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"पीरियड्स है तो नो एंट्री" जानिए छ.ग.के इन गांवों में आज भी क्यों घर के बाहर रात बिताती हैं महिलाएं

छत्तीसगढ़ के नवगठित मानपुर मोहला जिले के मानपुर, औंधी क्षेत्र के ग्रामीणो के लिए आज भी पीरियड का मतलब एक अशुद्ध व अपवित्र व्यक्ति से है। पीरियड्स के दौरान अपवित्र या अशुद्ध माना जाता है।

राजनांदगांव, 15 जुलाई। छत्तीसगढ़ के नवगठित मानपुर मोहला जिले के मानपुर, औंधी क्षेत्र के ग्रामीणो के लिए आज भी पीरियड का मतलब एक अशुद्ध व अपवित्र व्यक्ति से है। पीरियड्स के दौरान अपवित्र या अशुद्ध माना जाता है। मानपुर मोहल्ला जिले के डोमीकला और गटेपायली गांवों में आज भी कुर्मा प्रथा का पालन किया जा रहा है। जिसके लिए गांव के बाहर झोपड़ीनुमा कुर्मा घर बनाए गए हैं। आइए आपको हम इन गांवों में इस आधुनिक युग पर प्रहार करती प्रचलित प्रथा के बारे में बताते हैं।

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पीरियड्स के दौरान क्यों घर से बाहर रहती हैं महिलाएं
आधुनिकता के इस युग में महिलाएं गांव से बाहर एक झोपड़ी में माहवारी का वक्त बिताती है। सुनने में बड़ा अजीब लगता है। इस दौरान उन्हें घर में प्रवेश व गांव से बाहर जाने की मनाही है। वे इस दौरान किसी भी सार्वजनिक वस्तु को हाथ नही लगाएंगी। इतनी सारी पाबंदियों के बीच पीरियड्स आने पर महिलाओं और बालिकाओं को घर से बाहर एक छोटी सी झोपड़ी में रहना पड़ता था। बदबूदार और सुविधाविहीन इस कुटिया में लंबे समय तक महिलाओं और बालिकाओं को दिन गुजारने पड़ते थे। रात को सबसे ज्यादा परेशानी होती थी। वनांचल में यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है।

जागरूकता शिविर भी नही बदल सके पंचों के नियम
इस प्रथा को बंद करने शासन-प्रशासन के साथ ही एनजीओ ने जागरूकता अभियान व शिविर लगाकर बदलने का प्रयास किया,पर ये अभियान भी पंचों के फैसले नही बदल सकता। जब गांव में इस तरह से कोई एनजीओ आता तो उसे महिलाएं ही समझाकर मना कर देंती, क्योंकि महिलाएं भी पंचों के बात का विरोध नही कर सकतीं।

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महाराष्ट्र की एनजीओ ने बदल दी कुर्मा घरों कि तस्वीर
प्रयासों से बदलाव नहीं आने पर महाराष्ट्र की खेरवाड़ी सोशल वेलफेयर एसोसिएशन और दि टाइम एंड टैलेंट क्लब की टीम ने इनकी परम्परा बदलने के बजाय इनके कुरमाघरों ( गांव के बाहर झोपड़ी) को ही बदल दिया, इनकी जगहोें पर सेफ रेस्टिंग होम (सुरक्षित आवास) तैयार किया गया है। जहां महिलाएं सुरक्षित तरीके से यहां पर रहकर आराम कर सकती हैं। संस्था की ओर से फिलहाल डोमीकला और गटेपायली में दो-दो मॉडर्न रेस्टिंग होम तैयार किया गया है। जहां पंखे, बिस्तर समेत सारी सुविधाएं दी गई है। बिजली के लिए इन कुर्माघरों में सोलर एनर्जी का इस्तेमाल किया गया हैं।

पीरियड्स हट्स बनने से स्कूली छात्राओं को हुआ लाभ
माहवारी के समय महिलाओं और बालिकाओं को कई मुसीबतों का सामान करना पड़ता था। ग्रामीणों को जागरूक किया गया और यहां पर सेफ रेस्टिंग होम तैयार किया गया है। यहां पर महिलाएं और बालिकाएं पीरियड तक रह सकती हैं। परिवार वाले भोजन और पानी का इंतजाम करते हैं। अक्सर पीरियड के दौरान स्कूली छात्राएं कुटिया में रहती थीं तो पढ़ाई से दूर हो जा रहीं थीं। लेकिन अब रेस्टिंग होम के तैयार हो जाने से बालिकाएं वहां रहकर पढ़ाई करती हैं। साथ ही यहाँ सोलर एनर्जी से बिजली की व्यवस्था भी है। इससे अब बच्चे पढ़ाई से दुर नही हो पाते उन्हें पढ़ने का पूरा समय मिल पाता है।

गांव में सदियों से हो रहा कुर्मा प्रथा का पालन
इस प्रथा को गांव में कुर्मा कहा जाता है, और पीरियड के दौरान जिस टूटे-फूटे कमरे में महिलाएं रहती थीं, उस जगह को कुर्माघर कहते हैं। जिससे उन्हें कई स्वास्थ्य सबंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता था। लेकिन फिर भी महिलाएं सालों से इस प्रथा को निभाते आ रही हैं। गांव की महिलाओं को अब सुकून मिला है। उनके टूटे-फूटे, कच्चे कुर्माघर को नया बना दिया गया है। पहले गांव में बने झोपड़ी में बिजली, पानी ,पंखा ,बेड शौचालय तक नसीब नहीं था। पर इस नए कुर्मा घर में सभी तरह की सुविधा है।

पीरियड के दौरान रातभर अकेले रहती थी महिलाएं
महिलाओं का कहना है कि कुर्माघर में अकेले भी रहना पड़ता है। जिससे आसपास जंगल होने से जंगली जानवरों का खतरा बना रहता था। इसलिए महिलाएं रातभर परेशान रहतीं थीं। हम किसी न किसी लड़की को साथ में बुला लेते हैं। अब रेस्टिंग होम में सारी सुविधाएं होने से दिक्कत कम हुई है। महिलाएं बताती हैं कि यह प्रथा मानपुर ब्लॉक के आसपास के अन्य गांवों में भी चलती है। संस्था की ओर से डोमीकला और गट्‌टेपायली में मॉडर्न रेस्टिंग होम तैयार किया गया है। ग्रामीणों की सहमति के साथ अन्य गांवों में भी रेस्टिंग होम बनाने की तैयारी है।

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