Same Sex Marriage: 'सेम सेक्स मैरिज' गलत शब्द है और प्रकृति का विरोधी भी

सेम सेक्स मैरिज। अगर इसी शब्द से हम इस पूरी बहस को समझना शुरु करें तो ये इकलौता शब्द समूची मानव सभ्यता की समझ को उलट देता है। सेम सेक्स मैरिज क्या सभ्य समाज के लिए एक सही शब्द हो सकता है?

Same gender Marriage word is against our indian society

Same Sex Marriage: जब हम 'सेम सेक्स मैरिज' शब्द का प्रयोग करते हैं तो अतीत में नहीं भविष्य में देख रहे होते हैं। जो लोग इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं, इसे अपने 'मौलिक अधिकार' से जोड़ रहे हैं वो इसके लिए अतीत के उदाहरण बहुत कम देते हैं। वो इसे रिश्तों और प्रेम का भविष्य मानकर इसकी वकालत करते हैं। हमारी प्रगतिशील तर्कबुद्धि का विकास दिनों दिनों इतना हो जाएगा कि विपरीत लिंग के साथ समन्वय या प्रेम करना हमारे लिए दूभर हो जाएगा। इसलिए सेम सेक्स लव, सेम सेक्स रिलेशन और सेम सेक्स मैरिज के लिए हमें अभी से तैयार हो जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को ऐतिहासिक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष निर्धारण की कोई सीमारेखा नहीं हो सकती। एक स्त्री में पुरुषोचित गुण हो सकते हैं और एक पुरुष में स्त्रैण गुण पाये जा सकते हैं। इसके लिए सेम सेक्स मैरिज वाले लोग जेन्डर का सहारा लेते हैं। वो सेक्स और जेन्डर को इसी आधार पर अलग करते हैं। यानी अगर स्त्री का शरीर है तो जरुरी नहीं कि उसमें स्त्रियों वाले गुण हो। उसमें पुरुषों वाले गुण और आवश्यकताएं हो सकती हैं। यह एक प्रगतिशील मानस का शायद सर्वोच्च विकास है जहां वह स्त्री में पुरुष और पुरुष में स्त्री होने को अवगुण मानने की बजाय उसका गुण मानता है।

लेकिन भारतीय समाज तो इसको गुण नहीं मानता रहा है कभी भी। स्त्रैण स्वभाव वाले पुरुष और पुरुष स्वभाव वाली स्त्रियां आपको कहीं भी मिल सकते हैं। अपने आसपास ही अगर देखेंगे तो कोई न कोई ऐसा दिख जाएगा जिसमें जेन्डर के विपरीत वाले गुण दिखाई देंगे। समाज उनको प्रताड़ित तो नहीं करता लेकिन उनको मुख्यधारा में शामिल भी नहीं करता। समाज मुख्यधारा में ऐसे लोगों को भी शामिल नहीं करता जो विवाहित नहीं हैं, या जो विधुर या विधवा हैं। ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार भले न हो लेकिन सामाजिक और पारिवारिक गतिविधियों में वो अधिकार प्राप्त नहीं है जो विवाहित जोड़े को प्राप्त होता है।

इसके पीछे भारतीय समाज की बड़ी स्पष्ट अवधारणा है। समाज का आधार परिवार है और परिवार का आधार है विवाह। विवाह ही है जिसके जरिए परिवार और समाज का निर्माण होता है। अगर कोई विवाहित नहीं है या उसका विवाह खंडित हो गया है तो वह समाज की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं रह जाता है। इसके प्रमुख रूप से दो कारण है। पहला, जितने पारिवारिक या धार्मिक आयोजन हैं वो पत्नी के साथ या फिर पति के साथ ही संपन्न किये जा सकते हैं। दूसरा कारण, समाज में दिया जाने वाला संदेश है। भारतीय समाज अविवाहित, विधुर, विधवा या फिर किसी भी ऐसे संबंध को मान्यता नहीं देता जो आनेवाली संतति का निर्माण नहीं कर सकता। जो अगली पीढ़ी पैदा नहीं कर सकता वह समाज का हिस्सा भला कैसे हो सकता है?

'सेम सेक्स मैरिज' की वकालत करने वाले समूह इसी बात को या तो समझते नहीं, या फिर समझना नहीं चाहते। उनके लिए समाज का कोई अस्तित्व नहीं होता। वो अपने आप को सिर्फ एक इंडिविजुअल समझते हैं और हर नागरिक की तरह समान स्वीकार्यता और अधिकार चाहते हैं। वो भले ही ऐसे रिश्ते में बंधे हों जिससे संतान पैदा नहीं हो सकती लेकिन उन्हें उस रिश्ते की कानूनी और सामाजिक मान्यता चाहिए। अगर ये मान्यता उन्हें मिल भी गयी तो उनके जीवन में क्या बदलाव आ जाएगा? इसका उत्तर ऐसे सवाल उठाने वालों में किसी के पास शायद ही हो।

सुप्रीम कोर्ट सेम सेक्स मैरिज वाले जिन 20 जोड़ों को उसका अधिकार दिलाने के लिए पांच जजों की संवैधानिक पीठ बनाकर मैराथन सुनवाई कर रहा है उसमें एक जोड़ा काजल चौहान और भावना सिंह का है। काजल और भावना 2018 से एक दूसरे के साथ रिश्ते में हैं और शादी करना चाहती हैं। स्वाभाविक है उनका परिवार में विरोध हो रहा है और वो दोनों अपने विवाह का कानूनी आधार तलाशते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंच गयी हैं।

काजल और भावना दोनों साथ रह रही हैं। वो एक सहेली के रूप में भी तो साथ रह सकती हैं। क्या उनका सखी सहेली के रूप में साथ रहने, एक दूसरे से भावनात्मक स्तर पर जुड़ने या फिर एक दूसरे के सुख दुख का साथी बनने पर किसी को ऐतराज है? भारत में हर लड़की या महिला के पास सुख दुख की उसकी साथी कोई न कोई सखी या सहेली ही होती है। क्या समाज ऐसे संग साथ पर आपत्ति करता है? क्या दो पुरुष मित्र जो एक दूसरे के साथ रहते हैं, एक दूसरे से सुख दुख बांटते हैं, समाज उस पर आपत्ति करता है? बिल्कुल नहीं।

सामाजिक आपत्तियां वहां से शुरु होती हैं जहां से ऐसे जोड़े समाज की व्यवस्था को चुनौती देना शुरु करते हैं। समाज की जो व्यवस्था है वह प्रकृति सम्मत है और सदियों में अनुभव के जरिए उसका अलग अलग वातावरण में अलग अलग तरीके से विकास हुआ है। ऐसे मामले पहले नहीं आये होंगे ऐसा भी नहीं है। लेकिन भारत का समाज प्रकृति की पूजा ही नहीं करता प्राकृतिक व्यवस्था के अनुकूल अपनी व्यवस्थाएं भी निर्मित करता है। उसकी व्यवस्था में सेम सेक्स रिलेशन मान्य इसलिए नहीं है क्योंकि यह प्रकृति में मान्य नहीं है।

भारतीय ज्ञान परंपरा में चार प्रकार के जीवों का उल्लेख आता है। अंडज, पिंडज, श्वेदज और उद्भज। इसमें जो अंडज और पिंडज जीव हैं वो अपनी संतति बढाने के लिए किसी न किसी रूप में सेक्स करते हैं। जो श्वेदज और उद्भज हैं उनकी उत्पत्ति के लिए सेक्स या मैथुन जरूरी नहीं है। मनुष्य पिंडज जीव में आता है। वो जीव जो अंडे के रूप में अपना बच्चा पैदा करते हैं वो अंडज कहे जाते हैं जबकि जो जीव शरीर (पिंड) सहित जन्म लेते हैं उन्हें पिंडज कहा जाता है। पशुओं की तरह मनुष्य सीधे बच्चे को जन्म देता है अत: ऐसा करने के लिए विपरीत लिंगी के साथ सहवास करना अनिवार्य होता है।

Recommended Video

    LGBTQ Supreme Court India: LGBT का मतलब क्या होता है, एक-दूसरे से कैसे हैं ये अलग? | वनइंडिया हिंदी

    सेम सेक्स मैरिज की वकालत करने वाले लोग अपनी तर्कबुद्धि से इसी प्राकृतिक व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। उन्हें लगता है कि उनकी तर्कबुद्धि से उपजे विचार को सामाजिक और कानूनी मान्यता मिल जाए। स्वाभाविक है जो काम अंडज और पिंडज जीवों में कोई नहीं करता उसे मनुष्य से इसलिए मान्य करने के लिए समझाया जा रहा है क्योंकि कुछ लोगों के लिए यह मानवाधिकार का मुद्दा है। लेकिन ऐसे लोगों के लिए परिवार की संरचना, समाज की व्यवस्था, प्रकृति का कानून कोई मायने नहीं रखता। ये लोग अपवाद को मुख्यधारा बनाना चाहते हैं जिसके निहितार्थ समाज और परिवार व्यवस्था के लिए अच्छे नहीं है।

    देश का दुर्भाग्य यह है कि जब संविधान ही परिवार और समाज के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता तो उस संविधान से चलने वाली संस्थाओं से आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वो समाज और परिवार के हितों को ध्यान में रखकर कोई निर्णय लेंगे?

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

    Notifications
    Settings
    Clear Notifications
    Notifications
    Use the toggle to switch on notifications
    • Block for 8 hours
    • Block for 12 hours
    • Block for 24 hours
    • Don't block
    Gender
    Select your Gender
    • Male
    • Female
    • Others
    Age
    Select your Age Range
    • Under 18
    • 18 to 25
    • 26 to 35
    • 36 to 45
    • 45 to 55
    • 55+