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Sardar Vallabhbhai Patel Birthday: बैरिस्टर वल्लभभाई के सरदार पटेल बनने का सफर

Sardar Vallabhbhai Patel Birthday: वर्तमान गुजरात राज्य का खेड़ा जिला स्वतंत्रता से पहले बॉम्बे प्रेसिडेन्सी का हिस्सा होता था। इसी खेड़ा जिले के नडियाड में 31 अक्टूबर 1875 को झवेरभाई पटेल के घर सबसे छोटी संतान के रूप में वल्लभभाई पटेल का जन्म हुआ था। वल्लभभाई के तीन बड़े भाई थे। सोमाभाई, नरसीभाई और विट्ठलभाई। वल्लभभाई ने लंदन से वकालत की पढाई की थी और लौटकर अहमदाबाद में वकालत करने लगे थे।

Sardar Vallabhbhai Patel Birthday special Journey of Barrister Vallabhbhai to become Sardar Patel

वल्लभ भाई पटेल को कांग्रेस में लाने वाले महात्मा गांधी थे। महात्मा गांधी से मिलने से पहले वल्लभ भाई पटेल अंग्रेजी कपड़ों के शौकीन, फौजदारी की वकालत मे खूब पैसा कमाने की इच्छा रखने वाले और अपनी शामें गुजरात क्लब में ब्रिज खेलते हुए बिताते थे।
1916 में गांधी से वल्लभभाई पटेल का संपर्क नहीं हुआ होता तो पटेल भी जिन्ना जैसी अभिजात्य और पश्चिमी रहन सहन वाली शैली में ढल चुके होते। गांधी जी ने बाद में कई मौकों पर याद किया कि वल्लभ भाई उन दिनों पश्चिमी पोशाक पहनते थे और पश्चिमी तौर तरीकों के प्रशंसक थे।

गांधीजी के व्यक्तित्व ने वल्लभभाई पर बेहद प्रभाव डाला। गांधी से मिलने के बाद वल्लभभाई में राजनीतिक और सामाजिक चेतना जागी। गांधी के कारण ही बैरिस्टर वल्लभभाई पटेल सरदार पटेल में परिवर्तित हुए।

1918 में खेड़ा सत्याग्रह से शुरूआत करने वाले वल्लभ भाई पटेल ने 1928 में अपने दम पर बारडोली के सफल सत्याग्रह का संगठन किया और जिसने उन्हे बारडोली का ही नहीं सारे भारत का सरदार बना दिया और यह शब्द उनके नाम के साथ साथ व्यक्तित्व का अभिन्न भाग बन गया। पटेल ने जीवनभर बापू की इच्छा का मान रखा।

बापू के कहने के कारण ही पटेल ने 1929 और 1936 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली थी। निष्ठा, त्याग और उदारता पटेल के व्यक्तित्व में थी।

वल्लभभाई की शादी उस समय के रिवाज अनुसार छोटी उम्र में ही हो गई थी। उनके दो बच्चे थे। बड़ी लड़की मणिबेन थी, जिसने अविवाहित रहकर पिता की देखभाल में अपने को समर्पित कर दिया था। मणिबेन से छोटे दाह्याभाई थे। बाद में दाह्याभाई स्वतंत्र पार्टी से राज्यसभा में थे।

वल्लभभाई ने कभी भी अपने बच्चों को राष्ट्र को थोपने की कोशिश नहीं की। नेहरू वंश के परिवारवाद से वे सर्वथा मुक्त थे। इसमें वे लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी की परंपरा पर चले। उनकी पत्नी और बड़े भाई की पत्नी के बीच प्राय: अनबन रहती थी। इसलिए वल्लभभाई ने अपनी पत्नी को विट्ठल भाई के विदेश में रहने के दौरान अपने मायके में रहने के लिए भेज दिया था। दुर्भाग्य से वहां उनकी पत्नी बीमार पड़ गईं और जनवरी 1909 में उनकी मृत्यु हो गई।

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वल्लभभाई को पत्नी की मृत्यु का समाचार जब मिला उस समय वह एक महत्वपूर्ण मुकदमें में जिरह कर रहे थे। उन्होंने अपने मन पर काबू पाकर अपना काम जारी रखा और पूरा करने के बाद पत्नी का अंतिम संस्कार करने के लिए चले गए।

पत्नी की मृत्यु के समय वल्लभभाई 34 साल के थे। लेकिन उन्होंने दूसरा विवाह जीवनभर नहीं किया और जीवन भर अकेले रहे। महात्मा गांधी के निकट सहयोगी बनने के बाद तो उनके जीवन में किसी तरह की घरेलू निजी जिंदगी के लिए स्थान नहीं रहा था। उन्होंने अपना जीवन भारत की आजादी के लिए समर्पित कर दिया।

महात्मा गांधी सबसे ज्यादा भरोसा जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल पर करते थे। कांग्रेस गांधी के पूरे प्रभाव और नियंत्रण में थी और कांग्रेस का संगठन वल्लभभाई पटेल के प्रभाव और नियंत्रण में था। कांग्रेस में समाजवादी गुट की धुरी नेहरू और दक्षिणपंथी गुट की धुरी सरदार पटेल थे। गांधी के नैतिक समर्थन के कारण कांग्रेस के अंदर पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस का दक्षिणपंथी गुट हमेशा मजबूत रहा और इस कारण कांग्रेस संगठन में पटेल का वर्चस्व रहा।

गांधी और विश्वासपात्र पटेल गुट, कांग्रेस तथा उसकी राजनीति को संचालित और नियंत्रित करता था। पटेल ने एक क्षण के लिए भी कांग्रेस संगठन पर नियंत्रण नहीं खोया। इस कारण जब तक पटेल ज़िंदा रहे नेहरू तमाम कोशिशों के बाद भी कांग्रेस कार्यसमिति में एक भी समाजवादी रूझान का प्रस्ताव पास नहीं करा सके।

नेहरू जहां अपनी धर्मनिरपेक्ष, उदारवादी, अंतरराष्ट्रीय, समाजवादी और अहिंसक छवि को सदैव प्राथमिकता देते थे और उसे सुरक्षित रखने के प्रति सतर्क रहते थे, पटेल इससे निरपेक्ष होकर राष्ट्रहित की दृष्टि से निर्णय लेकर रणनीति तय करते थे। यही कारण था कि आजादी के तत्काल बाद के वर्षो में, नेहरूवादियों के हाथों पटेल उस गलत छवि और प्रचार के आसानी से शिकार हो गए जैसा वह मूलत: कभी नहीं थे।

सरदार पटेल को भारतीय मुसलमानों से कोई शिकायत नहीं थी। पटेल जब भी मुसलमानों के विरोध में बोले तो वह पृथकतावादी लीगी मुसलमानों के लिए ही। दिल्ली के पहला चीफ पुलिस कमिश्नर खुर्शीद अहमद खान थे, जिनकी नियुक्ति पटेल ने की थी। पटेल नेहरू को व्यंगात्मक रूप से कांग्रेस का सबसे बड़ा राष्ट्रवादी मुसलमान कहते थे। अंतरंग मित्रों में नेहरू को मौलाना नेहरू कहते थे। मौलाना आजाद, रफी अहमद किदवई, शेख अब्दुल्ला, डॉ सैयद महमूद, आसफ अली सदैव नेहरू के साथ थे। पटेल के साथ नहीं। पटेल को मुसलमानों का विश्वास कभी प्राप्त नहीं हुआ और इसकी उन्होंने चिंता भी नहीं की।

गांधी की हत्या ने पटेल को अन्दर से बुरी तरह क्षत विक्षत कर दिया था। पटेल जीवन भर गांधी के सबसे मजबूत सिपाहियों में रहे थे। उन्होंने गांधी का साथ कभी नहीं छोड़ा। नेहरू ने आत्मकथा में लिखा है कि 'शायद गांधीजी का वल्लभ भाई से ज्यादा सच्चा भक्त हिन्दुस्तान भर में कोई दूसरा नहीं होगा। अपने काम में वह कितने ही कड़े और मजबूत क्यों न हो, लेकिन गांधी जी के आदर्शो, उनकी नीति और उनके व्यक्तित्व के प्रति उनकी बड़ी भक्ति है।'

गांधी की हत्या ने सरदार पटेल के पूरे व्यक्तित्व को बदल डाला। यह बोझ पटेल के सीने पर हमेशा लदा रहा कि उनके गृहमंत्री होते हुए उनके बापू की हत्या हुई है। पटेल के अत्यंत निकट के लोग गांधी के हत्या के बाद पटेल के जीवन में पैदा हुए शून्य, एकाकीपन और दुख को महसूस कर रहे थे।

पटेल का हंसना बंद हो गया था। आंखों में विषाद, अकेलापन झलकता था। आयु में अचानक ज्यादा बूढे दिखने लगे थे। गांधी की मृत्यु के बाद पटेल ने गांधी के बारे में बात करना लगभग बंद कर दिया था। गांधी की मृत्यु ने पटेल की जीने की इच्छा और आयु दोनों को कम कर दिया। गांधी की मृत्यु के बाद पटेल जब सेवाग्राम की उनकी झोपड़ी में गए तो वहां फूट फूट कर रोए थे।

पटेल, नेहरू से चौदह साल बड़े थे। गांधी की मृत्यु के बाद वह कांग्रेस और नेहरू, दोनों के लिए गांधी के स्थानापन्न संरक्षक की तरह हो गए थे। गांधी की मृत्यु के बाद पटेल ने नेहरू के प्रति अपना पूरा दृष्टिकोण बदल दिया। अपने निकटतम मित्रों के बीच वह हमेशा कहने लगे थे कि मैं कभी नही भूल सकता हूं कि जवाहर बापू के चुने हुए हैं।

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    गांधी की मृत्यु का एक सकारात्मक परिणाम यह रहा कि इसने पटेल और नेहरू के बीच के संबंधों के गहरे तनाव को लगभग खत्म कर दिया। गांधी की हत्या के बाद पटेल ने देश को धर्मनिरपेक्ष संविधान और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में गढ़ने में पूरा सहयोग दिया।

    यह भी पढ़ें: सरदार पटेल की जयंती : 31 अक्टूबर को गृह मंत्रालय स्पेशल ऑपरेशन मेडल-2022 की घोषणा करेगा

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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