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Spy Movie: नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मृत्यु के रहस्य खोलेगी 'स्पाई' मूवी

काल्पनिक कहानियों के जरिए वास्तविक घटनाओं की पड़ताल की परिपाटी फिल्मों में कोई नयी नहीं है। देखना यह है कि नेताजी की कथित मृत्यु की जांच पड़ताल करती "स्पाई" फिल्म दर्शकों को कहां तक ले जाती है।

Spy movie will reveal the mystery of Netaji Subhash Chandra Boses death

Spy Movie: ताशकंद फाइल्स हो या कश्मीर फाइल्स, विवेक अग्निहोत्री ने दो गंभीर मुद्दों को अपनी फिल्मों के जरिए मुख्य धारा के विमर्श में लाने में कामयाबी पाई। ये अलग बात है कि कुछ महीनों तक सोशल मीडिया, टीवी और लोगों की आपसी चर्चाओं में रहने के बाद ये मुद्दे भी अब ठंडे हो गए हैं। बावजूद इसके इन फिल्मों ने भारत के फिल्म मेकर्स को एक नया रास्ता जरुर दिखा दिया है। अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कथित मृत्यु की जांच के बहाने भी वो कई मुददे उठाए जाएंगे, जो अनुज धर जैसे लेखक और नेताजी के कई प्रशंसक समय समय पर उठाते रहे हैं।

नेताजी सुभाषचंद्र बोस पर बनी इस मूवी का नाम है 'स्पाई'। जिस तरह इसके नाम के आगे वन लगाया गया है, उससे लगता है, ये मूवी सीरीज भी हो सकती है। फिल्म के हीरो हैं दक्षिण की 'कार्तिकेय' सीरीज के निखिल सिद्धार्थ और निर्देशक हैं गैरी बीएच। बतौर निर्देशक गैरी की ये पहली मूवी है। हालांकि वो करीब 20 फिल्मों के एडीटर रह चुके हैं। हिंदी के दर्शक उनकी एडिट की हुई फिल्म 'गाजी' और 'हिट' से परिचित होंगे। एडीटर से डायरेक्टर बनने वालों की फेहरिश्त में इससे पहले हृषिकेश मुखर्जी से लेकर राजकुमार हीरानी जैसे दिग्गजों का नाम शामिल है।

इस मूवी का टीजर जब 6 मई को रिलीज किया गया, जगह चुनी गई इंडिया गेट के पास पीएम मोदी द्वारा लगवाई गई नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति, जो काफी चर्चा में रही है। तेलुगु टीजर ही अगले 10 दिनों में 10 मिलियन व्यूज पार कर गया। पांच भाषाओं में रिलीज होने जा रही इस मूवी के टीजर से ही लोग चौंके, क्योंकि नेताजी बोस का चर्चित नारा 'तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा' को रैप में ढालकर इस मूवी में इस्तेमाल किया गया है।

लेकिन गुरुवार को जब ट्रेलर रिलीज किया गया तो उनकी आशंकाएं कुछ कम हुईं। ट्रेलर के शुरूआत में ही मकरंद देशपांडे जब ये बोलते हैं कि 'भगवानजी की फाइल मिसिंग है'। पूछने पर जब वह बताते हैं कि भगवान जी वो नेताजी बोस के लिए कह रहे थे, तो फिल्म में उसे पूछने वाला किरदार ही नहीं उसके देखने वाले दर्शक भी श्रद्धा भाव से भर जाते हैं। नेताजी बोस अपने आप में एक ऐसे रहस्मयी किरदार रहे हैं कि लोग उनकी जितनी इज्जत करते हैं, उतना ही उनके बारे में जानना चाहते हैं।

पिछले कुछ सालों से उनकी फाइल्स पर बंगाल से लेकर दिल्ली में जो हंगामा हुआ, बोस के कई दीवानों ने जो सुबूत उनके गायब होने को लेकर जनता के सामने रखे हैं, उससे वो पहले ही संदेह में हैं कि कुछ तो छुपाया गया था। ऐसे में इस मूवी के ट्रेलर से जब पता चला कि नेताजी के गायब होने और तथाकथित विमान हादसे में उनकी मृत्यु होने की जांच की जाएगी, तो हर कोई हैरान हो चला है।

हालांकि 'ताशकंद फाइल्स' से इस ट्रेंड की शुरूआत हुई थी कि इतिहास के किसी भी रहस्य पर पड़े पर्दों को कुछ काल्पनिक किरदारों के जरिए तार्किक तरीके से उठाया जाए। ताशकंद फाइल्स में एक महिला पत्रकार रहस्य की एक एक परतें अपने सुबूतों और सरकार की बनाई कमेटी के सामने उठाती है। तब वो बहस देखने लायक होती है।

जिनको ये सब नहीं पता था कि शास्त्री की मौत से पहले कैसे उनका रसोइया बदल गया था, उनको दूध किसने दिया था, उनके शव पर कैसे निशान थे, कैसे उनके रसोइये को राष्ट्रपति भवन में ट्रांसफर कर दिया गया, कैसे उस केस से जुड़े कई लोगों को एक एक करके दुर्घटनाओं आदि में अकाल मौत का सामना करना पड़ा, केजीबी और सीआईए की भूमिका क्या क्या रही, उनके लिए ताशकंद फाइल्स कौतुहल का विषय बन गई थी। विवेक अग्निहोत्री की अगली मूवी कश्मीर फाइल्स भी कुछ उसी तरह की थी। 'द केरला स्टोरी' इस तरह से नहीं फिल्माई गई लेकिन वो भी इसी वजह से विवादों में रही।

कुछ और फिल्में भी हैं जिनमें सच्ची ऐतिहासिक घटनाओं या पौराणिक कहानियों के साथ काल्पनिक किरदारों और नई कहानियों को जोड़कर मनोरंजन के लिए मूवी बना दी गई। अनुष्का शर्मा के प्रोडक्शन तले बनी दिलजीत दोसांझ, अनुष्का स्टारर 'फिल्लौरी' इसका सही उदाहऱण है। जलियां वाला बाग के नरसंहार के दिन कई गुमुनाम लोग भी जनरल डायर के आदेश से हुई फायरिंग में मारे गए थे। ऐसे ही एक काल्पनिक किरदार को उठाकर उनके भूतों की कहानी रच दी गई। राजामौली की 'आरआरआर' भी उसी तरह की कहानी है। कोमारम भीम और अल्लूरी सीताराम राजू कभी भी दिल्ली नहीं आए, लेकिन राजामौली उनके किरदारों को दिल्ली ले आए और मूवी रच डाली। सब फिल्म लेखक की कल्पना की उड़ान थी।

पाकिस्तान में रॉ के जासूस रहे रवीन्द्र कौशिक की कहानी पर भी सलमान की टाइगर सीरीज से लेकर जॉन की 'RAW' से लेकर सिद्धार्थ मल्होत्रा की हालिया 'मिशन मजनूं' तक कई फिल्में बनीं। लेकिन कहीं भी श्रेय उसको नहीं दिया गया, ना उसके घरवालों को मूवी के राइट्स में से हिस्सा दिया गया और ना ही रवीन्द्र कौशिक का नाम तक लिया गया। अब अनुराग बासु रवीन्द्र कौशिक के नाम से उनके उपनाम 'ब्लैक टाइगर' टाइटल से फिल्म बनाकर उन्हें असली श्रद्धांजलि देंगे। मनोज बाजपेयी की 'सिर्फ एक बंदा काफी है' में आसाराम केस में पीड़िता के वकील पीसी सोलंकी पर न सिर्फ फिल्म बनी बल्कि उस नाम का ही किरदार रखा गया और उनसे राइट्स भी खरीदे गए।

इनमें सबसे ज्यादा चर्चा में रही आमिर खान की 'लाल सिंह चड्ढा'। फॉरेस्ट गम्प की रीमेक इस मूवी का काल्पनिक किरदार भारत में होने वाली तमाम ऐतिहासिक घटनाओं में घुसता और निकलता रहा, 71 के युद्ध से लेकर 84 के दंगों तक। वेंकटरमण से पदमश्री लेने से लेकर आडवाणी की रथयात्रा तक वो हर जगह मौजूद था। ऐतिहासिक घटनाओं से जोड़कर काल्पनिक किरदारों के जरिए कहानियां रचना, हालांकि भारतीय जनता को ज्यादा पसंद नहीं आया। कम से कम लाल सिंह चड्ढा में तो कतई नहीं।

हालांकि इस साल रिलीज होने वाली फिल्मों में स्वातंत्र्य वीर सावरकर, मैदान और सैम बहादुर जैसी ऐतिहासिक किरदारों पर बनने वाली मूवीज भी शामिल हैं। उम्मीद तो यही है कि उनकी जीवनी से कोई बड़ी छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। लेकिन नेताजी बोस के चाहने वालों की 'स्पाई' पर नजर जरूर है। यूं तो ट्रेलर में नेताजी बोस का जमकर महिमामंडन है, लेकिन मूवी में अगर नेताजी के गायब होने, उनके गुमनामी बाबा के रूप में सामने आने, नेहरू की कई मामलों में भूमिका होने, आजाद हिंद फौज का खजाना गायब होने आदि में अगर सोच से अलग कोई लाइन ली गई तो लोगों को नागवार गुजरना तय मानिए।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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