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Sardar Patel on China: पटेल की चीन नीति और नेहरू की अनदेखी

Sardar Patel on China: आधुनिक भारतीय इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज सरदार वल्लभ भाई पटेल ऐसी हस्ती हैं, जिनके बिना भारत के मौजूदा इतिहास, आधुनिक राष्ट्र और राष्ट्रवादी सोच की कल्पना नहीं की जा सकती। सांस्कृतिक एकता की परंपरा वाले भारत को आधुनिक यूरोपीय नजरिए से नया राष्ट्र बनाने और उसे जन-जन में स्वीकार्य बनाने में सरदार पटेल का योगदान विशेष है।

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सरदार पटेल हाल के दिनों में विशेष रूप से चर्चा में हैं। नेहरू से चौदह साल बड़े और गांधी से महज छह साल छोटे वल्लभ भाई पटेल को सरदार की उपाधि पहली बार बारडोली के सत्याग्रह के बाद मिली थी। दिलचस्प यह है कि यह उपाधि भी बारडोली की सत्याग्रही महिलाओं ने दी थी।

यह सच है कि स्वाधीनता आंदोलन में गांधी जी ने सत्याग्रह की अवधारणा दी, लेकिन उसका पहली बार सफल परीक्षण पटेल ने बारडोली के सत्याग्रह में किया, जिसके आगे अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा। इसके बाद गांधी जी को भी लिखना पड़ा था कि वल्लभ भाई सिर्फ बारडोली के ही नहीं, मेरे भी सरदार हैं।

सरदार पटेल के चट्टानी व्यक्तित्व की विशेषता तत्कालीन भारतीय राजनीति भी समझती थी। सरदार पटेल ना सिर्फ मजबूत व्यक्तित्व के धनी थे, बल्कि वे अच्छे संगठनकर्ता भी थे। यही बात है कि सरदार पटेल गांधी के बाद कांग्रेस के सबसे महत्वपूर्ण नेता थे।

पटेल बहुत दूरदर्शी थे। उन्होंने चीन को लेकर जो चेतावनी दी थी, उसे तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने पूरी तरह नजरंदाज किया। तब प्रधानमंत्री नेहरू को अपने पंचशील सिद्धांत पर पूरा भरोसा था। इसकी वजह से उन्होंने सरदार पटेल की चेतावनी को किनारे रख दिया।

चीन की साम्राज्यवादी नीति को आजादी के तुरंत बाद ही पटेल समझ गए थे। उनकी यह समझ 7 नवंबर 1950 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को लिखे पत्र में स्पष्ट होती है। इस पत्र में पटेल ने चीन से रिश्तों के मसले पर विचार के लिए प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से कैबिनेट की बैठक बुलाने को कहा था।

इस पत्र में उन्होंने भारत सरकार को चीन से सतर्क रहने की चेतावनी भी दी थी। लेकिन विश्व नेता बनने का सपना देख रहे नेहरू को पटेल की चेतावनी से ज्यादा अपने पंचशील के सिद्धांत पर कहीं ज्यादा भरोसा था। लिहाजा उन्होंने पटेल की उस चेतावनी को अनसुना कर दिया।

दुर्भाग्यवश इस पत्र को लिखने के करीब सवा महीने बाद ही पटेल का देहांत हो गया। इसके बाद तो नेहरू को कोई टोकने वाला वरिष्ठ नेता ही नहीं बचा।

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बहरहाल हमें यह भी जानना चाहिए कि उस पत्र में पटेल ने क्या लिखा था। पटेल ने लिखा था, 'चीनी सरकार ने शांतिपूर्ण इरादों की अपनी घोषणाओं से हमें भुलावे में डालने का प्रयत्न किया है। मेरी अपनी भावना तो यह है कि किसी नाजुक क्षण में चीनी सरकार ने हमारे राजदूत में तिब्बत की समस्या को शांतिपूर्ण उपायों से हल करने की अपनी तथाकथित इच्छा में विश्वास रखने की झूठी भावना उत्पन्न कर दी। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि चीनी सरकार अपना सारा ध्यान तिब्बत पर आक्रमण करने की योजना पर केंद्रित कर रही होगी। मेरी राय में चीनियों का अंतिम कदम विश्वासघात से जरा भी कम नहीं है। करुणता तो यह है कि तिब्बतियों ने हम पर भरोसा रखा और हमारे मार्गदर्शन में चलना पसंद किया और हम उन्हें चीनी कूटनीति के जाल से बाहर निकालने में असमर्थ रहे। हम तो चीन को अपना मित्र मानते हैं, परंतु वे हमें अपना मित्र नहीं मानते।'

इस पत्र में आए दो संदर्भों का जिक्र करना जरूरी होगा, जिन्हें सामान्य जनमानस कम ही जानता है। दरअसल चीन ने 1949 में कम्युनिस्ट क्रांति के अगले ही साल 1950 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया। अतीत में चीन की सरकार ने तिब्बत के साथ 17 समझौते किए थे। लेकिन साल 1950 में उसने तिब्बत के साथ हुए सभी 17 समझौतों को धता बताते हुए तिब्बत की परंपरागत व्यवस्था को कुचलना शुरू कर दिया था।

सरदार पटेल को इसकी जानकारी थी। तभी उन्होंने नेहरू को चीन से बढ़ते खतरे से चेताया था। बहरहाल चीन की विध्वंसक कार्रवाइयों के चलते तिब्बत के खंपा लोगों ने चीनी साम्राज्यवाद का विरोध करना शुरू कर दिया था। लेकिन चीन इससे आगे बढ़ गया। उसने तिब्बती विरोध को दरकिनार करते हुए तिब्बत को अपना क्षेत्र बताना शुरू कर दिया।

आधुनिक भारतीय इतिहास का एक काला सच तिब्बत से भी जुड़ा है। तिब्बत को चीन ने अपना हिस्सा बताया और पंडित नेहरू ने साल 1950 के आसपास ही उसे सैद्धांतिक मान्यता दे दी थी। पटेल की नेहरू को चेतावनी और कैबिनेट बैठक की मांग का भी संदर्भ यही था।

पटेल ने अपने पत्र में जिस राजदूत का जिक्र किया है, वे थे इतिहासकार के एम पणिक्कर। आजादी के फौरन बाद पंडित नेहरू ने उन्हें चीन में भारत का राजदूत बनाया था। चूंकि नेहरू चीन से बेहतर ताल्लुक रखना चाहते थे, लिहाजा उन्होंने पणिक्कर को चीन के क्रांतिकारी नेता माओत्से तुंग से मिलने के लिए भेजा।

पणिक्कर ने इस मुलाकात के बाद जो रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजी, वह कुछ यूं थी- 'मिस्टर चेयरमैन ( माओत्से तुंग) का चेहरा बहुत कृपालु है और उनकी आंखों से तो जैसे उदारता टपकती है। उनके हाव-भाव कोमलतापूर्ण हैं। उनका नजरिया दार्शनिकों वाला है और उनकी छोटी-छोटी आंखें स्वप्निल-सी जान पड़ती हैं। चीन का यह नेता जाने कितने संघर्षों में तपकर यहां तक पहुंचा है, फिर भी उनके भीतर किसी तरह का रूखापन नहीं है। प्रधानमंत्री महोदय, मुझे तो उनको देखकर आपकी याद आई ! वे भी आप ही की तरह गहरे अर्थों में मानवतावादी हैं !'

पटेल ने अपनी इस चिट्ठी के जरिए भारतीय राजदूत के खिलाफ क्रोध भी जाहिर किया था। उन्होंने साफ संकेत दिया था कि चीन सरकार ने हमारे राजदूत को एक तरह से मूर्ख बनाया है। यह बात और है कि प्रधानमंत्री नेहरू इस तथ्य को समझ नहीं पाए। जिसका असर पटेल के निधन के ठीक बारह साल बाद दिखा, जब बीस अक्टूबर 1962 को चीन की साम्राज्यवादी सेनाओं ने भारतीय सीमाओं में हमला कर दिया। जिसमें भारत की ना सिर्फ बुरी पराजय हुई, बल्कि उसे युद्ध से बचाने के लिए उस अमेरिका से कातर भाव से मदद मांगनी पड़ी, जिससे प्रधानमंत्री नेहरू दूरी बना रहे थे।

उन्होंने तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी को जो चिट्ठी भेजी,उसकी भाषा इतनी कातर थी कि उसे राष्ट्रपति तक पहुंचाने में अमेरिका में भारत के तत्कालीन राजदूत बी के नेहरू, जो नेहरू के दूर के भतीजे भी थे, को भी हिचक हो रही थी। खैर, सरदार पटेल की दूरदर्शिता को दरकिनार करना न केवल नेहरू, बल्कि पूरे भारत को भारी पड़ा, और उसका दुष्परिणाम आज तक दिख रहा है।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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