सोमनाथ पर्व: नश्वर से ईश्वर की ओर
जो संहार का नियंता हो उसका नाश कोई गजनवी या गोरी क्या करेगा ? शिव नश्वरता के प्रतीक भाव के प्रसार से जगत के कल्याण की अवधारणा हैं। शिव मूर्ति नहीं, प्रवृति हैं। मूर्त नहीं स्वतः स्फूर्त हैं। भव ही नहीं विभव भी हैं। संसार ,उसका सार व निस्सार भी हैं। शिव शव भी हैं, वैभव भी हैं।
'शिव बसे मसाने में ' - नश्वरता के बोध प्रकाश के संदेश के प्रसार के दिव्य आलोक स्तंभ का नाम ही अलख निरंजन विश्वेश्वर शिव है। नश्वरता का मर्म समझने के साथ ही तृष्णा का समापन स्वयंमेव हो जाता है ,जीवन कल्याण मय हो जाता है ,जीवन में पूर्णता आ जाती है।

सोमनाथ पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या किसी एक तिथि से बंधा उत्सव नहीं है, बल्कि वह भारतीय चेतना की उस दीर्घ, अविच्छिन्न और संघर्षशील यात्रा का प्रतीक है जिसमें आस्था, इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता एक-दूसरे में घुलकर एक जीवंत परंपरा का रूप लेती हैं। सोमनाथ का नाम आते ही भारतीय मानस में जो छवि उभरती है, वह केवल एक मंदिर की नहीं, बल्कि उस विचार की है जो बार-बार टूटकर भी नष्ट नहीं हुआ, जो हर ध्वंस के बाद और अधिक दृढ़ होकर खड़ा हुआ, और जिसने यह सिद्ध किया कि सभ्यताओं का अस्तित्व केवल पत्थरों से नहीं, बल्कि स्मृति, विश्वास और संकल्प से बनता है। सोमनाथ पर्व उसी स्मृति और उसी संकल्प का वार्षिक, बल्कि शाश्वत उत्सव है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा एक्स पर साझा किए गए विचार इस बात को रेखांकित करते हैं कि सोमनाथ केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा भी है। आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥"
प्रधानमंत्री ने जिस संस्कृत श्लोक का उद्धरण किया, वह इस धाम की महिमा और उसकी सार्वकालिक प्रासंगिकता को दर्शाता है। यह श्लोक सोमनाथ को ऐसे क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, जहां मानव चेतना सिद्धि की ओर अग्रसर होती है और जहां से निकलने वाली दिव्य ऊर्जा मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह संदेश स्पष्ट है-सोमनाथ आस्था का केंद्र होने के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वाभिमान, आत्मसम्मान और एकता का प्रतीक है। यह धाम पीढ़ियों को यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यदि आस्था और साहस जीवित रहे, तो पुनर्निर्माण और पुनरुत्थान निश्चित है। यही सोमनाथ की सबसे बड़ी सीख है और यही भारत की सभ्यतागत शक्ति का मूल मंत्र भी।
सौराष्ट्र की समुद्र-स्पर्शी धरती पर स्थित सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का उल्लेख वैदिक साहित्य से लेकर पुराणों, महाकाव्यों और लोककथाओं तक में व्याप्त है। कहा जाता है कि चंद्रदेव ने अपने क्षय रोग से मुक्ति पाने के लिए भगवान शिव की आराधना की और उसी आराधना के फलस्वरूप इस स्थल पर सोमनाथ की प्रतिष्ठा हुई।
यह कथा केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि भारतीय दृष्टि में रोग, क्षय और पुनर्नवता के बीच के दार्शनिक संबंध को भी उद्घाटित करती है। चंद्रमा का क्षय और पुनः पूर्णता की ओर बढ़ना, मानो यह संकेत देता है कि नाश अंतिम सत्य नहीं है; पुनर्निर्माण और नवजीवन भी उतने ही शाश्वत हैं। सोमनाथ पर्व इसी भाव को सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर पुनर्जीवित करता है।
इतिहास के पृष्ठों पर सोमनाथ का नाम केवल भक्ति और श्रद्धा के कारण ही अंकित नहीं है, बल्कि वह आक्रमणों, ध्वंस और पुनर्निर्माण की श्रृंखला के कारण भी केंद्रीय महत्व रखता है। मध्यकालीन भारत में जब विदेशी आक्रमणकारियों ने सांस्कृतिक प्रतीकों को निशाना बनाकर समाज की आत्मा को तोड़ने का प्रयास किया, तब सोमनाथ उन हमलों का प्रमुख लक्ष्य बना।
परंतु हर बार जब मंदिर को ध्वस्त किया गया, तब-तब भारतीय समाज ने उसे पुनः खड़ा किया। यह क्रम केवल स्थापत्य का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सांस्कृतिक जिजीविषा का था। सोमनाथ पर्व उन असंख्य अनाम कारीगरों, साधकों, राजाओं और सामान्य जनों की स्मृति को प्रणाम करता है जिन्होंने हर युग में यह स्वीकार करने से इनकार किया कि पराजय स्थायी हो सकती है।
सोमनाथ पर्व की गद्यात्मक महत्ता इस तथ्य में निहित है कि वह अतीत की पीड़ा को वर्तमान की शक्ति में रूपांतरित करता है। यह पर्व हमें केवल यह याद नहीं दिलाता कि मंदिर कितनी बार टूटा, बल्कि यह भी सिखाता है कि वह कितनी बार बना। भारतीय परंपरा में उत्सव का अर्थ केवल उल्लास नहीं, बल्कि स्मरण भी है। सोमनाथ पर्व स्मरण का उत्सव है-उस स्मरण का, जो हमें अपनी ऐतिहासिक भूलों से सीखने और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की प्रेरणा देता है। यह स्मरण किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि अपनी सभ्यता की रक्षा के लिए सजग रहने का बोध कराता है।
केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने X पर अपने एक पोस्ट में कहा, "सोमनाथ महादेव मंदिर ज्योतिर्लिंग होने के साथ-साथ सनातन संस्कृति व आध्यात्मिक गौरव की अक्षुण्ण विरासत भी है। बीते हजार वर्षों में इस मंदिर पर कई हमले हुए, लेकिन यह हर बार उठ खड़ा हुआ। यह हमारी सभ्यतागत अमरता और कभी हार न मानने की दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रतीक है। इसे मिटाने की कोशिश करने वालों के नामो-निशान मिट गए, लेकिन यह मंदिर आज और भी वैभवता के साथ खड़ा है।
सोमनाथ मंदिर की ऐतिहासिकता बताती है कि ऐसे हमले हमें क्षति पहुंचा सकते हैं लेकिन मिटा नहीं सकते, क्योंकि हर बार और भी भव्यता और दिव्यता के साथ उठ खड़ा होना सनातन संस्कृति की मूल प्रवृत्ति है। मोदी जी ने सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले हमले के एक हजार वर्ष होने पर 'सोमनाथ स्वाभिमान पर्व' मनाने का निर्णय लिया है, ताकि हमारी भावी पीढ़ी तक सनातन संस्कृति की अविरलता और जीवटता का संदेश पहुँचाया जा सके। मेरा सौभाग्य है कि मैं इस पवित्र मंदिर का ट्रस्टी हूं।
आधुनिक भारत के निर्माण काल में सोमनाथ का पुनर्निर्माण एक गहन वैचारिक बहस का विषय रहा। स्वतंत्रता के बाद जब राष्ट्र अपनी पहचान और दिशा खोज रहा था, तब सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण केवल धार्मिक परियोजना नहीं था, बल्कि वह सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना का प्रतीक बना। यह वह समय था जब भारत औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर अपनी सभ्यतागत जड़ों की ओर लौटने का प्रयास कर रहा था। सोमनाथ पर्व इस संदर्भ में उस क्षण का उत्सव भी है जब भारतीय समाज ने यह स्वीकार किया कि आधुनिकता का अर्थ अपनी परंपरा से विच्छेद नहीं, बल्कि उसके साथ संवाद है।
सोमनाथ पर्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका सांस्कृतिक समन्वय है। यहाँ शिव केवल एक संप्रदाय के देवता नहीं, बल्कि उस व्यापक भारतीय दृष्टि के प्रतीक हैं जिसमें संहार और सृजन, वैराग्य और करुणा, तांडव और ध्यान एक साथ विद्यमान हैं। पर्व के अवसर पर होने वाले अनुष्ठान, संगीत, शास्त्रपाठ और लोकाचार इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि भारतीय संस्कृति में धर्म जीवन से पृथक नहीं, बल्कि जीवन की लय में अंतर्निहित है। समुद्र की लहरों के साथ गूँजता 'ॐ नमः शिवाय' मानो यह घोषणा करता है कि प्रकृति और चेतना, दोनों एक ही सत्य के विविध रूप हैं।
आज के समय में, जब वैश्वीकरण और तात्कालिकता ने स्मृति को क्षीण कर दिया है, सोमनाथ पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पर्व हमें ठहरकर देखने, सुनने और समझने का अवसर देता है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारी पहचान केवल वर्तमान उपलब्धियों से नहीं बल्कि उस दीर्घ सांस्कृतिक यात्रा से बनती है जिसे हमने पीढ़ी दर पीढ़ी जिया है। सोमनाथ पर्व आधुनिक भारतीय के लिए एक दर्पण है, जिसमें वह अपने अतीत की छाया और भविष्य की संभावनाएँ दोनों देख सकता है।
इस पर्व का एक सामाजिक आयाम भी है। सोमनाथ केवल तीर्थ नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने वाला केंद्र रहा है। यहां राजा और प्रजा, विद्वान और साधारण जन, सभी एक ही शिवलिंग के समक्ष नतमस्तक होते हैं। यह समता का वह भाव है जो भारतीय दर्शन की आत्मा में निहित है। सोमनाथ पर्व इस समता को पुनः सजीव करता है और याद दिलाता है कि सच्ची भक्ति अहंकार के विसर्जन से जन्म लेती है।
साहित्य और कला में सोमनाथ की उपस्थिति भी इस पर्व को एक व्यापक सांस्कृतिक आयाम देती है। संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक भारतीय भाषाओं में रचित काव्य और गद्य में सोमनाथ का उल्लेख केवल एक स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रतीक के रूप में हुआ है। यह प्रतीक कभी टूटे हुए स्वप्न का है, कभी पुनर्निर्माण की आशा का, और कभी शाश्वत सत्य की खोज का। सोमनाथ पर्व इन सभी साहित्यिक स्मृतियों को एक साथ जीवंत करता है।
आज जब राष्ट्र-राज्य की अवधारणा के भीतर सांस्कृतिक पहचान को लेकर बहसें तीव्र हैं, सोमनाथ पर्व एक संतुलित दृष्टि प्रस्तुत करता है। यह न तो अतीत में फँसने का आग्रह करता है, न ही परंपरा को त्यागने का। यह पर्व हमें यह सिखाता है कि इतिहास का सम्मान करते हुए भी भविष्य की ओर बढ़ा जा सकता है। सोमनाथ की पुनर्निर्मित भव्यता आधुनिक तकनीक और प्राचीन स्थापत्य के समन्वय का उदाहरण है, जो यह दर्शाता है कि परंपरा और प्रगति विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं।
सोमनाथ पर्व का आध्यात्मिक पक्ष अंततः व्यक्ति के अंतर्मन से संवाद करता है। शिव यहां केवल बाह्य पूजा के विषय नहीं, बल्कि उस आंतरिक शांति और स्थिरता के प्रतीक हैं जिसकी खोज हर युग का मनुष्य करता आया है। पर्व के दिनों में उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ केवल सामाजिक घटना नहीं, बल्कि उस सामूहिक आकांक्षा की अभिव्यक्ति है जो जीवन के क्षणभंगुरपन के बीच किसी शाश्वत आधार की तलाश करती है।
इस प्रकार सोमनाथ पर्व एक बहुस्तरीय अनुभव है। वह इतिहास है, स्मृति है, चेतावनी है, प्रेरणा है और साधना है। वह हमें यह बताता है कि सभ्यताएँ तब तक जीवित रहती हैं, जब तक वे अपने प्रतीकों को केवल पत्थर नहीं, बल्कि चेतना में सुरक्षित रखती हैं। सोमनाथ पर्व भारतीय समाज के लिए उसी सुरक्षित चेतना का उत्सव है-एक ऐसा उत्सव जो अतीत की राख से भविष्य की ज्योति प्रज्वलित करता है। यह हर बार यह स्मरण कराता है कि नाश के बाद भी निर्माण संभव है, अंधकार के बाद भी प्रकाश पुञ्ज का प्रकाटय , संहार के कोख से सृजन प्रक्रिया का संभाव्य ही शिव हैं। चिदानन्द रूप हैं
पुरातन हैं, सनातन हैं, अविनाशी हैं ,अनादि हैं, अमिट हैं, कालातीत हैं, शब्दातीत हैं, कण - कण में व्याप्त सृष्टि के बीज हैं। आदि,मध्य ,अंत हैं। यह पर्व वस्तुतः नश्वर से ईश्वर की ओर की यात्रा की अनिर्वचनीय अनुपम अनुष्ठानिक अनुभूति है।
(लेखक भाजपा से जुड़े हैं और राजनीतिक विश्लेषक हैं)
-
Gold Silver Rate Crash: सोना ₹13,000 और चांदी ₹30,000 सस्ती, क्या यही है खरीदारी का समय? आज के ताजा रेट -
ईरान का गायब सुप्रीम लीडर! जिंदा है या सच में मर गया? मोजतबा खामेनेई क्यों नहीं आ रहा सामने, IRGC चला रहे देश? -
Love Story: बंगाल की इस खूबसूरत नेता का 7 साल तक चला चक्कर, पति है फेमस निर्माता, कहां हुई थी पहली मुलाकात? -
'मेरे साथ गलत किया', Monalisa की शादी मामले में नया मोड़, डायरेक्टर सनोज मिश्रा पर लगा सनसनीखेज आरोप -
Strait of Hormuz में आधी रात को भारतीय जहाज का किसने दिया साथ? हमले के डर से तैयार थे लाइफ राफ्ट -
Uttar Pradesh Gold Price: यूपी में आज 22K-18K सोने का भाव क्या? Lucknow समेत 9 शहरों में कितना गिरा रेट? -
Hormuz Crisis: ईरान के खिलाफ 20 मजबूत देशों ने खोला मोर्चा, दे दी बड़ी चेतावनी, अब क्या करेंगे मोजतबा खामेनेई -
बिना दर्शकों के खेला जाएगा PSL, मोहसिन नकवी ने की 2 शहरों में आयोजन की घोषणा, किस वजह से लिया यह फैसला? -
Mumbai Gold Silver Rate Today: सोना-चांदी के भाव ने फिर चौंकाया, चढ़ा या गिरा? जानें यहां -
Donald Trump PC Highlights: '48 घंटे के अंदर खोलो Hormuz वरना तबाह कर दूंगा', ट्रंप ने दी ईरान को धमकी -
विराट ने मांगा प्राइवेट जेट? क्या RCB के हर मैच के बाद जाएंगे वापस लंदन? खुद सामने आकर किया बड़ा खुलासा -
Rupali Chakankar कौन हैं? दुष्कर्म के आरोपी ज्योतिषी के कहने पर काट ली थी उंगली! संभाल रहीं थीं महिला आयोग












Click it and Unblock the Notifications