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Supreme Court on Demonetisation: क्या नोटबंदी मामले में लक्ष्मण रेखा लांघ रहा है सुप्रीम कोर्ट?

Supreme Court on Demonetisation: 8 नवंबर 2016 की नोटबंदी के ठीक छह साल बाद 9 नवंबर 2022 को केंद्र सरकार को इस फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब देना पड़ेगा। हालांकि नोटबंदी से जो होना था हो चुका और अब उस फैसले को वापस नहीं लिया जा सकता। फिर भी सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों वाली संविधान पीठ ने केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को नोटिस जारी करके इस फैसले की प्रक्रिया पर संबंधित दस्तावेज़ों सहित जवाब मांगा है।

Can Supreme Court review demonetisation notice to central government and rbi

सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से एक बार फिर से न्यायपालिका की लक्ष्मण रेखा से जुड़ी बहस छिड़ गई है, जिस पर कोर्ट ने कहा है कि उन्हें अपनी लक्ष्मण रेखा मालूम है, लेकिन संविधान पीठ के सामने जो सवाल उठाए गए हैं, उनका जवाब देना उनका कर्तव्य है। दरअसल, नोटबंदी के फैसले के तुरंत बाद इसके विरुद्ध देश भर में अनेक याचिकाएं दायर की गई थीं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली बेंच ने उस वक्त न तो नोटबंदी के फैसले पर रोक लगाई, न निचली अदालतों को इन याचिकाओं पर सुनवाई की अनुमति दी, न ही इन याचिकाओं को खारिज किया।

उस बेंच ने यह मानते हुए भी कि नोटबंदी से जुड़ी 2016 की अधिसूचना 1934 के भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम के तहत वैध रूप से जारी की गई थी, संविधान के 14, 19 और 300ए जैसे कुछ अनुच्छेदों के आधार पर उठाए गए सवालों की एक फेहरिश्त तैयार की और कुल 58 याचिकाओं को इकट्ठा करके सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ को अग्रेषित कर दिया। लेकिन इन सवालों के जवाब तलाशने के लिए संविधान पीठ तुरंत जागृत नहीं हुआ। कायदे से नोटबंदी जितनी बड़ी घटना थी, उसे देखते हुए यदि इन सवालों में कुछ दम था, तो संविधान पीठ को तुरंत जागृत हो जाना चाहिए था, लेकिन शायद उस वक्त उन्हें यह मामला प्राथमिकता सूची में डालने लायक नहीं लगा होगा।

इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव भी हो गए और नोटबंदी जैसे मुद्दों पर विरोधी दलों के प्रचार को खारिज करते हुए देश की जनता ने मोदी सरकार को प्रचंड बहुमत भी दे दिया। अब लगभग छह साल बाद संविधान पीठ के सदस्य न्यायाधीश इस मामले में जागृत दिखाई दे रहे हैं और वे जस्टिस टीएस ठाकुर वाली बेंच द्वारा उठाए गए सवालों के जवाब तलाशने के लिए आगे आए हैं। हालांकि इस लेट-लतीफी से असहमति जताते हुए भी यह कहना न्यायिक दृष्टि से ठीक नहीं होगा कि अब इस मामले की सुनवाई क्यों हो रही है। यदि संविधान पीठ के सदस्य न्यायाधीश अपने समक्ष उठाए गए सवालों को बिना सुने या बिना उनका जवाब दिये याचिकाओं को खारिज कर देते हैं, तो जनता के एक हिस्से में यह गलत संदेश जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में भी उनकी सुनवाई नहीं है।

इसलिए सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब यदि सरकार को लगता है कि अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करके न्यायपालिका उनके अधिकार क्षेत्र में दखल दे रही है, तो उसके सामने यह विकल्प तो है ही कि अपने हलफनामे में वह पुख्ता कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए यही बता दे कि उसके इस विशुद्ध नीतिगत फैसले से जुड़े दस्तावेजों की मांग करना सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है या क्यों इन दस्तावेजों को सार्वजनिक करना राष्ट्रहित में नहीं होगा। यहां यह बात भी ध्यान देने की है कि नोटबंदी को लेकर मुख्य रूप से तीन तरह के सवाल उठाए गए हैं।

एक- नोटबंदी के पक्ष में बताए गये उद्देश्यों को प्राप्त करने में सरकार कितनी सफल या विफल रही? तो यह राजनीतिक और अकादमिक बहस या समीक्षा का विषय भले ही हो सकता है, लेकिन न्यायिक सुनवाई का विषय नहीं हो सकता, क्योंकि यदि सरकारी नीतियों की सफलता और विफलता पर कोर्ट में सुनवाई होने लगेगी, तो वाकई सरकार को भंग करके कोर्ट को ही सत्ता के सारे अधिकार सौंप देने होंगे।

दो- क्या नोटबंदी को लागू करने से पहले ठीक से तैयारी नहीं की गई, जिससे इसे लागू करने के दौरान काफी कुप्रबंधन देखने को मिला और लोगों को काफी परेशानी हुई? तो सरकारी या प्रशासनिक कुप्रबंधन जैसे विषयों पर अदालतों में पहले भी सुनवाई होती रही है और समय-समय पर अदालतों ने ऐसे मामलों में बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए सरकार और प्रशासन को निर्देश भी जारी किये हैं, जिनपर सरकारें अमल भी करती रही हैं। लेकिन नोटबंदी को लागू हुए छह साल बीत चुके हैं और इसका जो असर होना था, हो चुका है।

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इसलिए अब यदि कोर्ट पुरानी बातों पर चर्चा करती है, तो यह समय की बर्बादी होगी। लेकिन यदि उसे ऐसा लगता है कि भविष्य में फिर से नोटबंदी हो सकती है, तो वह कुछ एडवायजरी जारी कर सकती है। हालांकि ऐसी किसी एडवायजरी का भविष्य के लिए ज्यादा मतलब नहीं होता, क्योंकि जब जो समस्या जिस तरह से पैदा होती है, उस वक्त सरकार और प्रशासन को उसी तरीके से त्वरित फैसला करके उसे हैंडल करना होता है।

और, तीन- क्या नोटबंदी से अनेक नागरिकों के संविधान-प्रदत्त कुछ अधिकारों का उल्लंघन हुआ? तो यही एक बिंदु है, जो मुख्य रूप से न्यायिक सुनवाई का आधार हो सकता है। लेकिन यहां भी यह बात समझने की है कि संविधान में प्रदत्त कोई भी अधिकार बिना शर्त नहीं है। देश के कानून को भी देखना है, दूसरे नागरकों के अधिकार भी देखने हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें, तो सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सामने एक प्रमुख सवाल यह है कि क्या नोटबंदी से संविधान के अनुच्छेद 300 (ए) में प्रदत्त संपत्ति के अधिकार का उल्लंघन हुआ? तो प्रतिप्रश्न यह है कि क्या किसी को भी अवैध या काली कमाई के जरिए संपत्ति अर्जित करने का अधिकार दिया जा सकता है? और क्या नोटबंदी ने देश के किसी भी नागरिक की वैध तरीके से कमाई गई संपत्ति का अधिकार छीना?

इसी तरह संविधान पीठ के सामने दूसरा सवाल संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन को लेकर उठाया गया है, जिनमें नागरिकों को कानून की नज़र में समानता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान की गई है। लेकिन प्रतिप्रश्न यह है कि क्या नोटबंदी देश के केवल कुछ नागरिकों के लिए लागू की गई थी या सभी नागरिकों के लिए एक समान रूप से? क्या नोटबंदी के दौरान अलग-अलग नागरिकों के लिए नोट बदलवाने की प्रक्रिया अलग-अलग रखी गई थी? क्या अलग-अलग नागरिकों के लिए पैसे निकालने या बदलने की अलग-अलग सीमा निश्चित की गई थी? यदि इन सारे सवालों के जवाब "नहीं" में हैं, तो फिर भेदभाव कैसे हुआ, असमानता कैसे हुई?

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संविधान पीठ के सामने एक सवाल यह भी है कि क्या बैंकों और एटीएम से पैसे की निकासी की सीमा तय करना लोगों के अधिकारों का उल्लंघन है? तो बैंकों और एटीएम से पैसे निकालने की सीमा तो आम दिनों में भी होती है। नोटबंदी के दौरान केवल इतना ही हुआ कि इस सीमा को काफी संकुचित कर दिया गया था, जो कि इसे लागू करने के लिए एक आवश्यक प्रशासनिक कदम था।

ज़ाहिर है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट यदि नोटबंदी के विशुद्ध न्यायिक पहलुओं की समीक्षा तक सीमित रहते हैं, तो इसमें हाय-तौबा या लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन जैसी कोई बात नहीं, लेकिन यदि अदालती चर्चा इसके नीतिगत या अकादमिक पहलुओं पर अधिक केंद्रित हो जाती है, तो निश्चित रूप से इसमें राजनीति भी देखी जाने लगेगी।

यहां यह बात भी गौर करने की है कि सरकार के विरुद्ध इन याचिकाओं की पैरवी करने वाले वकीलों में सबसे प्रमुख हैं पी चिदंबरम, जो वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री तो हैं ही, भ्रष्टाचार के कुछ संगीन मामलों में भी घिरे हुए हैं।

एयरसेल-मैक्सिस मामले में तो वे जेल भी जा चुके हैं और इन दिनों जमानत पर हैं। उनके बेटे कार्ति चिदंबरम और अनेक करीबियों पर भी भ्रष्टाचार के कई संगीन मामले चल रहे हैं। इसलिए क्या यह बेहतर नहीं होता कि नोटबंदी जैसे गंभीर मामले में सरकार पर गंभीर सवाल खड़े करने के लिए किसी गंभीर, विश्वसनीय और बेदाग वकील को पेश किया जाता?

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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