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Sharad Pawar: महाराष्ट्र में फेल क्यों हो गया पॉलिटिक्स का पॉवर हाउस?

Sharad Pawar: महाराष्ट्र में शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने खुद को एनसीपी का अध्यक्ष घोषित कर दिया है और पार्टी के संस्थापक और निवर्तमान अध्यक्ष शरद पवार को पद से हटा कर अपने नए दफ्तर में उनको तस्वीर में टांग दिया है। इस बगावत से चाचा शरद पवार की पार्टी एनसीपी टूट गई है, और शरद पवार चाहे जितना मना करें लेकिन उन पर इस टूट का गहरा असर हुआ है। वरना, कभी अपने बेहद लाडले रहे भतीजे अजित को लगभग बौखलाहट जैसी बेचैनी में पवार उनका नाश होने के श्राप की मुद्रा में यह चेतावनी तो कतई नहीं देते कि बीजेपी अपने सहयोगियों का विनाश सुनिश्चित करती है।

इस सबके बीच, बीजेपी की बिसात बिछ रही है और महाराष्ट्र में उसकी जीत के नए समीकरण सज रहे हैं। अजित की बगावत, शरद पवार की सांसत और एनसीपी में टूट की इस ताजा तस्वीर के जरिए बीजेपी ने अगले लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र से ज्यादा से ज्यादा सीटें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झोली में डालने का इंतजाम कर लिया है। इसके साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से उनका स्वागत करवा भी लिया है।

Sharad Pawar: Why did the powerhouse of politics fail in Maharashtra?

लेकिन दाग़दार लोगों के जरिये देश की सत्ता का रास्ता आसान करने और प्रदेश की अपनी सरकार को मजबूत करने की जुगत बीजेपी के लिए कितनी शुचितापूर्ण है, यह सबसे बड़ा सवाल है। सवाल यह भी कि क्या अब एनसीपी से आए सभी नेताओं के खिलाफ जांच बंद हो जाएगी या रोक दी जाएगी? इन सवालों से एक सवाल और निकलता है, जो यह है कि क्या वास्तव में बीजेपी का चाल, चेहरा और चरित्र बदल चुका है? सियासत में सुलगते ये सवाल काफी मुश्किल हैं और जवाब उससे भी ज्यादा मुश्किल।

लेकिन समीकरणों के बदले हुए सिद्धांतों की सियासत शरद पवार को अपने शिकंजे में ले रही है, यह जमाना देख रहा है। जमाना यह भी देख रहा है कि देश की राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले शरद पवार के पैरों के नीचे से जमीन कैसे अचानक खिसक गई और यह भी कि कैसे वे अपने ही बयानों से कमजोर साबित होते जा रहे हैं। पवार को दो दिन पहले तक देश की राजनीति का पॉवर हाउस माना जाता था, लेकिन उनकी पार्टी की टूट ने साबित कर दिया है कि पवार का पॉवर कमजोर हो गया है। तो, क्या सचमुच वे कमजोर हो गए हैं, और राष्ट्रीय स्तर पर उनके ताकतवर होने का छलावा केवल देश का नेता बनने के लिए था। इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन शरद पवार ने अजित की बगावत के पहले ही दिन ताकतवर तेवर दिखाते हुए लगभग अट्टहास करते हुए कहा था कि वे पहले भी ऐसी बगावत देख चुके हैं, और यह कोई पहला मौका नहीं है। वे पूरे राज्य और देश का दौरा करेंगे, और फिर से पार्टी खड़ी करके दिखाएंगे। लेकिन अब यह सब करना, दावा करने जितना आसान नहीं होगा।

हालांकि राजनीति के कुछ जानकार शरद पवार के पॉवर को कमजोर नहीं मान रहे थे, लेकिन बगावत के तीसरे दिन बुधवार को एनसीपी के कुल 54 में से 33 विधायक अजित की बैठक में पहुंचे और शरद पवार के साथ केवल 13 ही दिखे। इन 13 में से भी बाद में एक विधायक अजित के साथ चला गया। बुधवार को मुंबई में साफ हो गया कि पलड़ा किसका भारी है। इसी के बाद से तीखे तेवर दिखाने के तत्काल बाद ही तेवर ढीले पड़ते भी दिख रहे हैं। शरद पवार की भाषा विनम्र हो गई है और उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि अगर अजित किसी चीज से खुश नहीं थे तो मुझसे चर्चा कर सकते थे, बातचीत से रास्ता निकालना चाहिए था। चुनाव आयोग से गुहार भी लगाई कि कोई भी अगर एनसीपी पर अपने अधिकार और निशान पर दावा करे तो आयोग उनका पक्ष भी जरूर सुनें। निराश-हताश पवार ने केंद्र सरकार व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी उनकी पार्टी को तोड़ने की बात कही है।

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सत्ता के इस खेल में जो दिखाई दे रहा है, उससे कहीं अधिक छिपा हुआ है, और शरद पवार व उनकी एनसीपी के अभी समाप्त होने का सोचना दूर की कौड़ी है। सत्ता पाने के लिए, शरद पवार ने अपने जीवनकाल में कई राजनीतिक कलाबाजियां अपनाई हैं और कई रणनीतियों के वे मास्टरमाइंड रहे हैं। इसलिए बीजेपी के बलबूते पर अजित पवार की बगावत शरद पवार से उनकी राजनीतिक शक्ति और पार्टी की कमान तो छीन सकती है, लेकिन लोगों के दिलों में जो सम्मान है, वो कम नहीं होगा।

शरद पवार केवल राजनीति में ही नहीं है, वे क्रिकेट में भी व्याप्त रहे हैं, तो कॉपरेटिव कारोबारियों के भी शिखर पर हैं। भारत में सबसे ज्यादा प्रभावशाली संपर्को वाले राजनेता तो वे घोषित रूप में हैं ही, विपक्षी एकता की आधी - अधूरी धुरी भी वे बने हुए हैं, लेकिन घर की ताजा टूटन ने पवार को भीतर से तोड़ दिया है। इसलिए शरद पवार भले ही कहते रहें कि पार्टी को फिर से खड़ा कर देंगे, लेकिन अब 82 साल की उम्र में यह सब इतना आसान भी नहीं है।

अजित के नेतृत्व में छगन भुजबल, प्रफुल्ल पटेल, दिलीप वलसे पाटिल, सुनील तटकरे जैसे सबसे प्रभावी, और क्षमतावान नेता उनका साथ छोड़ चुके हैं। फिर, शारीरिक रूप से कमजोर होते जा रहे पवार इन सबके दूर चले जाने से मन से भी कमजोर तो हो ही जाएंगे। पार्टी व उसके चुनाव चिन्ह पर दावा अजित पवार ने कर ही दिया है। पार्टी पदाधिकारियों की नये सिरे से नियुक्ति भी शुरु हो गयी है और अजित पवार ने सरकारी बैठकों में हिस्सा लेना शुरु कर दिया है।

शरद पवार आगे क्या करेंगे यह तो वही जानें लेकिन उनके सामने कुछ करने के अवसर बहुत सीमित होते जा रहे हैं। अगर वह कुछ अप्रत्याशित करेंगे तो वह अप्रत्याशित क्या होगा, ये तो समय बतायेगा लेकिन इतना तो कह ही सकते हैं कि शरद पवार के राजनीतिक जीवन में विश्वसनीयता का जो संकट सदा से उनके साथ रहा, वही अंत समय में भी हावी हो गया। स्वयं के अलावा पवार राजनीति में किसी पर विश्वास नहीं करते, लेकिन यह भी सच्चाई है कि पवार खुद यह जानते हैं कि उन पर भी कोई विश्वास नहीं करता।

अब से पहले हर बार वे विश्वास का संकट होने पर अपनी ताकत के बूते पर उबरते रहे, कभी जन बल तो कभी धन बल और कभी भावनाओं के बल पर। लेकिन विश्वास का यही संकट अब उनकी पार्टी के पराभव का कारण बन गया। आज शरद पवार बेहद कमजोर हालत में सबके सामने हैं, तो इसलिए क्योंकि शरद पवार कभी विश्वसनीय नहीं रहे, अपने साथ वालों के लिए भी और विरोधियों के लिए भी।

लेकिन हर कोई यह बात पूरे विश्वास के साथ कहता है कि शरद पवार ज्यादा वक्त सत्ता से दूर नहीं रह सकते। माना जाता है कि पवार के बारे में कोई भी दावे के साथ कुछ भी नहीं कह सकता, उनके राजनीतिक आचरण के बारे में भी आशंकाएं सदा रही हैं, और वे कब किसके साथ होंगे, कोई भी उनके बारे में पक्के तौर पर आज तक नहीं जान पाया। शरद पवार सदा से ही, होने और न होने के बीच की संभावनाओं में खेलते रहे हैं, लेकिन अंत में अपने उसी खेल के शिकार भी हो गए हैं। इससे निकलना अब उनके लिए संभव नहीं दिख रहा है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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