Harassment at Workplace: कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ सख्त कानून के बावजूद अपराधियों के हौसले बुलंद क्यों?
Harassment Workplace: कामकाजी महिलाओं को घर से ऑफिस तक पहुँचने के रास्ते में कदम-कदम पर समस्याओं से जूझना पड़ता है। लेकिन, असली चुनौती सामने आती है उनके कार्यालय पहुँचने के बाद। यहॉं उन्हें अपना काम भी करना होता है और अपने पुरुष बॉस व सहकर्मियों के नापाक इरादों से सुरक्षित भी रहना होता है। हतप्रभ करने वाली बात यह है कि करीब पचास प्रतिशत महिलाएं कार्यस्थल पर यौनशोषण रोकने में सफल नहीं हो पातीं।

पीड़िताओं में आधी ही कर पाती हैं शिकायत
ये वे महिलाएं हैं, जिन्होंने स्वीकार किया है कि वे कम से कम एक बार कार्यस्थल पर यौनशोषण का सामना कर चुकी हैं। इनमें से भी आधी से अधिक महिलाएं ऐसी हैं, जो अपने साथ हुए इस तरह के व्यवहार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत नहीं जुटा सकीं। लेकिन जिन्होंने यह साहस दिखाया है, उनकी संख्या भी कुछ कम नहीं है।
हाल ही में जारी महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है कि देश भर में अभी तक इस तरह की लगभग सत्तर लाख शिकायतें मिल चुकी हैं। अगर राज्यों की बात की जाये तो सबसे ज्यादा शिकायतें दिल्ली (11.2 लाख), पंजाब (10.5 लाख), गुजरात (10.4 लाख) से मिली हैं। बाकी सात शीर्ष राज्यों में आंध्र प्रदेश, उ.प्र., झारखंड, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, बिहार, म.प्र. शामिल हैं। शहरों में शीर्ष पॉंच हैं दिल्ली, मुंबई, बेंगलूरु, हैदराबाद और पुणे, जहॉं बीते साल सबसे ज्यादा शिकायतें दर्ज की गयी थीं।
हालांकि बीएसई इंडेक्स की टॉप सौ कंपनियों की बात करें तो इनमें यौन शोषण की शिकायत करने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है। एंटी सेक्सुअल हरैसमेंट एडवाइजरी 'कम्प्लाई करो डॉट कॉम' द्वारा किये गये डेटा एनालिसिस के मुताबिक पिछले साल की तुलना में इस साल करीब 27% अधिक शिकायतें दर्ज करायी गयी हैं।
मी टू ने दिया है हौसला
मी टू, यानी मैं भी, ये दो ऐसे शब्द थे, जो एक वैश्विक अभियान में बदल गये। इन दो शब्दों की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि टाइम मैगजीन ने मी टू को वर्ष 2017 में 'पर्सन ऑफ द इयर' घोषित किया था।
हालांकि मी टू सिर्फ 'सेक्सुअल हैरेसमेंट एट वर्क प्लेस' तक सीमित न रहकर हर प्रकार के यौन शोषण के खिलाफ था। लेकिन यौन शोषण की शिकार महिलाओं द्वारा छेड़े गये इस विश्वव्यापी मूवमेंट का असर दुनिया भर में देखने को मिला है। भारत भी इससे अछूता नहीं है, जहॉं इसके बाद से स्त्रियों ने अपने खिलाफ हो रही इस तरह की ज्यादतियों के खिलाफ खुलकर बोलना शुरू कर दिया है।
इनमें काम के दौरान हुए यौन दुर्व्यवहार की शिकार महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा थी। सिनेमा, राजनीति, खेल, कारपोरेट, मीडिया, कला आदि क्षेत्रों से लेकर असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाली, हर श्रेणी की महिलायें मूवमेंट का हिस्सा बन चुकी हैं।
उनकी इसी व्यापक मुखरता का नतीजा है कि अपनी शक्ति और अधिकारों का दुरुपयोग करने वाली अनेक नामचीन हस्तियों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है। इन हस्तियों में प्रमुख भूतपूर्व विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर को अपना पद छोड़ना पड़ा तो तहलका फेम तरुण तेजपाल जेल के सींखचों के पीछे पहुँचे।
ग्लैमर की दुनिया में अनुराग कश्यप, मधुर भंडारकर, आलोक नाथ, शाइनी आहूजा, एडमैन सोहेल सेठ, संगीतकार अनु मलिक व इस्माइल दरबार, चित्रकार जतिन दास, ध्रुपद गायक रमाकांत और अखिलेश गुंडेचा, फ्लिपकार्ट के बिन्नी बंसल, बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी जैसी अनगिनत हस्तियों को बेहद शर्मिंदगी और भर्त्सना का सामना करना पड़ा। यह दीगर है कि मीटू के नब्बे फीसदी से ज्यादा मामले, अलग-अलग कारणों से सोशल मीडिया तक ही सीमित रह गये। लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि वर्षो से कार्य स्थल पर चुपचाप ज्यादतियॉं सहने वाली असंख्य महिलाओं को इसी से शिकायत करने की हिम्मत मिली है।
क्या कहते हैं कोर्ट और कानून?
कामकाजी महिलाओं को कार्य स्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न से सुरक्षित रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 1997 में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किये थे, जिन्हें विशाखा गाइडलाइन्स के नाम से जाना जाता है। 'विशाखा' को विस्तार देते हुए सोलह साल बाद कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 को पारित किया गया। यह अधिनियम संगठित और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को किसी भी प्रकार के यौन दुर्व्यवहार के खिलाफ शिकायत का अधिकार देता है।
कानून के अंतर्गत यौन उत्पीड़न के विभिन्न प्रकारों की स्पष्ट व्याख्या की गयी है। इन प्रकारों में किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करना या छूने की कोशिश, भय दिखाकर या प्रलोभन देकर शारीरिक संबंधों की मॉंग करना, अश्लील बातें करना, अश्लीत चित्र, वीडियो या टेक्स्ट उसे दिखाना व अन्य किसी भी प्रकार का यौन संवाद, स्पर्श आदि शामिल हैं।
कानून के बावजूद शिकायत करने में हिचकती हैं महिलाएं
इसकी सबसे बड़ी वजह बतायी जाती है, अधिकतर पीड़ितों में कानून को लेकर समझ और जागरूकता का अभाव। कई बार उन्हें पता ही नहीं होता कि उन्हें शिकायत किससे करनी चाहिए। इसके अलावा, जिन्हें अपने कानूनी अधिकारों के बारे में मालूम है, उनमें भी अधिकतर शिकायत करने में संकोच करती हैं। उन्हें लगता है कि इससे कुछ नहीं बदलेगा, बल्कि अगर वे अपने साथी या वरिष्ठ के विरुद्ध शिकायत करेंगी तो इससे उनके काम, कैरियर, तरक्की और सहयोगियों से उनके संबंधों पर बुरा असर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में वे या तो चुप रहती हैं, या परेशान होकर नौकरी छोड़ देती हैं।
यह सिर्फ भारत की ही बात नहीं है, बल्कि कमोवेश हर जगह यही स्थिति है। दुनिया के 141 देशों में कार्यस्थल पर यौन शोषण के खिलाफ कानून हैं और वैश्विक स्तर पर इस तरह के उत्पीड़न से गुजरने वाली महिलाओं की संख्या 38 फीसदी है। लेकिन उनमें से करीब 58% ऐसी महिलाएं हैं, जिन्होंने कभी इसके खिलाफ शिकायत दर्ज नहीं की है। जाहिर है कि अभी उनमें बहुत ज्यादा विश्वास पैदा करने की जरूरत है।
यह भी पढ़ें: Two Finger Test: अवैज्ञानिक भी और अवैधानिक भी, फिर भी क्यों जारी है टू फिंगर टेस्ट?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












Click it and Unblock the Notifications