंटरनेशनल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (वीआईईएम) को 300 करोड़ रुपये का ऋण स्वीकृत किया। इस कमेटी की अध्यक्ष चंदा कोचर थीं। यह लोन बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों और बैंक की क्रेडिट पॉलिसी की परवाह न करते हुए दिया गया था।

लोन पाने के बाद धूत ने वीडियोकॉन समूह की ही एक अन्य कंपनी सुप्रीम एनर्जी के माध्यम से, 64 करोड़ रूपये नूपॉवर रिन्यूएबल प्राइवेट लिमिटेड में निवेश कर दिए। सीबीआई के अनुसार, यह सीधे-सीधे 'लोन फॉर फेवर' का मामला था।

नूपॉवर कंपनी का गठन, वर्ष 2008 में ही हुआ और चंदा कोचर के पति दीपक कोचर और वेणु गोपाल धूत, दोनों की इसमें बराबरी की हिस्सेदारी थी। 2009 में डायरेक्टर पद से इस्तीफा देकर धूत ने पूरी कंपनी दीपक कोचर को सौंप दी थी। लेकिन, 64 करोड़ रूपये के निवेश के ऐवज में सुप्रीम एनर्जी ने वापस इसमें शेयर हासिल कर लिये। इसके बाद नूपॉवर की खरीदी, बिक्री और बार-बार हस्तांतरण का एक लंबा खेल चला, जिसमें वीडियोकॉन, नूपॉवर और सुप्रीम एनर्जी के अलावा दीपक कोचर की ही एक और कंपनी पिनेकल एनर्जी भी शामिल थे। 2018 में नूपॉवर की कमान फिर से पूरी तरह दीपक कोचर के हाथों में आ गयी।

लेकिन, इसी के समानांतर एक और खेल चल रहा था। जिसके खिलाड़ी थे वीडियोकॉन समूह और चंदा कोचर की अगुवाई वाला आईसीआईसीआई बैंक। इस खेल में वीडियोकॉन समूह और उसकी विभिन्न कंपनियों को पॉंच अलग-अलग लोन दिये गये। 2009 से 2011 के बीच इन्हें कुल 1,875 करोड़ रुपये की राशि ऋण के रूप में दी गयी। 2012 में बैंक ने वीडियोकॉन समूह की कंपनियों के छह खातों के बकाया ऋण को डोमेस्टिक डेब्ट रिफाइनेंसिंग के तहत स्वीकृत 1,730 करोड़ रुपए के लोन में एडजस्ट कर दिया। 2012 में दिये गये लोन की राशि थी 3,250 करोड़ रुपये। सीबीआई का कहना है कि इसमें से 2,810 करोड़ रुपये नहीं चुकाये गये।

2016 में खुला मामला

पहली बार इस फ्रॉड का पर्दाफाश किया अरविंद गुप्ता नामक एक शख्स ने। वह वीडयोकॉन और आईसीआईसीआई बैंक, दोनों में निवेशक थे। जब उनका ध्यान इस अनियमितता पर गया तो उन्होंने आरबीआई को इस बारे में लिखा। लेकिन उस समय इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया और जॉंच के नाम पर खानापूर्ति से काम चला लिया गया। इस लापरवाही का नतीजा यह निकला कि बैंक को एक और घपले का मौका मिल गया और जून, 2017 में वीडियोकॉन के अकाउंट को एनपीए घोषित कर दिया गया।

लेकिन, जब मार्च 2018 में एक और गुमनाम व्हिसल ब्लोअर ने ऐसी ही शिकायत की तब भी बैंक प्रबंधन का ध्यान कोचर को बचाने पर ज्यादा था। आखिर, सीबीआई ने इस मामले में एफआईआर दर्ज की। साथ ही साथ, ईडी ने भी इससे जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं की जॉंच शुरू कर दी। इससे फोर्ब्स की सबसे शक्तिशाली महिलाओं की सूची में शामिल तथा पद्मभूषण से सम्मानित चंदा कोचर काफी दबाव में आ गयीं और उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा।

बैंक और कॉरपोरेट का शातिर गठजोड़

कोचर दम्पत्ति और धूत फिलहाल 28 दिसंबर तक सीबीआई की हिरासत में हैं, जिसकी अवधि आगे बढ़ सकती है। हो सकता है कि इस मामले में कुछ और लोगों पर शिकंजा कसा जाये। लेकिन, यह सवाल उत्पन्न होता है कि आखिर अरबों-खरबों रुपये का कारोबार करने वाले बैंक इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं कि जो चाहे, जब चाहे उन्हें चूना लगा जाये?

जाहिर है कि यह एक-दूसरे को फायदा पहुँचाने का खेल है, जिसमें नुकसान होता है देश के करदाताओं का और बैंक के आम ग्राहकों का। पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने आरबीआई के संदर्भ से लोकसभा में इससे संबंधित आंकड़े पेश किये थे। इनके अनुसार, 31 मार्च 2022 तक, पिछले पांच सालों में बैंकों द्वारा दस लाख करोड़ रुपये की ऋण राशि को बट्टे खाते में डाला गया है।

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    बैंक और कारपोरेट का यह शातिर गठजोड़ कभी आईसीआईसीआई की चंदा कोचर की शक्ल में सामने आता है तो कभी यस बैंक के राणा कपूर की, कभी डीएचएफएल के कपिल वाधवान के रूप में तो कभी आईएलएंडएफएस के रवि पार्थसारथी के। चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन चरित्र में कोई बदलाव शायद ही कभी नजर आता हो।

    यह भी पढ़ें: कितनी संपत्ति के मालिक हैं वीडियोकॉन के चेयरमैन Venugopal Dhoot, जिन्हें ICICI लोन केस में CBI ने किया अरेस्ट?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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