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Sardar Patel's Contribution: क्यों भुला दी गई थी सरदार पटेल की यह भूमिका

sardar patel birthday special sardar patel contribution in Civil Service

Sardar Patel's Contribution: यह एक रोचक कहानी है कि जब देश आज़ाद हो रहा था तो गांधी, नेहरू और पटेल की चिंताएं अलग अलग तरह की थी। महात्मा गांधी ग्रामीण आधारित स्वराज व्यवस्था चाहते थे, उन के 'हिंद स्वराज' मॉडल के मुताबिक 'ग्राम पंचायतों को आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र बनाया जाना था।

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प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की चिंता दुनिया भर के देशों में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाले विदेश सेवा के अधिकारियों की ऐसी नियुक्ति करने की थी, जो भारत की छाप छोड़ पाएं। सरदार पटेल की चिंता देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए एक ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी करने की थी, ताकि देश टुकड़ों टुकड़ों में विभाजित न दिखाई दे। यह काम उन्होंने अंतरिम सरकार के गृह मंत्री बनते ही शुरू कर दिया था।

सरदार पटेल के कामों को भुला दिया गया, वरना इस देश के निर्माण में उनकी भूमिका नेहरू से कहीं ज्यादा है। सरदार पटेल ने दिन रात की मेहनत करके सिर्फ 562 रियासतों का भारत में विलय ही नहीं करवाया, बल्कि देश को एकसूत्र में बांधे रखने के लिए सिविल सेवा का एक मजबूत ढांचा भी खड़ा किया। जब देश आज़ाद होने वाला था तो बर्मा और भारत के ब्रिटिश सचिव लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस ने सितंबर 1946 में आईसीएस और आईपी में नयी नियुक्तियां बंद कर दी थीं। तब अंतरिम सरकार में गृह मंत्री सरदार पटेल ने अखिल भारतीय सेवा को जारी रखने पर विचारविमर्श करने के लिए 11 सूबों के प्रधानमंत्रियों की एक बैठक बुलाई।

इन 11 सूबों में से बंबई, बिहार, सेंट्रल प्रोविन्स, उड़ीसा, मद्रास, उतर प्रदेश, नॉर्थ वेस्ट फ़्रंटियर प्रोविन्स ने सुझाव का समर्थन किया। जबकि पंजाब, बंगाल, और सिंध ने इसे नामंजूर करते हुए प्रान्तों की अपनी सिविल सेवा शुरू करने की बात कही जबकि असम चाहता था कि केंद्र नियुक्तियां और प्रशिक्षण करे, लेकिन काडर पर नियंत्रण राज्यों का ही रहे। पटेल ने बैठक के बारे में कहा था, "आम भावना अखिल भारतीय सेवा के गठन के पक्ष में थी, और यह उम्मीद की गई कि जब योजना तैयार हो जाएगी तब जो लोग फिलहाल इसके पक्ष में नहीं हैं और मानते हैं कि नियंत्रण के बारे में राज्यों की भावनाओं का पर्याप्त ध्यान रखा जाएगा, वे भी इसमें शामिल होने के लिए तैयार हो जाएंगे।" तो आज हम जो सिविल सेवा का राष्ट्रव्यापी ढांचा देख रहे हैं, उस के पीछे सरदार पटेल की दूरदृष्टि ही थी।

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सरदार पटेल के देहांत के बाद कांग्रेस ने उन्हें पूरी तरह भुला दिया था। भाजपा की पूर्ववर्ती वाजपेयी सरकार और बाद में मोदी सरकार ने जब जब सरदार पटेल की राष्ट्रनिर्माण में भूमिका को सही रूप में पेश किया, उन्हें भुला देने वाली कांग्रेस ने हमेशा ही भाजपा पर ताना कसा कि वह नेहरू को छोटा करके दिखाने के लिए सरदार पटेल को ज्यादा प्रचारित करती है। लेकिन यह सच है कि सरदार पटेल के देहांत के तीन दशक बाद तक पटेल के बारे में किताबें और मोनोग्राफ वगैरह नाममात्र भी नहीं थे। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका को उजागर करने के कई प्रयास किए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रयास था 2014 से उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाना शुरू करना।

इसके बाद 2018 में उनके जन्मदिन पर नर्मदा के किनारे केवडिया में मोदी ने उनकी 182 मीटर ऊंची प्रतिमा का अनावरण किया, जिसे स्टेचू आफ यूनिटी का नाम दिया गया है। इसके बाद नरेंद्र मोदी ने निर्देश दिया कि लाल बहादुर शास्त्री एडिमिनिस्ट्रेशन अकादमी से ट्रेनिंग लेने वाले आईएएस, आईपीएस और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों का सेवा में शामिल होने से पहले 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की प्रतिमा पर सम्मेलन होना चाहिए। जहां वे जान सकें कि सरदार पटेल ने देश को यह सिविल सेवा किन परिस्थितियों में दी थी। 2019 को पहला सम्मेलन हुआ, लेकिन 2020 और 21 में कोविड के कारण सम्मेलन नहीं हो सका था।

इस वर्ष 28 अक्टूबर से वहां सम्मेलन हो रहा है, जिसे आज 31 अक्टूबर को सरदार पटेल के जन्मदिन पर समापन के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद संबोधित करेंगे। सम्मेलन में अकादमी के 97वें फाउंडेशन कोर्स के 443 अधिकारी शामिल हैं, जिनमें रॉयल भूटान सिविल, पुलिस, और फॉरेस्ट सर्विसेज के 11 अधिकारी भी शामिल हैं।

भारत का यह अखिल भारतीय सिविल सेवा का ढांचा सरदार पटेल के प्रयासों से ही शुरू हुआ था, इसलिए यह उचित ही है कि सभी नवनियुक्त अधिकारी सरदार पटेल के जीवन और कार्यों से प्रेरणा लें।

'स्टैच्यू ऑफ यूनिटी' के साथ बने संग्रहालय में पूर्व गृह मंत्री के जीवन और समय को बहुत अच्छी तरह से प्रदर्शित किया गया है। संग्रहालय में कुछ ऐसी दुर्लभ तस्वीरें हैं जिनमें वे आभूषणों से लदे महाराजाओं और नवाबों से अपने सादे खादी के कपड़ों में बात करते दिखाई देते हैं। इतिहास और राजनीतिक अर्थव्यवस्था में रुचि रखने वाले प्रशिक्षु अधिकारियों को यह प्रदर्शनी काफी ज्ञानवर्धक लगेगी।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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