Special Session: हंगामे से होगा नई संसद का श्रीगणेश
सोमवार से संसद का विशेष सत्र शुरू हो रहा है, लेकिन पहले दिन की बैठक पुरानी बिल्डिंग में होगी, जिसमें उस बिल्डिंग के संसदीय सफर को याद किया जाएगा| अगले दिन मंगलवार से नई संसद में बैठक शुरू होगी, जिसका उद्घाटन पहले ही हो चुका है।

पहले ऐसा माना जा रहा था कि नए साल में राष्ट्रपति के संबोधन के साथ ही नए भवन में संसद का कामकाज शुरू होगा, क्योंकि इससे एक संदेश जाएगा कि देश की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के अभिभाषण से नई संसद की शुरुआत हुई है| इससे विपक्ष की नाराजगी भी काफी हद तक दूर हो जाती, जिसने राष्ट्रपति से उद्घाटन नहीं करवाए जाने पर आपत्ति उठाते हुए उद्घाटन समारोह का बायकाट किया था| लेकिन अब यह तय हो गया है की 19 सितबंर से नई संसद में कामकाज का श्रीगणेश हो जाएगा।
विपक्ष ने तो नया संसद भवन बनाने पर भी आपत्ति उठाई थी, जिसे सुप्रीमकोर्ट में चुनौती भी दी गई थी| असल में पुरानी संसद का निर्माण 1921 में ब्रिटिश काल में हुआ था, जो अब काफी खस्ता हाल में हो चुकी है| दस साल पहले तीसरी मंजिल पर स्थित किचन से पानी लीक हो कर दूसरी मंजिल के कमरों में रिसने लगा था| दोनों सदनों और सेंट्रल हाल की छतों से प्लास्टर गिर रहा था, जिसे रोकने के लिए लोहे की जाली लगाई गई थी, किसी भी समय कोई हादसा हो सकता था।
पिछले तीस साल से नया संसद भवन बनाने पर चर्चा हो रही थी। जब विपक्ष ने उद्घाटन समारोह के बायकाट का एलान किया था, तब पूर्व संसदीय कार्यमंत्री गुलामनबी आज़ाद ने खुलासा किया था कि सबसे पहले नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व काल में नई इमारत बनाने की चर्चा शुरू हुई थी| तब वह खुद संसदीय कार्य मंत्री थे, और शिवराज पाटिल लोकसभा स्पीकर थे| उन दोनों की इस मुद्दे पर कई बैठकें हुई थी, प्रधानमंत्री के साथ भी विचार विमर्श किया गया था, लेकिन कई कारणों से उस विचार को कुछ समय के लिए ठंडे बस्ते में डालने का फैसला हुआ था।
मोदी सरकार ने 2019 के चुनावों के बाद निर्णायक फैसला लेकर संसद परिसर के भीतर ही नई बिल्डिंग का निर्माण कार्य शुरू करवा दिया था| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार कई साल से गुलामी की निशानियों को मिटाने की बात करते आ रहे थे| 1921 में ब्रिटिश काल में बनी संसद में मौजूदा सांसदों के बैठने के लिए भी पर्याप्त सीटें भी नहीं थीं| जबकि 2026 के बाद लोकसभा और राज्यसभा की सीटें बढना भी तय है| इसलिए नई संसद में 1272 सांसदों के बैठने की व्यवस्था की गई है, जिसमें से लोकसभा में 888 सदस्यों की जगह है, जबकि राज्यसभा में 384 सदस्य बैठ सकते हैं।
नई बिल्डिंग के उद्घाटन के समय से ही कयास लगाए जा रहे थे कि मोदी सरकार ने सिर्फ 2029 के चुनावों को ध्यान में रखकर नई संसद नहीं बनाई है| बल्कि उससे पहले ही सरकार कुछ नया करना चाहती है| अब जब अचानक विशेष सत्र का एलान हुआ, तो उसके साथ ही महिला आरक्षण बिल लाए जाने की चर्चा शुरू हो गई है।

मोदी सरकार अगर विशेष सत्र में लोकसभा की 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का बिल पास करवाती है तो 2024 के लोकसभा चुनाव में ही महिला आरक्षण को लागू किया जा सकता है| 2024 में पुरुष सांसदों की जितनी सीटें घटेंगी, उसकी पूर्ति 2026 की डीलिमिटेशन से कर दी जाएगी और 2029 के चुनाव में उतने ही पुरुष सांसद भी जीत कर लोकसभा में आ जाएंगे, जितने 2019 में चुने गए हैं| महिला आरक्षण से 2024 में जिन सांसदों की टिकट कटेगी, नई बिल्डिंग उन पुरुष सांसदों को भरोसा देगी कि वे फिर लौटकर आएँगे।
एक देश एक चुनाव की मीटिंग 23 सितंबर को तय होने के बाद यह तो तय हो गया कि 2024 में एक देश एक चुनाव नहीं होने जा रहा। इस एजेंडे पर 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद ही कुछ होगा| तो क्या नरेंद्र मोदी सोमवार से शुरू हो रहे विशेष सत्र में महिला आरक्षण का बिल पास करवाना चाहते हैं? 31 अगस्त को संसद सत्र का एलान किया गया था, लेकिन सत्र का एजेंडा जाहिर नहीं किया गया था| इस पर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को चिठ्ठी लिख कर एजेंडा नहीं बताने का मुद्दा उठाया था।
इस चिठ्ठी में कांग्रेस ने अपने 9 मुद्दे बता दिए थे, जिन्हें वह विशेष सत्र में उठाना चाहेगी| हालांकि सरकार की तरफ से सोनिया गांधी को जवाब दिया गया था कि ऐसी परंपरा नहीं है। लेकिन सरकार का जवाब तथ्यों से मेल नहीं खाता था, इसलिए विपक्ष के दबाव में 13 सितंबर को एजेंडा जारी कर दिया गया| जारी किए गए एजेंडे में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसके लिए अचानक विशेष सत्र की जरूरत थी| इसलिए एजेंडा जारी कर दिए जाने के बावजूद संशय बना हुआ है, क्योंकि एजेंडे में "अंदाजन या अस्थाई" लिखा हुआ है, यानी यह सिर्फ शुरुआती एजेंडा है| इसलिए महिला आरक्षण बिल लाए जाने और दोनों सदनों में पास करवाए जाने की संभावना बनी हुई है।
लोकसभा के बुलेटिन में जिन चार बिलों का जिक्र किया गया है, उनमें से दो राज्यसभा से पहले ही पारित हो चुके हैं, और दो राज्यसभा में पेश किए जा चुके हैं| चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति वाले बिल को छोड़कर बाकी तीनों बिल सामान्य बिल हैं| जहां तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी बिल का सवाल है, तो इस पर विपक्ष के साथ भारी टकराव होगा, यह बिल बिना मतविभाजन के पास नहीं हो सकता।
चुनाव आयोग के कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए इस साल मार्च में सुप्रीमकोर्ट ने एक एतिहासिक फैसला सुनाया था| जिसमें उसने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय कमेटी खुद ही बना दी थी, जिसमें प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता के अलावा खुद चीफ जस्टिस शामिल थे| कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि जब तक संसद से क़ानून पारित करवा कर व्यवस्था नहीं बनाई जाती तब तक यह कमेटी चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करेगी।
इसी के बाद सरकार ने मानसून सत्र में 10 अगस्त को चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बिल पेश किया था, जिसमें सुप्रीमकोर्ट के चीफ जस्टिस की जगह केंद्र सरकार का एक मंत्री होने का प्रावधान है| इसके अलावा चुनाव आयुक्तों का स्टेट्स भी सुप्रीमकोर्ट के जजों से घटा कर केबिनेट सेक्रेटरी के बराबर किए जाने का प्रावधान है| विपक्ष को ये दोनों ही प्रावधान मंजूर नहीं है| विपक्ष का कहना है कि चुनावों के दौरान चुनाव आयुक्तों को मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री पर भी कार्रवाई का अधिकार है, इसलिए उनका स्टेट्स सुप्रीमकोर्ट के जज के बराबर ही रहना चाहिए और पारदर्शिता के लिए नियुक्ति कमेटी में तीसरा सदस्य चीफ जस्टिस या रिटायर्ड चीफ जस्टिस होना चाहिए।












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