Shiv Sena Case: विधायक की सदस्यता पर फैसले का अधिकार स्पीकर का

अगर SC खुद फैसला लेकर शिवसेना के 16 MLAs की सदस्यता समाप्त कर देता है, तो SC के उस फैसले को शिंदे गुट, महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार 7 सदस्यीय कांस्टीट्यूशन बेंच में चुनौती दे सकती है, क्योंकि ये अधिकार स्पीकर को है।

Shiv Sena Case Speakers right to decide on membership of MLA

एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बने दस महीने हो गए। इस बीच शिवसेना पर भी शिंदे का कब्जा हो गया। उद्धव ठाकरे के हाथ में न सरकार रही, न पार्टी। लेकिन कई बार राजनीति में चमत्कार हो जाता है। ऐसा उलट पुलट हो जाता है, जिसकी हम कल्पना ही नहीं कर रहे होते। छोटे छोटे तीन उदाहरण देता हूँ, जिससे आप को समझने में आसानी रहेगी कि कोई मुख्यमंत्री कैसे दुबारा बहाल हो सकता है। इन तीनों उदाहरणों में कोर्ट ने बर्खास्त मुख्यमंत्री को दुबारा कुर्सी दिलाई थी। ऐसे और भी बहुत उदाहरण हैं, लेकिन सिर्फ तीन उदाहरण काफी हैं।

पहला उदाहरण उत्तर प्रदेश का है। बात 1998 की है। उतर प्रदेश में एक लोकतांत्रिक कांग्रेस बनी थी, जिसने भाजपा की कल्याण सिंह सरकार को समर्थन दिया हुआ था, बल्कि सरकार में शामिल भी थी। जनता दल भी कल्याण सरकार में शामिल था। इन दोनों दलों के कुछ विधायकों ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। राज्यपाल रोमेश भंडारी ने रातोंरात कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त करके लोकतांत्रिक कांग्रेस के जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। अगले ही दिन हाईकोर्ट ने अनोखा फैसला किया, उसने कल्याण सिंह और जगदम्बिका पाल में मुकाबला करवा दिया। कल्याण सिंह को 215 वोट मिले और जगदम्बिका पाल को 196, इस तरह 72 घंटे बाद कल्याण सिंह फिर मुख्यमंत्री बन गए।

Shiv Sena Case Speakers right to decide on membership of MLA

दूसरा उदाहरण। बात 2016 की है। 60 सदस्यों वाली अरुणाचल विधानसभा में कांग्रेस के 47 विधायक थे, इनमें से 21 ने बगावत कर दी। स्पीकर ने 14 विधायकों को बर्खास्त कर दिया, उसके बाद कांग्रेस के पास बहुमत बन गया था। लेकिन इस दलबदल की स्थिति में मुख्यमंत्री नाबाम टुकी विधानसभा सत्र नहीं बुला सके, जोकि छह महीने के अंतराल में होना जरूरी होता है। इसी को आधार बनाकर राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन लागू करवा दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के दखल से राष्ट्रपति शासन हटाया गया, और नाबाम टुकी ने दुबारा मुख्यमंत्री की शपथ ली।

तीसरा उदाहरण भी 2016 का ही है। उतराखंड में कांग्रेस के 9 विधायकों ने हरीश रावत सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। विरोध बजट पास करवाने की प्रक्रिया पर था। राज्यपाल के.के. पाल ने मुख्यमंत्री हरीश रावत को बहुमत साबित करने को कहा था, लेकिन निर्धारित तारीख से एक दिन पहले राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। सुप्रीमकोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में 10 मई 2016 को ढाई घंटे के लिए राष्ट्रपति शासन हटा कर हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए कहा। स्पीकर ने बागी विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया था, वे वोट नहीं कर सके। सदन की संख्या घट गई थी, हरीश रावत ने इन ढाई घंटों में अपना बहुमत साबित कर दिया, तो सुप्रीमकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन हटा कर हरीश रावत के दुबारा मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ़ किया था।

तो इस तरह तीन मुख्यमंत्री बर्खास्त होने के बाद कोर्ट के दखल से दुबारा मुख्यमंत्री बने। वैसे उदाहरण और भी हैं। अब अपन महाराष्ट्र पर वापस आते हैं। जून 2022 में एकनाथ शिंदे 11 विधायकों के साथ बागी हो कर सूरत चले गए थे। वहां से वे गुवाहाटी चले गए, जहां उनके साथ चार और विधायक पहुंच गए थे। उद्धव ठाकरे सरकार ने इन 16 विधायकों की सदस्यता खत्म करने की अर्जी डिप्टी स्पीकर को दी थी, स्पीकर का पद खाली था। डिप्टी स्पीकर ने उन 16 विधायकों को नोटिस जारी कर दिया, तो वे सभी 16 विधायक सुप्रीमकोर्ट चले गए थे, सुप्रीमकोर्ट ने डिप्टी स्पीकर को फैसले करने से रोक दिया था। इस बीच एक एक कर 19 और विधायक बागी हो कर गुवाहाटी पहुंच गए थे।

लेकिन इस बीच एक घटना और हो गई। वह यह थी कि शिंदे गुट के 39 विधायकों और चार निर्दलीय विधायकों ने राज्यपाल को अर्जी दी कि उद्धव सरकार को बहुमत साबित करने के लिए कहा जाए। राज्यपाल ने उद्धव ठाकरे को बहुमत साबित करने के लिए कह दिया। उद्धव ठाकरे ने राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन सुप्रीमकोर्ट से उन्हें कोई राहत नहीं मिली, तो दबाव में आए उद्धव ठाकरे ने खुद ही इस्तीफा दे दिया।

16 विधायकों की बर्खास्तगी का मामला तब से सुप्रीमकोर्ट में चल रहा है। इसकी सुनवाई के दौरान सुप्रीमकोर्ट ने एक टिप्पणी यह भी की थी कि वह उद्धव ठाकरे का पद बहाल नहीं कर सकती, क्योंकि उन्होंने खुद इस्तीफा दिया था। इसका मतलब यह निकलता है उन का मामला यूपी, अरुणाचल और उतराखंड जैसा ही था, इन तीनों जगहों पर मुख्यमंत्री दुबारा बहाल हुए थे। अगर राज्यपाल ने उन्हें बर्खास्त किया होता, तो उनके दुबारा बहाल होने के चांस थे।

लेकिन अब क्या होगा? आम तौर पर धारणा यह बनाई गई है कि सुप्रीमकोर्ट उन 16 विधायकों की सदस्यता समाप्त कर देगी। हालांकि सुप्रीमकोर्ट कुछ भी कर सकती है, जैसे उसने ढाई घंटे के लिए उत्तराखंड विधानसभा बहाल कर दी थी। लेकिन दलबदल क़ानून में विधायकों की सदस्यता पर फैसला करने का अधिकार स्पीकर का है।

सुप्रीमकोर्ट स्पीकर के फैसले की समीक्षा कर सकती है। सुप्रीमकोर्ट ने नए स्पीकर राहुल नार्वेकर को भी 16 विधायकों पर फैसला करने से रोक दिया था। अगर सुप्रीमकोर्ट अब स्पीकर को फैसला करने को कहेगी, तो इस समय स्पीकर भाजपा के राहुल नार्वेकर हैं। जो केसरीनाथ त्रिपाठी की तरह दलबदल को क्रमबद्ध बता कर उनकी बर्खास्तगी की अर्जी को खारिज कर देंगे।

उत्तर प्रदेश का यह मामला भी बड़ा दिलचस्प है, 2002 में भाजपा के समर्थन से मायावती की सरकार बनी थी। भाजपा के केसरीनाथ त्रिपाठी स्पीकर बनाए गए। साल भर के भीतर भाजपा-मायावती में अनबन शुरू हो गई। इसी अनबन के दौरान 26 अगस्त 2003 को एक ही दिन में तीन घटनाएं हो गई थीं। मायावती कैबिनेट ने विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी थी। उसी समय भाजपा ने समर्थन वापसी की चिठ्ठी राज्यपाल को दे दी थी। और ठीक उसी समय समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह ने सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया था।

अगले दिन बसपा के 13 विधायकों ने मुलायम सिंह को समर्थन का एलान कर दिया। मायावती ने स्पीकर को उन 13 विधायकों को बर्खास्त करने की अर्जी दी, लेकिन स्पीकर केसरीनाथ त्रिपाठी ने उस पर तब तक कोई फैसला नहीं किया, जब तक बसपा के 24 और विधायक बागी नहीं हुए। जैसी ही वह संख्या 37 हो गई, केसरीनाथ त्रिपाठी ने उन्हें अलग दल की मान्यता दे दी। उस समय किसी पार्टी के एक तिहाई निर्वाचित विधायकों या सांसदों के अलग होने पर अलग गुट की मान्यता का कानून था।

बिलकुल वही स्थिति महाराष्ट्र में हुई। पहले शिवसेना के 16 विधायक टूटे, जिनकी सदस्यता रद्द करने की अर्जी दी गई थी। फिर वह संख्या 39 हो गई, जो संशोधित दलबदल क़ानून के मुताबिक़ दो तिहाई बनती थी। एकनाथ शिंदे सरकार बनते ही नए भाजपाई स्पीकर ने शिंदे को विधायक दल के नेता की और शिंदे गुट को असली शिवसेना की मान्यता दे दी। लेकिन उसके बाद जो उत्तर प्रदेश में हुआ था, वही स्थिति अब महाराष्ट्र में भी बन रही है।

उत्तर प्रदेश के मामले में सुप्रीमकोर्ट ने स्पीकर के फैसले को गलत बताते हुए 13 बसपा विधायकों की सदस्यता समाप्त कर दी थी। महाराष्ट्र के मामले में एक पेच है। स्पीकर ने अभी 16 विधायकों पर फैसला नहीं किया है। दलबदल विरोधी क़ानून में यह अधिकार स्पीकर को है। इसलिए ज्यादा संभावना यही है सुप्रीमकोर्ट ने अब तक स्पीकर पर फैसला लेने की जो रोक लगाई हुई थी, उसे हटाने का निर्णय कोर्ट करेगा।

स्पीकर अगर उन 16 विधायकों की सदस्यता रद्द नहीं करते, तो उद्धव ठाकरे को फिर सुप्रीमकोर्ट जाना पड़ेगा। तब तक विधानसभा की अवधि समाप्त हो जाएगी, जैसे बसपा के 13 विधायकों की सदस्यता रद्द करने का फैसला 2007 में उत्तर प्रदेश विधानसभा का कार्यकाल खत्म होने के बाद आया था। लेकिन अगर सुप्रीमकोर्ट खुद फैसला लेकर शिवसेना के 16 विधायकों की सदस्यता समाप्त कर देता है, तो सुप्रीमकोर्ट के उस फैसले को शिंदे गुट, महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार सात सदस्यीय कांस्टीट्यूशन बेंच में चुनौती दे सकती है, क्योंकि क़ानून में यह अधिकार स्पीकर का है। वैसे एक अटकल यह भी है कि सुप्रीमकोर्ट की सुनवाई कर रही पांच सदस्यीय बेंच खुद ही केस की सुनवाई सात जजों की संवैधानिक बेंच को सौंप दे। लेकिन सबसे ज्यादा संभावना स्पीकर पर फैसला छोड़ने की बनती है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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