Rift in JDU: बिहार की राजनीति में क्यों लड़ रहे हैं 'लव-कुश'?

कुर्मियों के नेता माने जाने वाले नीतीश कुमार और कुशवाहा नेता कहलाने वाले उपेन्द्र कुशवाहा एक दूसरे को आंखें दिखाने में जुटे हैं। अब देखना रोचक होगा कि पहले पलक किसकी झपकती है और कौन किसको लपक लेता है।

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Rift in JDU: जैसे ही "सुशासन" के अगले नेता के तौर पर नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव का नाम आगे बढ़ाना शुरू किया, बिहार की आम जनता के साथ-साथ बिहार के नेताओं को भी डर लगने लगा। जनता तो खैर चुप रहने के सिवा कुछ कर नहीं सकती थी, लेकिन नेताओं के पेट में मरोड़ उठने के साथ ही बयानबाजी का दौर भी शुरू हो गया। विपक्ष के लिए ये "जंगलराज 2.0" के दबे पांव बिहार की बहार में घुस आने की आहट थी लेकिन बिहार के सत्ता पक्ष के नेता भी ऐसे फैसलों से संतुष्ट नहीं थे।

अपने विरोध को मुखरता से प्रदर्शित करने वाले उपेन्द्र कुशवाहा ऐसे में फिर से चर्चा में आ गए। एक तरफ जहां नीतीश बाबू कह रहे हैं कि पार्टी में आने जाने पर कोई रोक नहीं, वहीं दूसरी तरफ उपेन्द्र कुशवाहा ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसे अगर कह देने भर से छोटा भाई घर छोड़ दे तो बड़ा भाई पूरी जमीन-जायदाद हड़प लेगा।

दिल्ली में जब कुशवाहा इलाज के लिए गए थे, उसी समय भाजपा के प्रेम रंजन पटेल और संजय टाइगर जैसे नेताओं से उनकी मुलाकात हुई थी। ऐसे आरोपों के जवाब में कुशवाहा ने और भी तीखी टिप्पणी कर दी। उन्होंने कहा था कि पार्टी (जद-यू) में जो जितना बड़ा नेता है, वो उतना ज्यादा भाजपा के संपर्क में है। ऐसी बगावत बिहार की राजनीति में कोई नयी बात हो, ऐसा भी नहीं है।

करीब तीन दशक पूर्व स्वयं नीतीश कुमार ने भी लालू यादव के विरुद्ध ऐसी ही बगावत की थी। लालु यादव उस दौर में "सामाजिक न्याय" बांट रहे थे और नीतीश को लगता था कि ये "सामाजिक न्याय" केवल यादवों को मिल रहा है, लव-कुश अर्थात बिहार के कुर्मी-कुशवाहा इस "सामाजिक न्याय" के लाभ से वंचित रह गए। अपनी 1994 की लव-कुश रैली में नीतीश कुमार ने इसी हिस्से की बात की थी। अब उपेन्द्र कुशवाहा के इशारे ने जता दिया है कि वो कुशवाहा समाज के हिस्से की बात कर रहे हैं जो कथित रूप से नीतीश बाबू केवल अपने कुर्मी समुदाय को दिए जा रहे हैं।

उपेन्द्र कुशवाहा से नीतीश कुमार और उनकी पार्टी के सम्बन्ध टूटते-जुड़ते रहे हैं। पहली बार विधायक बने कुशवाहा को नीतीश कुमार ने 2004 में सदन में विपक्ष का मुखिया बना दिया था लेकिन 2006 में ही कुशवाहा जद-यू छोड़ गए। इसके बाद कुछ वर्षों तक वो कभी एक तो कभी दूसरी पार्टी का दामन थामते रहे। अंततः 2010 में फिर से उनकी "घरवापसी" हुई जब नीतीश कुमार ने उन्हें राज्य सभा का सदस्य बना दिया। पाला बदलने की कुशवाहा की आदत इससे बदली नहीं और 2013 में वो नीतीश कुमार पर गैर-लोकतान्त्रिक तरीके से पार्टी चलाने का आरोप लगाते हुए फिर से भाग छूटे।

इस बार उन्होंने आरएलएसपी नाम से अपना एक दल बना लिया और भाजपा के साथ गठबंधन में शामिल हो गए। इसके अगले ही वर्ष लोकसभा चुनाव थे और 2014 के इन चुनावों ने जिन तीन क्षेत्रों से अपने उम्मीदवार खड़े किये थे, वो सभी सीटें आरएलएसपी के खाते में आयीं। इसका फायदा भी उपेन्द्र कुशवाहा को मिला और वो शिक्षा राज्य-मंत्री बने।

बिहार में फिर से नीतीश कुमार ने गठबंधन से सरकार बना ली। जब नीतीश अपने ज्यादा विधायकों के साथ 2017 में भाजपा के गठबंधन में आ गए तो एनडीए में उपेन्द्र कुशवाहा की पूछ फिर से कम हो गयी। मनचाही सीटें और मंत्री पद आदि के मामले पर 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले उनकी भाजपा से फिर खटपट हो गयी। इन चुनावों ने एनडीए गठबंधन ने जद-यू को 17 सीटों पर लड़ने का मौका दिया और कुशवाहा की आरएलएसपी को केवल 4 टिकट मिले। ये चार की चार सीटें भी 2019 में कुशवाहा की पार्टी हार गयी। अगले ही वर्ष 2020 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव हुए तो उपेन्द्र कुशवाहा ने बसपा से हाथ मिला लिया, मगर इस बार भी पार्टी कोई सीट जीतने में असफल रही। नीतीश कुमार ने देख लिया था कि 2020 के चुनावों में कम से कम 14 सीटें ऐसी थीं, जहां कुशवाहा वोट बैंक ने जद-यू को भारी नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद नीतीश कुमार ने उपेन्द्र कुशवाहा को फिर से पार्टी में वापस बुला लेने का फैसला किया।

लव-कुश मतलब कुर्मी-कुशवाहा वोट बैंक पर आधारित जद-यू की राजनीति में अगर उपेन्द्र कुशवाहा स्वयं को पार्टी के अगले नेतृत्व और मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर देखने लगे थे, तो ये कोई आश्चर्य की बात नहीं थी। नीतीश द्वारा तेजस्वी को आगे बढ़ाने से उपेन्द्र कुशवाहा के सपनों पर पानी फिर गया है। नीतीश के इस कदम के पीछे चुनावी गणित भी काम कर रहा है। हाल ही में मोकामा, गोपालगंज और कुढ़नी में उपचुनावों के नतीजों ने संभवतः फैसलों को प्रभावित किया होगा। मोकामा के बारे में सबको पता था कि इस क्षेत्र में किसका दबदबा है। गोपालगंज और कुढ़नी में जब कुशवाहा वोट जद-यू के खाते में आते नहीं दिखे तो उपेन्द्र कुशवाहा की नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न उठे। जैसे तैसे राजद मोकामा की सीट बचा पायी।

गोपालगंज में पिछली बार की तरह जद-यू का साथ भाजपा के पास नहीं था लेकिन उसने उप-चुनाव भी जीत लिए। सबसे बुरी हालत कुढ़नी में हुई। यहाँ भी कुशवाहा मतों की संख्या काफी थी। पिछली बार यहाँ से राजद उम्मीदवार ने फतह का झंडा फहराया था। उपचुनावों में जद-यू के उम्मीदवार को सत्ता पक्ष के भरपूर प्रचार के बाद भी भाजपा ने धूल चटा दी!

भाजपा की ओर से सम्राट चौधरी को कुशवाहा समाज के नेता के रूप में स्थापित करने के प्रयास चल रहे हैं और कुढ़नी चुनाव के बाद कुशवाहा वोटों पर उपेन्द्र कुशवाहा की दावेदारी इकलौती नहीं बची। जैसे कभी नीतीश कुमार ने उपेन्द्र कुशवाहा को विपक्ष का नेता बनाया था वैसे ही भाजपा विधानसभा में सम्राट चौधरी को विपक्ष के नेता का पद देकर अपनी मंशा साफ़ कर चुकी है। उपेन्द्र कुशवाहा के बयानों के बाद भी अगर नीतीश सीधे-सीधे उन्हें पार्टी से बाहर करने के बदले उनके खुद छोड़कर जाने की प्रतीक्षा में बैठे दिखते हैं तो उसके पीछे यही कुशवाहा वोटों की राजनीति है।

राजद के जिस मुस्लिम-यादव (माय समीकरण) वोट बैंक के बीच से नीतीश कुमार ने कुर्मी-कुशवाहा जोड़ निकाला था, उसमें से कुशवाहा वोटों का उपेन्द्र कुशवाहा के जाने से खिसकना जद-यू झेल नहीं पाएगी। पहले से ही मजबूत स्थिति में राजद, ऐसा होने पर पूरी जद-यू को ही निगल जाएगी।

अपनी राजनैतिक विरासत, पार्टी और भविष्य को बचाने की कवायद में जुटे नीतीश कुमार के लिए आगे की डगर आसान नहीं है। उपेन्द्र कुशवाहा के भाजपा के साथ फिर से चले जाने की संभावना फ़िलहाल थोड़ी क्षीण दिखती है। इससे नीतीश की समस्या सुलझती नहीं क्योंकि जद-यू से पहले ही निकले नेता आरसीपी सिंह भी अपने लिए राजनैतिक जमीन तलाश रहे हैं। पूरी संभावना है कि जद-यू से अलग होते ही उपेन्द्र कुशवाहा को आरसीपी सिंह लपक लेने की कोशिश करेंगे।

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      (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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