Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की संथाल जनजाति के वीरों ने किया था अंग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह

हमारे के लिए यह आजादी का अमृत वर्ष है। हम परिपक्व हो रहे हैं। लोकतंत्र भारत पर अमृत बरसा रहा है। अंत्योदय साकार हो रहा है। आजादी की 75 वीं वर्षगांठ पर हमारे बदलाव को दुनिया विस्मित भाव से देख रही है। बड़े शहरों से दूर जंगल में रहने वाली एक जनजाति की प्रतिनिधि को हमने राष्ट्र का प्रथम नागरिक चुन लिया है।

santhal rebellion against british

वह संथाल जनजाति और ओडिशा के मयूरभंज जिला के राइरंगपुर से हैं। संथाल जनजाति का व्यापक विस्तार है। ओडिशा से असम तक के हजार किलोमीटर के दायरे में फैले गांवों के ये वाशिंदे हैं। गोत्र, भाषा और विशेष परंपराओं ने इनको आपस में जोड़े रखा है। पड़ोसी देश नेपाल, भूटान और बंगलादेश तक में संथाल जनजाति के गांव मौजूद हैं।

संथाली भाषा की लिपि के जनक पंडित रघुनाथ मूर्मू हैं। उन्होंने 1925 में प्रकृति से जुड़े प्रतीकों पर आधारित तीस वर्णमालाओं वाली संथाली लिपि 'ओलचिकी' का निर्माण किया था। संथाली के अलावा संथाल अपने अपने इलाके में बंगाली, ओड़िया और हिंदी बोलते हैं।

सम्यक लिपि के इजाद से पहले ओड़िशा के प्रभाव वाले संथाली ओड़िया लिपि में, बंगाल के संथाली बांग्ला लिपि में, असम के संथाली असमिया लिपि में, बिहार, नेपाल व भूटान के संथाली देवनागरी में और क्रिश्चयनिटी के प्रभाव वाले संथाली रोमन लिपि में संथाली लिखा करते थे। लिहाजा, संथाली भाषा का साहित्य समृद्ध है। 2003 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने संथाली भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल कर लिया।

संथाल जनजाति से संबंध रखनेवाली राष्ट्रपति मूर्मू ओडिशा की निवासी हैं। बीजेपी की नेता रहीं। 2015 में द्रौपदी मूर्मू झारखंड की राज्यपाल बनाई गई। झारखंड में उनकी प्रशासनिक क्षमता के कायलों की कमी नहीं है। वह आदिवासियों को समाज की मुख्यधारा में लाने के तेज हुए उपक्रम की मिसाल हैं। पहले भोले भाले संथालों को इस नैरेटिव के साथ बरगलाया जाता रहा कि भारत मूलत: वनवासियों का है। बाकी बाहर से आए लोग हैं। उम्मीद है कि वनवासी समाज से राष्ट्राध्यक्ष बनने के बाद संभवत यह निगेटिव नैरेटिव ही विलुप्त हो जाए।

संथाली भाषा में बाहरी लोग को 'दिक्कू' कहते है। वनवासियों में दिक्कू को चतुर चालाक बताया जाता है। सामाजिक तौर पर उनसे दूरी बनाए रखने की सलाह दी जाती है। संथाल में ब्याह को बापला कहा जाता है। संथाल समाज में बापला की कई किस्में प्रचलित है। उनमें से दंड विधान वाले बापला की एक पद्धति में दिक्कू से ब्याह रचाने अथवा प्रेम करते पकड़े जाने पर संथाल लड़की को इस 'जुर्म' की सजा भुगतनी पड़ती है। लड़की के साथ उसके समूचे परिवार को समाज और गांव से बहिष्कृत होने का कोप झेलना पड़ता है।

संथाल समाज में विलगाव की प्रचलित कोशिशों के दरम्यान कई दस्तावेज मौजूद हैं जिनसे पता चलता है कि खुद संथाल जनजाति को बाहर से लाकर संथाल परगना में बसाया गया है। अर्थात् संथाल जनजाति भी जातीय समूह का मूल स्थान से दूर दूसरे इलाके में जाकर रचने बसने की सभ्यतागत विस्तार की प्रक्रिया का हिस्सा है। तथ्य है कि ब्रिटिश इंडिया में बंगाल प्रेसीडेंसी ने बंगाल के बीरभूम से लेकर सिंहभूम तक के गांवों में फैले संथालों को राजमहल की पहाडियों में आकर गांव बसाने के लिए प्रेरित किया।

संथालों के बारे में मशहूर है कि ये पहाड़ को चीरकर खेती की जमीन बना देने वाले लोग हैं। खेती के काम आने वाला हल संथाल आदिवासियों का धार्मिक प्रतीक है। इनके रीति रिवाज और बात विचार से जुड़ी ऐसी बहुत सी बातें हैं, जो राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के साथ ही चर्चा में आनी है। इससे हमारी कई ऐतिहासिक मान्यताएं बनेंगी और सुधरेंगी।

मसलन हम पाठ्य पुस्तकों में पढ़ते आ रहे हैं कि अंग्रेजों के खिलाफ़ पहला सशक्त विद्रोह बाबू कुंवर सिंह की अगुआई में 27 अप्रैल 1857 को हुआ। दानापुर छावनी के सिपाहियों के साथ भोजपुर के युवाओं ने गुलामी के खिलाफ संघर्ष का बिगुल फूंका। भीषण संघर्ष में आरा और बलिया को आज़ाद करा लिया गया। आज़ाद इलाकों पर दोबारा कब्ज़ा जमाने में ब्रिटिश साम्राज्य को लोहे के चने चबाने पड़े। अस्सी साल के अदम्य नायक बाबू कुंवर सिंह और स्वातंत्रवीर मंगल पांडे जैसे पुरखों की गाथाओं पर सभी भारतीयों को समान रुप से नाज़ है। लेकिन उस संघर्ष को ही हम अंग्रेजी सल्तनत के खिलाफ पहला सशस्त्र विद्रोह मान लें यह भी इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।

संथाल परगना की राजनीति में तीन दशकों से सक्रिय और झारखंड मुक्ति मोर्चा की केंद्रीय समिति की सदस्य रही अमिता टूडू कहती है कि 1857 से करीब दो साल पहले 30 जून 1855 को अंग्रेजों के खिलाफ संथालों ने 'हूल' (विद्रोह) कर दिया था। संथाल 'हूल' अंग्रेज को भारत छोड़ने का भान देने वाला पहला प्रभावी सशस्त्र विद्रोह था। उसमें चार स्वातंत्र्यवीर भाईयों यानी सिद्धो, कान्हो, चांद और भैरव ने अंग्रेजी प्रशासन की चूलें हिला दी थी। भारत छोड़ो का आह्वान करते हुए सभी संथाल गांवों तक डुगडुगी की आवाज पहुंचवा दी थी।

मौजूदा संथाल परगना के राजमहल की पहाड़ियों में हजारो संथाल आदिवासियों का हुजुम उमड़ आया। भोगनाडीह पहुंचने वालों में मौजूदा बंग्लादेश के राजशाही औऱ रंगपुर डिवीजन, पड़ोसी देश नेपाल, सुदूर असम, बिहार के मुंगेर, पूर्णिया, सहरसा, दक्षिण में छोटानागपुर, सिंहभूम और पड़ोसी ओडिशा के मयूरभंज, कोकरझार आदि इलाकों के लोग शामिल थे। अभिलेखागार के दस्तावेज बताते हैं कि हजारों मील में फैले 400 से ज्यादा गांवों से संथाल आदिवासी टोलियों में दौड़ते चले आए। फिर बेहतर व्यूह रचना के साथ अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह कर दिया। विद्रोह की चिंगारी दबाने में ब्रिटिश सैनिकों के दांत खट्टे होने का विस्तृत विवरण कई अंग्रेज अधिकारियों की रिपोर्ट में दर्ज है।

दरअसल 1810 के आसपास बंगाल प्रेसीडेंसी ने गंगा के दक्षिण से लगने वाली राजमहल पहाड़ियों में शासन प्रशासन को दुरुस्त करने का फैसला लिया। पहाड़िया नेता तिलका मांझी के विद्रोह से उनको भारी नुकसान उठाना पड़ा था। सोची समझी चाल के तहत इलाके से पहाड़िया जनजाति के प्रभाव को कम करने का सिलसिला शुरु हुआ। संथालों को लाकर बसाया जाने लगा।

संथालों ने काफी मेहनत से पहाड़ की जमीन को खेती के लायक बनाया। जमीन को अपना मानकर उस पर खेती करने लगे। लेकिन जब उनसे मालगुजारी मांगी जाने लगी, प्रताड़ित किया जाने लगा, तो उनके सब्र का बांध टूट गया। संथाल भाईयों सिद्धो, कान्हो और चांद, भैरव के नेतृत्व में संथालों ने मालगुजारी नहीं देने का निर्णय लिया। अंग्रेजों ने सिपाहियों और जमींदारों के हाथों कार्रवाई तेज की तो संथालों ने एकजुटता के साथ हूल कर दिया।

30 जून 1855 को झारखंड में साहिबगंज जिला के भोगनाडीह गांव से संथालों ने "अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो" के जयघोष के साथ हूल शुरु कर दिया। संथाल क्रांतिकारियों ने अंग्रेज समर्थक कुछ जमींदारों और सिपाहियों को मार गिराया। लिहाजा विद्रोहियों को सबक सिखाने के लिए अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। तोप औऱ बंदूकों का सहारा लिया गया। जबरदस्त गोलीबारी में हजारों संथाल मारे गए।

अंग्रेजी शासकों का यह कृत्य बीते सदी में हुए जालियांवाला बाग की घटना से ज्यादा भयावह था। चांद और भैरव को अंग्रेजों ने गोली मार दी। इसके बाद सिद्धो और कान्हो को भोगनाडीह में ही पेड़ से लटकाकर 26 जुलाई 1855 को फांसी दे दी गई। इन्हीं शहीदों की याद में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। उनके लिए भोगनाडीह और पंचकठिया के शहीद स्थल का विशेष धार्मिक महत्व है। पाकुड़ में मार्टिन टावर को धरोहर के तौर पर सम्हालकर रखा गया है जहां छिपकर अंग्रेज प्रशासक और सिपाहियों ने हूल विद्रोहियों से जान बचाने की गुहार लगाई थी।

हालांकि, तब के दस्तावेज बताते हैं कि संथालों के इस बलिदान पर कोई भी अंग्रेज सिपाही ऐसा नहीं था, जो शर्मिंदा न हुआ हो। लेकिन इतिहास के कालक्रम में संथालों के इतने बड़े विद्रोह और बलिदान की कभी कोई खास चर्चा नहीं हुई। लेकिन अब जबकि उसी योद्धा समाज से द्रौपदी मुर्मु देश के सर्वोच्च प्रशासनिक पद पर पहुंच गयी हैं तो हमें उम्मीद करनी चाहिए कि ब्रिटेन ठीक उसी तरह सार्वजनिक तौर पर माफी मांगेगा जिस तरह जलियावाला कांड पर मांगी है। संथाल के वीर बलिदानियों को यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी और द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति बनने का महत्व भी संथाल समाज में चरितार्थ हो सकेगा।

यह भी पढ़ेंः अब्दुल कलाम को राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाने से पहले लंबी बहस चली थी एनडीए में

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+