• search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts
Oneindia App Download

'Sanitary Pad' को काली पन्नी से बाहर निकाल कर देखिए, इसमें छिपाने जैसा कुछ भी नहीं है

Google Oneindia News

शरीब अली हाशमी और ज्योति सेठी की फिल्म 'फुल्लू' में जब फिल्म का नायक फुल्लू दवा की दूकान पर पहली बार अपनी पत्नी के लिए सैनिटरी पैड लेने जाता है, तो वहां सोचता है कि दुकानदार सैनिटरी पैड लोगों को काली पन्नी में लपेट कर क्यों दे रहा है? क्या यह इतनी खतरनाक दवा है, जिसे खुले में देखा भी नहीं जा सकता?

Sanitary pad and womens health in india

फुल्लू के परिवार में मां, बहन और पत्नी को मिलाकर कुल तीन महिलाएं हैं, वह फिर सोचता है कि परिवार में जब तीन महिलाएं हैं फिर सिर्फ उसकी पत्नी ही सैनिटरी पैड क्यों इस्तेमाल करती है और जब कपड़े के इस्तेमाल से बाकि दोनों का काम चल जाता है फिर अलग से पत्नी के लिए सैनिटरी पैड क्यों खरीदना?

इस सवाल का जवाब फुल्लू को फिल्म में डॉक्टर से मिलता है कि सैनिटरी पैड माहवारी के दिनों में सोखने वाला एक पैड है। पैड की जगह कपड़े के इस्तेमाल से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कपड़े का इस्तेमाल करते हुए आम तौर पर साफ सफाई का ध्यान परिवारों में नहीं रहता। इस्तेमाल की दृष्टि से सैनिटरी पैड सुरक्षित है।

डॉक्टर से बात करते हुए फुल्लू के मन में एक नया सवाल आता है कि जब सैनिटरी पैड इतना जरूरी है और देश की सरकार जानती है कि देश के अंदर कितनी गरीबी है फिर सस्ते में लोगों को सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने की कोई योजना क्यों नहीं बनाती?

सैनिटरी पैड पर संवाद जरूरी

सैनिटरी पैड पर हम ईमानदारी से संवाद तक नहीं कर रहे। यही वजह होगी कि इस विषय पर भारत के अंदर कोई ढंग का शोध पत्र तक पढ़ने को नहीं मिलता। ना ही इसके बेहतर और सस्ते विकल्प पर केन्द्रित कोई विमर्श, शोध या अध्ययन मिलता है। सच्चाई तो यह है कि दस साल पहले गूगल पर यह शब्द सर्च करने पर निराशा ही हाथ लगती थी। अब कुछ खबरों की लिंक, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण द्वारा सैनिटरी पैड पर पूछे गए सवालों की चर्चा वहां मिल जाती है।

इन्हीं सालों में मैग्सेसे अवार्ड से सम्मानित गूंज के अंशु गुप्ता जैसे स्वयंसेवी लोग सामने आए और इस मुद्दे पर बात करना प्रारंभ किया। उन्होंने गूंज के माध्यम से पुराने कपड़े से सुरक्षित और सस्ता सैनिटरी पैड बनाकर ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं तक पहुंचाया है। 'फुल्लू'और 'पैडमैन' जैसी फिल्में बनी। उसके बावजूद अभी जिस तरह की जागरूकता समाज में सैनिटरी पैड को लेकर आनी चाहिए, उसका अभाव साफ दिखाई देता है।

'पैड' प्रोत्साहन नीति की जरूरत

कोविड लॉकडाउन के दौरान केन्द्र सरकार का इस दिशा में एक रुपए में सैनिटरी पैड वाला कदम उल्लेखनीय रहा। इस बीच 6300 से अधिक प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केन्द्रों में एक रुपए में सैनिटरी पैड उपलब्ध कराया गया। अगर देखा जाए तो बाजार में इसकी कीमत 7-8 रुपये प्रति पैड है। शहरी क्षेत्रों से अधिक यह समस्या ग्रामीण क्षेत्रों में है। वहां बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं जो सैनिटरी पैड पर एक रुपया खर्च करने की स्थिति में भी नहीं हैं। उन परिवारों की महिलाएं आज भी पुराने कपड़े, राख या मिट्टी का इस्तेमाल रक्त स्त्राव रोकने के लिए करती हैं। जिसमें वे संंक्रमण की शिकार भी होती हैं।

यह भी पढ़ें: Menstrual cycle: 'नहीं आज नहीं कर सकते क्योंकि मुझे....'. जानिए Periods से जुड़े ये 5 Myths

इस तकलीफ को बिहार में ग्रामीण परिवेश से आने वाली रिया ने समझा। प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र के माध्यम से ग्रामीण अंचलों तक सैनिटरी पैड पहुंचाना किसी भी सरकार के लिए कठिन काम नहीं है। वह चाहे तो परिवार में महिलाओं की संख्या के हिसाब से गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों को सरकारी राशन की दुकान के माध्यम से भी नि:शुल्क सैनिटरी नैपकिन उपलब्ध करा सकती है। रिया इस तकलीफ को समझती थी, इसलिए उसने सैनिटरी पैड पर सवाल उठाया।

अब रिया इस बात को कह रही हैं कि ''पीरियड जैसी समस्या पर खुलकर बात करनी चाहिए। पहले इस पर खुलकर चर्चा नहीं होती थी लेकिन अब हम लोगों को जागरूक बनाएंगे। घर-घर जाकर बात करेंगे कि माहवारी जैसी समस्या को छिपाकर नहीं बल्कि सैनिटरी पैड से दूर किया जा सकता है।" रिया के बहाने पूरे देश मे सैनिटरी पैड पर एक बहस प्रारंभ हुई। यह बहस कभी सिरे ना चढ़ पाती यदि रिया के साथ हरजोत कौर का सवाल-जवाब वाला वीडियो वायरल ना हुआ होता।

रिया ने एक कार्यक्रम में उनसे गरीब लड़कियों को बिहार सरकार द्वारा निशुल्क सैनिटरी पैड उपलब्ध कराए जाने से जुड़ा सवाल पूछा था। इसका जवाब देते हुए विकास निगम की एमडी आईएएस हरजोत कौर नाराज हो गईं और कहा- "इस तरह की मांग का कोई अंत नहीं है। यह कभी खत्म नहीं होती। आज फ्री सैनिटरी पैड की मांग की जा रही है। कल को जीन्स और फिर निरोध भी फ्री देना होगा।"

संभव है कि उन्होंने यह सब 'रेवड़ी संस्कृति' के विरोध में कहा हो लेकिन समाज में हाशिए पर मौजूद समाज की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करना रेवड़ी संस्कृति को पोषित करना नहीं है।

शिक्षा, स्वास्थ्य नि:शुल्क तो सैनिटरी पैड पर शुल्क क्यों?

देशभर में सरकारी अस्पताल, सरकारी स्कूल के माध्यम से निशुल्क शिक्षा और स्वास्थ सुविधाएं आम आदमी को हासिल है। कोविड के दौरान जब करोड़ों लोगों के जीवन में आजीविका का संकट आया, उस दौरान परिवारों को निशुल्क राशन उपलब्ध कराया गया। यह रेवड़ी संस्कृति नहीं है। केन्द्र सरकार उस दौरान एक रुपए में सैनिटरी नैपकिन भी उपलब्ध करा रही थी। सैनिटरी पैड से जुड़ी बिहार सरकार की अपनी 'किशोरी स्वास्थ्य योजना' भी है।

दुख की बात है कि बिहार सरकार द्वारा चलाई जा रही इस महत्वपूर्ण योजना की जानकारी सरकार के वरिष्ठ अधिकारी को ही नहीं थी। फिर बिहार के आम आदमी को क्या ही जानकारी होगी! किशोरी स्वास्थ्य योजना के अन्तर्गत किशोरियों को सैनिटरी पैड के लिए साल में 300 रुपए प्रदान किए जाते हैं, जो बहुत कम है। माहवारी के दौरान लड़कियों को स्वस्थ रहने के लिए दिन में कम से कम 2 बार पैड बदलना पड़ता है।

एक ही पैड दिन भर इस्तेमाल किया जाए तो इससे संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। इससे गंभीर इंफेक्शन भी हो सकता है। प्रारंभ में हो सकता है कि समझ में ना आए, लेकिन जैसे जैसे उम्र बढ़ेगी, तकलीफ भी बढ़ती जाएगी। इसलिए चार दिनों के लिए कम से कम 8 पैड तो हर महीने चाहिए ही और 08 पैड बिहार सरकार द्वारा दिए गए 25 रुपए में मिलता नहीं। अब बिहार सरकार चाहे तो 'स्वयं सहायता समूहों' की मदद से बिहार में बेटियों के लिए सस्ता सैनेटरी पैड बनाकर उसे प्रदेश भर के स्कूलों में बंटवाए तो वह 25 रुपए में आठ पैड उपलब्ध कराने में कामयाब हो सकती है। बिहार सरकार इसके लिए उन स्वयंसेवी संगठनों की मदद ले सकती है, जो लंबे समय से सस्ता सैनेटरी पैड बनाकर उपलब्ध करा रहे हैं।

माहवारी पर मुंह क्यों छिपाना?

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार 15-24 साल की 50 फीसदी युवतियां आज भी सैनिटरी पैड की जगह माहवारी के समय कपड़े का इस्तेमाल करती हैं। माहवारी के समय स्वच्छता को लेकर देश भर में सबसे खराब स्थिति बिहार की है। बिहार में साफ सफाई का ध्यान सिर्फ 59 प्रतिशत महिलाएं रखती हैं। मध्य प्रदेश में यह 61 प्रतिशत है और मेघालय में 65 प्रतिशत। सैनिटरी पैड के इस्तेमाल की बात हो या फिर माहवारी के समय साफ सफाई रखने की तो इसमें भारत के अंदर सबसे अच्छा स्कोर पुडुचेरी (99.1) ने किया। उसके बाद दूसरे स्थान पर अंडमान-निकोबार (99.1) और तीसरा स्थान तमिलनाडु (99.1) का रहा।

माहवारी से जुड़े स्वच्छता के प्रश्नों से जब तक हम मुंह छुपाते रहेंगे, यह प्रश्न और गंभीर होकर सामने खड़ा होगा। इसलिए हमें सैनिटरी पैड और माहवारी से जुड़े प्रश्नों पर संवाद करना होगा। इस संवाद के लिए सबसे पहले मेडिकल की दुकानों पर मिलने वाली सैनीटरी पैड को काली पन्नी से बाहर निकालना होगा। जब हम पैड को भी कपड़े का एक ऐसा टुकड़ा मानेंगे जो साफ-सफाई और स्वास्थ से जुड़ा है तो विश्वास कीजिए हम सैनिटरी पैड के इस्तेमाल से जुड़ी आधी लड़ाई जीत चुके होंगे।

यह भी पढ़ें: "पीरियड्स है तो नो एंट्री" जानिए छ.ग.के इन गांवों में आज भी क्यों घर के बाहर रात बिताती हैं महिलाएं

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

Comments
English summary
Sanitary pad and women's health in india
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
For Daily Alerts
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X