GN Saibaba Case: टुकड़े टुकड़े गैंग का अर्बन नक्सलियों को समर्थन

GN Saibaba Case: सुप्रीम कोर्ट ने माओवादी शिक्षक जी एन साईबाबा और उसके चार साथियों को बरी किए जाने के मुम्बई हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा कर महाराष्ट्र सरकार ही नहीं केंद्र सरकार को भी बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के कुछ घंटों के भीतर ही टुकड़े टुकड़े गैंग ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ प्रदर्शन किया। जिसमें जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा के शिक्षकों और आईसा से जुड़े 40-50 छात्रों ने भाग लिया।

सीपीआई (लिबरेशन) का यह वही छात्र संगठन है जो नागरिकता संशोधन क़ानून के खिलासफ़ आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निभा रहा था। छतीसगढ़ में नक्सली जब पुलिस कर्मियों की हत्या करते हैं, तो जेएनयू, दिल्ली यूनिवर्सिटी और जाधवपुर यूनिवर्सिटी में आईसा और अन्य वामपंथी संगठनों से जुड़े छात्र जी एन साईबाबा जैसे माओवादी शिक्षकों से प्रेरणा पाकर जश्न मनाया करते थे। साईबाबा जैसे माओवादी भारत के टुकड़े टुकड़े गैंग और अर्बन नक्सलियों के प्रेरणा पुरुष हैं।
इस से पहले कि जेएनयू में साईबाबा की रिहाई के आदेश का जश्न मनाया जाता, सुप्रीमकोर्ट ने मुम्बई हाईकोर्ट को फटकार लगाते हुए, साईबाबा की रिहाई पर रोक लगा दी।
सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने जघन्य अपराध की गहराई में जाए बिना तकनीकी आधार पर आरोपियों को बरी कर दिया। सुप्रीमकोर्ट अब हाईकोर्ट के फैसले की समीक्षा करेगी।
14 अक्टूबर को हाईकोर्ट का फैसला भी अजीबो गरीब था, कोर्ट ने यह कहते हुए साईबाबा और चार अन्य माओवादियों महेश तिर्की, हेम केशवदत्त मिश्रा, प्रशांत सांगलीकर और विजय तिर्की को भी बरी कर दिया था कि ट्रायल कोर्ट ने यूएपीए के तहत आरोपी के खिलाफ ट्रायल की मंजूरी का जो आदेश हासिल किया था, वह "कानून की दृष्टि से गलत और अवैध' था।" क्या कानून की तकनीकी प्रकिया के आधार पर किसी उम्र कैद के सजायाफ्ता को बरी किया जा सकता है ?
टुकड़े टुकड़े गैंग उस हाईकोर्ट के फैसले की तो आलोचना नहीं कर रहा, जिसने सिर्फ इस आधार पर खतरनाक माओवादियों को बरी कर दिया कि ट्रायल कोर्ट ने केस चलाने का उचित आदेश प्राप्त नहीं किया था। लेकिन सुप्रीमकोर्ट के उन दो जजों जस्टिस एम.आर. शाह और जस्टिस बेला.एम. त्रिवेदी की आलोचना कर रहा है, जिन्होंने न्यायपालिका की भयंकर गलती को तुरंत सुधार लिया।
सुप्रीमकोर्ट के इस त्वरित फैसले से एक बात और खुल कर सामने आ गई कि सिर्फ विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर और स्टूडेंट ही नहीं, सीपीआई और सीपीएम पार्टियां ही नहीं, कुछ पत्रकार और टीवी चेनलों पर बहस करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी ही नहीं, बल्कि न्यायपालिका में भी इस गैंग के चहेते बैठे हुए हैं।
इस के दो प्रमाण आपके सामने रख रहा हूँ। पहला तो हाईकोर्ट की जजमेंट का उदाहरण है, और दूसरा सुप्रीम कोर्ट के होने वाले चीफ जस्टिस चन्द्रचूड का उदाहरण है, जिन्होंने शुक्रवार को हाईकोर्ट के फैसले पर यह कहते हुए रोक लगाने से इनकार कर दिया था कि वे हाईकोर्ट की और से किसी को बरी किए जाने पर रोक नहीं लगा सकते।
शुक्रवार को मुम्बई हाईकोर्ट का फैसला आने के तुरंत बाद सालिसीटर जनरल ने जस्टिस चन्द्रचूड की बेंच के सामने हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लगाने की ज़ुबानी अपील की थी। इस पर जस्टिस चन्द्रचूड ने कहा कि उन्हें कोर्ट ने बरी किया है, अगर हम इस विषय को सोमवार को सुनें, तो भी हम हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे नहीं लगा सकते।
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जैसे ही मुम्बई हाईकोर्ट ने साईंबाबा और उस के चार साथियों को बरी करने का फैसला किया, देश भर में सनसनी फ़ैल गई थी, क्योंकि इन सभी के खिलाफ सैंकड़ों हत्याओं के लिए जिम्मेदार माओवादियों के साथ सांठगाँठ के इतने सबूत हैं कि इन्हें बरी किया ही नहीं जा सकता। ये सभी शहरी नक्सली हत्यारे माओवादियों की प्राणवायु हैं। माओवादी और नक्सलियों के गैंग के हमदर्द सभी संस्थानों में भरे पड़े हैं। जो इस तरह के अदालती फैसलों के बाद तुरंत बिलों से बाहर आ जाते हैं। सुप्रीमकोर्ट के स्टे पर लेख आने शुरू हो गए हैं।
"लाईव ला डाट इन" में पहला लेख आया है, लेख के लेखक मनु सबेस्टियन इस वेबसाईट के मेनेजिंग एडिटर हैं। इस लेख में उन्होंने सवाल उठाया है कि क्या यह इतना जरूरी और अर्जेंट मामला था कि सुप्रीम कोर्ट उस पर तुरंत सुनवाई करता। शुक्रवार शाम 3.59 पर याचिका दाखिल की गई थी और शनिवार सुबह साढ़े दस बजे मुम्बई हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी गई। फिर उन्होंने दो जजों की बेंच पर भी सवाल उठाया कि रातों रात वह नई स्पेशल बेंच कैसे बनी और शनिवार को छुट्टी वाले दिन सुनवाई क्यों हुई।
असल में यह गैंग चाहता था कि एक बार सोमवार तक सभी पाँचों माओवादियों की रिहाई हो जाती, फिर सुप्रीमकोर्ट में सुनवाई होती रहती। अगर सुप्रीम कोर्ट पर यह सवाल उठाया जाता है कि उस ने शनिवार को सुनवाई क्यों की, तो सवाल हाईकोर्ट पर भी उठता हैं कि उस ने शुक्रवार को ही माओवादियों को बरी करने का फैसला क्यों किया।
शुक्रवार को फैसला करने के अलावा सुप्रीम कोर्ट मामले में दखल न दे, इस के लिए भी हाईकोर्ट के जजों ने बरी करते हुए सीआरपीसी की धारा 437 ए के अंतर्गत 50000 रूपए का बांड भरने को कहा था, ताकि बरी किए गए माओवादी प्रशासन की निगरानी में रहें। ऐसा करने के पीछे हाईकोर्ट की मंशा यह थी कि सुप्रीम कोर्ट तुरंत स्टे नहीं लगाए।
माओवादियों के पक्ष में लिखे गए इस लेख में कहा गया है कि बांड की शर्त के बाद हाईकोर्ट के फैसले पर तुरंत स्टे की क्या जरूरत थी। इस लेख में जस्टिस चन्द्रचूड की और से एक दिन पहले स्टे देने से इनकार करने के उनके फैसले की तारीफ़ भी की गई है। लेख में केरल हाईकोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया गया, उस केस में भी केरल हाईकोर्ट ने इन्हीं आधारों पर एक माओवादी को रिहा किया था कि केस की इजाजत समय पर नहीं ली गई थी।
यह केस जब सुप्रीमकोर्ट में आया था, तो यही जस्टिस एमआर शाह की बेंच थी, लेकिन उस बेंच में उन के साथ जस्टिस कृष्णा मुरारी थे। उस बेंच ने केरल सरकार की याचिका स्वीकार नहीं की थी, बल्कि केरल सरकार को याचिका वापस लेने को कह दिया था। इस लेख के आखिर में साईबाबा की रिहाई पर रोक लगाने के फैसले को चीफ जस्टिस उदय उमेश ललित के बेदाग़ चेहरे पर भी धब्बा बताया गया है।
इस तरह की भाषा से भी स्पष्ट है कि टुकड़े टुकड़े गैंग किस तरह सक्रिय हो चुका है। आने वाले दिनों में साईंबाबा के बचपन से पोलियो का शिकार होने और 90 फीसदी अपंग होने की दुहाई देने वाले लेख और दलीलें भी सुनने को मिलेंगी, जब ट्रायल कोर्ट ने उन्हें उम्र कैद की सजा सुनाई थी, तब भी इसी तरह के भावुक लेख लिखे गए थे।
ट्रायल कोर्ट में साईंबाबा ने माओवादियों से किसी तरह का संबंध होने से इनकार किया था, लेकिन जब उन्हें उम्र कैद की सजा हुई तो माओवादियों ने 29 मार्च 2017 को उन के समर्थन में भारत बंद का आह्वान किया था।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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